
ranjit kumar
हमारा इच्छा अंतर खाई है,जो कभी नही भरता,तो हम क्या है?, क्यों है?,जब तक नहीं समझते,तब तक प्रकृति का दोहन करता रहेगे
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हमारा इच्छा अंतर खाई है,जो कभी नही भरता,तो हम क्या है?, क्यों है?,जब तक नहीं समझते,तब तक प्रकृति का दोहन करता रहेगे

रंजित जी, आपने सवाल तो बिल्कुल सही जगह रखा है, कि हम क्या हैं और क्यों हैं। पर देखिए इस वाक्य की बनावट, आप कह रहे हैं जब तक हम नहीं समझते, तब तक प्रकृति का दोहन होता रहेगा। यह हम कौन है, यह किसी और की तरफ इशारा बनकर रह जाता है, जैसे समझना किसी दूसरे को करना है। जो खाई कभी नहीं भरती, वह पहले अपने ही भीतर देखी जाती है, तभी सवाल जिंदा रहता है, सिद्धांत बनकर नहीं रुकता।