✍🏻 पोस्ट 26 | 25 सितंबर '26💭 विषय — पर्यावरण और जलवायु───────────🌡️ एल नीनो से 4.51 लाख जानों पर खतरा?
🌍 एक रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 से फरवरी 2027 के बीच मजबूत एल नीनो से जुड़ी अत्यधिक गर्मी दुनिया में सामान्य स्थिति की तुलना में लगभग 4.51 लाख अतिरिक्त मौतों से जुड़ सकती है। भारत में यह अनुमान लगभग 15,800 ± 1,600 अतिरिक्त गर्मी से जुड़ी मौतों का है। ये हो चुकी मौतें नहीं, बल्कि मॉडल का अनुमान हैं।
👉 एल नीनो कोई नई घटना नहीं है। य…
इस बार एल नीनो की वजह से ही राजस्थान में बारिश न के बराबर हुई। फैसले नष्ट हुई है , उत्पादन बहुत ही कम हुआ है इस बार ।
जरूरत है और उपभोग की इच्छा को नियंत्रित करने की और इस बात को और लोगो तक पहुंचाने की ।
Sandhya Verma
suruat aaj se hi krenge
Ramkishor Kumar
हम लोगों अपनी जरूरते और इच्छाए को समझना होगा ।
इस बात को और लोगों तक भी पहुंचाना होगा । क्योंकि समस्या वैश्विक है। तो समाधान भी वैश्विक स्तर पर ज्यादा प्रभावी होगा । शुरुआत चेन रिएक्शन की तरह ।
Pranjal
Learning:
El Niño is natural phenomenon under which there is changes in weather pattern in Pacific ocean and its atmosphere which in macro scale influences global temperature and rainfall patterns.
As per recent report, El Niño is projected to affect 451,000 people across globe and specifically 15,800±1,600 people of India.
On the name of development, we
human Re consuming more and more nature's resources which is which is disrupting nature's biological systems. Climate Change is the effect of this disruption.
But its affect on human is not equal. People who are socially and economically vulnerable are more vulnerable to affected by this climate catastrophe.
But this desire to consume more is common to all humans irrespective of their economic, social and political status.
The need for more arises from this sense of incompleteness. This misplaced center is to be be inquired(Why am I so hungry to consume?). Instead we are trying to fill this self-certifying void with more money, properties, power and status.
The direction of addressing problem is misplaced. The fundamental problem is not more growth and money we are actually lacking, rather it is this sense of incompleteness that is never questioned and hence we remain desrious for one object to another.
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Anuradha Walia
अगर हम सभी अपनी 'जरूरतों' को सीमित कर लें, तो संभव है 'कुछ' हो पाएगा।
अगर लाखों लोग एक साथ यह 'कदम' उठाएंगे तो हम सबके 'हित' में होगा।
Lovely Singh
एल नीनो प्राकृतिक घटना है, लेकिन बढ़ती गर्म दुनिया में इसका असर और गंभीर हो सकता है। जलवायु संकट केवल गर्मी, सूखा या बाढ़ का सवाल नहीं है; यह पानी, भोजन और स्वास्थ्य से भी जुड़ा है। हमें प्रकृति पर बढ़ते दबाव के साथ अपनी “जरूरत” और “और चाहिए” वाली मानसिकता को भी देखना होगा।
Savita Joshi
और चाहिए और चाहिए का नतीजा है ए।
Niharika Neha
chhote chhote kadam lene se hi iska samadhan nikal sakta hai. lekin hum sab behoshi me jeevan ji rhe hai .
Pankaj Kumar
मुख्य संदेश
“प्रकृति पर हमारा अधिकार नहीं, हमारी जिम्मेदारी है। आवश्यकता के अनुसार उपयोग, अनावश्यक उपभोग से संयम और सभी जीवों के प्रति करुणा—यही पर्यावरण-सुरक्षा को स्थायी बनाने की दिशा है।”
प्रकृति को केवल उपयोग की वस्तु न मानकर एक ही व्यापक अस्तित्व का हिस्सा समझने की दृष्टि मिलती है। जब मनुष्य प्रकृति को केवल भोग की वस्तु मानता है, तब अति-उपभोग और प्रदूषण बढ़ते हैं। इसके विपरीत संयम, संतुलन, अपरिग्रह और सभी जीवों के प्रति करुणा पर्यावरण-संरक्षण की आध्यात्मिक नींव बन सकते हैं।
उदाहरण 1 — वृक्ष
एक पेड़ केवल लकड़ी या फल देने वाली वस्तु नहीं है। वह पक्षियों को आश्रय, वातावरण को स्वच्छता और मनुष्य को जीवन देता है। इसलिए पेड़ लगाना केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी है।
उदाहरण 2 — जल
यदि हम पानी को असीमित संसाधन समझकर बर्बाद करते हैं, तो भविष्य में जल-संकट बढ़ सकता है। जल बचाना, वर्षाजल संग्रह करना और नदियों को प्रदूषण से बचाना प्रकृति के साथ संतुलित जीवन का उदाहरण है।
वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा, जल-संरक्षण, प्लास्टिक कम करना और बिजली बचाना बहुत महत्वपूर्ण उपाय हैं, लेकिन ये अकेले समाधान नहीं हैं। पर्यावरण की रक्षा के लिए व्यक्ति, समाज, उद्योग और सरकार—सभी की जिम्मेदारी है।
Pushpa Lahu Dudhabhate
बहोश और अंधी कामना लोगो को कुछ समझमें ही नही आने देती | जब तक आत्म अवलोकन नही करेंगे ऐसा ही चलता रहेगा | और आत्म अवलोकन सिर्फ आचार्य जी के सानिथ्य में समझ आता है|
Nikita
Our needs won't be end and our effort to gain something won't end, ego always search but it also depends on the intent of the ego .
Kusum Lata
इस बार मौसम का असर पेड़ पौधों और पशु पक्षियों पर हो रहा है वह साफ दिख रहा है लेकिन भोग की प्रवृति
कुछ समझने के लिए तैयार ही नहीं l🙏
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Uma Soni
Hame apne invironment k prati sachet hona hoga nahi to prakruti ki unchahi tasveer ki
badsurati dekhni padegi.Apun to paida hi hua hai Bhogne k liye, yah sarvatha galat hai,Ati kahin bhi achchi nahi,fir vo chahe utpadan ki ho,ya fir upbhokta ki.prakrati ka dohan band hona chahiye.🙏😔
Shyammohan Awasthi
विज्ञापनों के द्वारा हमारे मन में भर दिया गया है कि खुशी माने भोग।
Manisha
भारत में सुपर अल नीनो (Super El Niño) की वर्तमान स्थिति अत्यंत सक्रिय बनी हुई है। प्रशांत महासागर में तेजी से बढ़ रही इस गर्मी का सीधा असर भारत के मौसम और प्राकृतिक तंत्र पर दिखने लगा है।
वैज्ञानिक रिपोर्टों और आंकड़ों के अनुसार भारत में इसकी वर्तमान स्थिति इस प्रकार है।
# 1. मानसून पर सीधा आघात (कमजोर बारिश)
15% बारिश की कमी : इस अल नीनो के कारण 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से काफी कमजोर रहा है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के सितंबर के आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल बारिश सामान्य से लगभग 15% कम दर्ज की गई है।
* दक्षिणी और पूर्वी भारत में सूखा: देश के दक्षिणी प्रायद्वीपीय हिस्से में बारिश की कमी 29% तक पहुंच गई है। इसके कारण कई राज्यों में जलाशयों (Reservoirs) का जलस्तर पिछले वर्षों की तुलना में काफी नीचे चला गया है, जिससे सिंचाई और पीने के पानी का संकट गहराने लगा है।
# 2. सर्दियों और आगामी महीनों में जानलेवा गर्मी का खतरा
* सर्दियों पर असर (Warmer Winter) : विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार -
यह अल नीनो फरवरी 2027 तक पूरी तीव्रता के साथ जारी रहेगा। इसके कारण भारत में इस बार (2026-27) सामान्य ठंड गायब रह सकती है और उत्तर व मध्य भारत में अत्यधिक गर्म सर्दियों का सामना करना पड़ सकता है।
* अतिरिक्त मौतों की चेतावनी : शिकागो यूनिवर्सिटी के क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार-
इस सुपर अल नीनो के कारण होने वाली भीषण गर्मी से सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत में सामान्य वर्ष की तुलना में करीब 15,800 अतिरिक्त मौतें होने की आशंका जताई गई है।
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# 3. पारिस्थितिकी (Ecosystem) और खेती पर भारी दबाव
* 180+ वैज्ञानिकों की गंभीर चेतावनी : हाल ही में भारत के 180 से अधिक वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने चेतावनी जारी की है कि
इस सुपर अल नीनो का असर सिर्फ तापमान तक सीमित नहीं रहेगा।
* इसका सबसे बुरा असर खेती (विशेषकर रबी/गेहूं की फसल की बुआई और पैदावार), मिट्टी की नमी में कमी, पश्चिमी घाट व हिमालयी क्षेत्रों के जंगलों में आग लगने के खतरों और समुद्री पारिस्थितिकी (कोरल ब्लीचिंग) पर पड़ रहा है ।
सुपर अल नीनो के कारण खाद्य पदार्थों की महंगाई (Food Inflation) में भारी उछाल आ रहा है, जिसका देश के गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर सीधा और बेहद गंभीर वित्तीय दबाव पड़ रहा है।
वर्तमान में अगस्त-सितंबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में खाद्य महंगाई दर लगभग 5.95% तक पहुंच चुकी है। चूंकि अल नीनो की वजह से मानसून में 15% की कमी आई है, इसलिए दाल, चीनी, प्याज, सरसों तेल और मौसमी सब्जियों की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है।
गरीब और मध्यम वर्ग की
आय का 60% से अधिक हिस्सा केवल भोजन पर खर्च हो रहा है। महंगाई बढ़ने से उनके पास अन्य बुनियादी जरूरतों के लिए पैसे नहीं बच रहे हैं। |
सबसे ज्यादा असर मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग पर हो रहा है।
ranjit kumar
हमारा इच्छा अंतर खाई है,जो कभी नही भरता,तो हम क्या है?, क्यों है?,जब तक नहीं समझते,तब तक प्रकृति का दोहन करता रहेगे
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DEEPAK KUMAR SINGH
हम समझना तो नजदीक है, ठहरने का नकल भी नहीं कर रहे हैं।
Rudra
हमारी दैनिक जीवन में बढ़ती "और" चाहिए कि,ये मांग ही, जलवायु ने बदलाव और पर्यावरण पर बढ़ता दबाव और तड़पते गर्मी की तापमान कोई अलग घटना का रूप नहीं है,
ये हमारी ही उस प्रवृत्ति की मांग, और अधिक उपभोग से निकल रहा है,
दक्षिण एशिया में चरम मौसमी घटनाएं आम होती जा रही है, क्योंकि हमारी हमारी अधिक मांग की प्रवृत्ति भी आम हो होती जा रही है,
जैसे हम, वैसा हमारा संसार यानी बर्बादी।
Kamlesh Sharma
संसारी व्यक्ति के विषय और जरूरते इतनी ज्यादा है, इतनी लम्बी लिस्ट मिलेगी , उस लिस्ट का और या छोर नजर नही आयेगा !
Kamlesh Sharma
संसारी व्यक्ति के पास विषयों की जरूरतों की एक लम्बी लिस्ट होती हैं, उसका कहीं और या छोर नजर नहीं आता! उनकी कामनाएं कभी पूरी ही नहीं होती !
Sonam
सवाल केवल एल नीनो या जलवायु संकट से होने वाले नुकसान को गिनने का नहीं है, बल्कि अपने जीवन में यह देखने का भी है कि हमारी वास्तविक जरूरतें कहाँ समाप्त होती हैं और अनावश्यक इच्छाएँ कहाँ से शुरू होती हैं। जब सुविधा, संग्रह और उपभोग की चाह जरूरत से आगे बढ़कर लगातार “और” मांगने लगती है, तब प्रकृति पर भी दबाव बढ़ता जाता है। इसलिए जलवायु संकट का समाधान केवल बाहरी परिस्थितियों को नियंत्रित करने में नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं और उपभोग की प्रवृत्ति को ईमानदारी से देखने में भी है।
Sneh lata
हम सब का अंहकार हमें ही तबाह कर रहा है ।
Mayur
इसलिए यह सवाल करना बहुत जरूरी है हर पल स्वयं से की हम जो भी कुछ कर रहे है "किसके लिए" ?
BHARAT BHUSHAN Sharma
yes it might hapeen but the truth is it MUST happen.......the most worthless hopeless species on earth must be decreased for betterment on this planet....iI might sound rude or else but it is the truth......we the ego is responsible for everything bad happening on this planet.....
MANJU KRISHNA UPADHYAY
यह वीडियो देखकर ही मुझे बहुत ज्यादा डर लगने लगा लग रहा है पता नहीं क्या होने वाला है ऐसा लग रहा है कि पता है पता नहीं नहीं बोलना चाहिए सब पता है पर यह नहीं पता वह अगला पाल कब सामने आएगा यह सब कैसे रुकेगा कुछ समझ नहीं आता बहुत लोग आचार्य जी को अभी भी नहीं सुनते हैं अगर आचार्य जी तब तक नहीं पहुंचे और सब लोग अगर सुना नहीं शुरू किया अभी और उनकी शिक्षाओं पर नहीं चलना शुरू किया तो सब खत्म होगा सबसे बड़ी बात तड़प के मारेंगे लोग नेपाल का देखकर बहुत डर लगता है कि सब छोटे-छोटे बच्चे अपने मां-बाप से अलग हो गए पता नहीं कैसे क्या होगा |
"हमारी जरूरतें" हां साधारण रूप से जो जरूरत हो जीवन जीने के लिये वह आवश्यक है। पर हम वह रेखा कब पार कर जाते हैं जहाँ "और "के लिये बिहोश कर्म करने लग जाते हैं। अहम् को पूरा करने में हम बिनाश को निमंत्रण ही दे रहे हैं। यह भी समझना होगा कि "और "हमारी लोकधार्मिक भक्ति में भी बहुत बढ़ रहा है।
Purvi Nagar
अद्वैत वेदांत के अनुसार दूसरा कोई नहीं है अगर हम इस आधार पर देखें तो हमारे द्वारा किया जाने वाला हर एक काम प्रकृति को प्रभावित कर रहा है हमारी बेचैनी हमें और स्थिर करती है और वह स्थिरता धीरे-धीरे बढ़कर प्रकृति की अस्थिरता हो गई है, जो इस पिंड में है वही इस ब्रह्मांड में है हमारी बेचैनी हमें और ज्यादा लालची बनती है यह इधर उधर भागती है और ज्यादा उपभोग करवाती है और जब भोग बढ़ता है तो दूसरी आपदाएं भी बढ़ती है जिस प्रकार से समुद्र की एक लहर ही दूसरी लहर को जन्म देती है उसी प्रकार हमारी आंतरिक बेचैनी भी प्रकृति को बेचैन कर रही है और उसका परिणाम हमें क्लाइमेट चेंज के रूप में देखने को मिल रहा है।
अगर क्लाइमेटचेंज को रोकनाहै तो सबसे पहले हमें स्वयं को समझाना पड़ेगा स्वयं को सही दिशा देनी पड़ेगी हमारी सही दिशा ही प्रकृति की सही दिशा निर्धारित करेगी क्योंकि हम स्वयं को तो दिशा निर्देशित कर सकते हैं लेकिन प्रकृति की दिशा बदल गई तो उसको रोकना हमारे लिए संभव नहीं है।
SHIV PRATAP SINGH
हमारी जरूरते अतृप्त अहंकार से शुरू हुई है जिन्हें पारंपरिक लोक धर्म ने और ज्यादा व्यग्र किया है और इनका कोई अंत नहीं है । अभी हाल की ही एक रिपोर्ट के अनुसार इस धरती पर जीवन को बनाये रखने 9 पैमानों में से 7 पैमाने हम तोड़ चुके है। अब ये सुलगता हुआ बम है जो बस फटेगा।
✍🏻 पोस्ट 26 | 25 सितंबर '26 💭 विषय — पर्यावरण और जलवायु ─────────── 🌡️ एल नीनो से 4.51…