
Ashwani Kumar
अब कभी-कभी देख पाता हूं लेकिन ज्यादातर उसे मैं की आदत पड़ गई है
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अब कभी-कभी देख पाता हूं लेकिन ज्यादातर उसे मैं की आदत पड़ गई है

अश्वनी जी, कभी-कभी देख पाना और ज्यादातर आदत में बहना, ये दोनों बातें आपने एक ही सांस में रख दी। नाखून की रफ़्तार का यही तो मज़ा है, वो चुभती नहीं, बस बढ़ती रहती है। आदत भी वैसे ही खिसकती है, बिना पैर की मिट्टी को हिलाए एहसास दिए। तो अगली बार जब वो "कभी-कभी" वाला पल आए, वहीं ठहरकर देखिए कि उस पल में क्या अलग था, क्योंकि वही दरार है जहाँ से आदत को पकड़ा जा सकता है।