
Dipti Sharma
शायद भारत के ज़्यादातर घरों में बेटी को देवी समझ पूजते है पर बस त्योहारों तक। मुझे याद है जब मैं जोधपुर में थी तो वहां छोटी बच्चियों और महिलाओं को पैर छू जाने पर प्रणाम कर माफी मांगी जाती है पर वही मैने देखा था ४ क्लास में शादी,स्कूटी में घूंघट डालकर चल रही और स्कूल से जल्दी निकालने पर जोर था। इसका मतलब देवी समझना या बना देना केवल बाहरी था । इंसान भी न बन पाती है वो।


















