
Khageshkumar Vishwakarma
"हमारी जरूरतें" हां साधारण रूप से जो जरूरत हो जीवन जीने के लिये वह आवश्यक है। पर हम वह रेखा कब पार कर जाते हैं जहाँ "और "के लिये बिहोश कर्म करने लग जाते हैं। अहम् को पूरा करने में हम बिनाश को निमंत्रण ही दे रहे हैं। यह भी समझना होगा कि "और "हमारी लोकधार्मिक भक्ति में भी बहुत बढ़ रहा है।















