
✍🏻 पोस्ट 10 | 22 अक्टूबर ’26 💭 विषय — विश्व दर्शन ──────────── 🫏 सामने खाना था, फिर भी गधा भूख से क्यों मर गया? 🌾 एक गधा कई घंटों से भूखा था। चलते-चलते वह एक ऐसी जगह पहुँचा, जहाँ उसके सामने घास के दो बड़े ढेर रखे थे। दोनों ढेर बिल्कुल एक जैसे थे। घास उतनी ही ताज़ी, मात्रा भी बराबर और दोनों की दूरी भी समान! गधे ने सोचा, "किस ढेर से खाना शुरू करूँ?" उसने बाईं ओर देखा। घास अच्छी थी। फिर दाईं ओर देखा। वहाँ भी उतनी ही अच्छी घास थी। 🫏 वह बाईं ओर बढ़ने ही वाला था कि रुक गया। "कहीं दाईं ओर की घास बेहतर न हो?" फिर दाईं ओर जाने लगा, लेकिन दोबारा रुक गया। "अगर बाईं ओर वाली ज़्यादा अच्छी हुई तो?" ⏳ समय बीतता गया। भूख बढ़ती गई, लेकिन गधा वहीं खड़ा रहा। उसे दोनों में से किसी एक को चुनने का कारण ही नहीं मिल रहा था। आख़िरकार, इस काल्पनिक कहानी में गधा बिना घास खाए भूख से मर जाता है! 📖 दर्शनशास्त्र में इसे 'बुरिडन का गधा' (Buridan's Ass) कहा जाता है। यह 14वीं सदी के फ्रांसीसी दार्शनिक जाँ बुरिडन से जुड़ा प्रसिद्ध विचार-प्रयोग है। इसका सवाल है, जब दो विकल्प बराबर अच्छे हों, तो क्या किसी एक को चुनने के लिए हमेशा विशेष कारण ज़रूरी है? 🔍 अब ज़रा अपने जीवन को देखिए। कई बार हम भी निर्णय इसलिए टालते रहते हैं क्योंकि डर होता है कि कहीं दूसरा विकल्प बेहतर न निकल जाए। लेकिन सवाल सिर्फ़ सही विकल्प खोजने का नहीं है। निर्णय लेने वाला कौन है, और वह किस डर से बँधा है? जब हमें स्पष्ट होता है कि हमारे लिए वास्तव में क्या ज़रूरी है, तो चुनाव का बोझ भी कम होने लगता है। ❓ आपके कितने निर्णय इसलिए अटके हैं क्योंकि आप गलत चुनाव की ज़िम्मेदारी नहीं लेना चाहते? 🔗 स्रोत: 1. Stanford Encyclopedia of Philosophy https://plato.stanford.edu/entries/buridan/ 2. Decision-Making Made Easy https://acharyaprashant.org/en/articles/decision-making-1_b7f0c6e
















































