
✍🏻 पोस्ट 3 | 20 अक्टूबर ’26 💭 विषय — फ़िल्में/गीत/पुस्तकें/कला ───────────── 🎬 उसे देवी बनाया, फिर उसके साथ क्या किया? एक लड़की के आगे लोग सिर झुकाने लगे। उसे देवी कहा गया। पूजा होने लगी। लोग अपने रोग और दुख लेकर उसके पास आने लगे। अब उससे सबकी पीड़ा हरने की अपेक्षा थी। 📽️ सत्यजित राय की फ़िल्म ‘देवी’ (1960) की कहानी बंगाल के एक ज़मींदार परिवार की है। दयामयी, जिसका किरदार शर्मिला टैगोर ने निभाया है, अपने पति उमाप्रसाद और उसके परिवार के साथ रहती है। एक रात उसके ससुर कालीकिंकर सपना देखते हैं और मान लेते हैं कि उनकी बहू देवी का अवतार है। उनके कहने पर दयामयी की पूजा शुरू हो जाती है। 🏵️ एक बीमार बच्चे के ठीक होने को उसकी शक्ति का प्रमाण मान लिया जाता है। बात फैलती है। लोग रोग और दुख से छुटकारे की आशा लेकर उसके पास आने लगते हैं। उसका पति उसे वहाँ से ले जाना चाहता है। लेकिन अब दयामयी भी अपने देवी होने की मान्यता में उलझ चुकी है। फिर उसका प्रिय भतीजा बीमार पड़ता है। इलाज के बजाय उसे दयामयी के भरोसे छोड़ दिया जाता है। बच्चे की मृत्यु हो जाती है। इस आघात से दयामयी बुरी तरह टूट जाती है। जिसे सबका दुख दूर करने वाली देवी बनाया गया था, उसी की हालत इतनी दयनीय कैसे हो गई? 🪞 उसके आगे सिर क्यों झुके थे? क्योंकि उससे कुछ पाने की अपेक्षा थी। किसी को रोग से छुटकारा चाहिए था, किसी को दुख से राहत। ससुर को अपनी मान्यता सही होने का प्रमाण मिल रहा था। जिसे देवी कहकर पूजा जा रहा था, उसे अपनी माँगें पूरी करने का साधन बना लिया गया था। देवी का आसन अब ऐसा बंधन था जिसमें उससे सबकी अपेक्षाएँ पूरी करने की माँग थी। एक बच्चे के जीवन का भार भी उसी पर रख दिया गया। 🔎 अहंकार दूसरे को ऊँचा स्थान देकर भी उससे अपना काम लेना जानता है। “तुम तो बहुत महान हो” कहकर उससे ऐसा त्याग माँगा जाता है, जिसका बोझ खुद उठाने को हम तैयार नहीं। माँ को देवी कहा। फिर उसके हिस्से ऐसा त्याग लिख दिया जिसका कोई अंत नहीं सबकी ज़रूरतें पूरी करे, बदले में कुछ न माँगे और शिकायत भी न करे। उसे ऊँचा स्थान दिया, ताकि उससे अपनी सेवा का दावा और बड़ा कर सकें। उसकी महिमा हमारे लिए सुविधाजनक हो गई। जितना बड़ा दर्जा दिया, उतनी बड़ी सेवा का दावा बाँध लिया। जिससे हमारे बड़े स्वार्थ जुड़े हों, उसकी हानि स्वीकारने का अर्थ है उससे मिलते अपने लाभ पर प्रश्न उठाना। इसलिए उसकी हालत बिगड़ती रहती है और हम उससे अपनी माँगें पूरी करवाने पर अड़े रहते हैं। सम्मान के शब्द बने रहते हैं; उनके पीछे छिपा स्वार्थ उस व्यक्ति को घिसता रहता है। जिसकी पूजा कर रहा हूँ, उससे क्या-क्या लेना चाहता हूँ? उसकी दुर्दशा में मेरी माँगों का कितना योगदान है? यह दिखाई दे, तो क्या अपना दावा छोड़ने की नीयत है? 💬 भारत में ऐसे कौन-से उदाहरण हैं जहाँ किसी को देवी कहकर पूजा गया, फिर भी उसकी दुर्दशा हुई? एक उदाहरण चुनिए। उससे हमारा कौन-सा स्वार्थ जुड़ा है, और उसे बचाने के लिए हम किस हानि की अनदेखी करते हैं? स्रोत: https://satyajitray.org/devi-the-goddess/











































