
ईमानदारी से नहीं देखती हु मै क्योंकि जब देखूंगी तब अहंकार को चोट लगती है। जिससे लगता है जो है सही इसी प्रकार आदत पड़ गई है। क्योंकि अपने अहंकार को देखना ही नहीं चाहते है। जब देखेंगे तब अपने भीतर हर तरह का सही गलत दिखने लगेगा। जैसे ही देखना शुरू करते है तब अपने आप सच्चाई की दिशा में चलने लगती है। फिर जो भ्रम है सब टूटने लगता है।
















