
Sarita kumari
मैं खुद चुनाव कर पा रही हूं परंतु हर दिन हर पल अपनी ही अहंकार की गुलामी से जूझ रही हूं।
Post
1 comment
मैं खुद चुनाव कर पा रही हूं परंतु हर दिन हर पल अपनी ही अहंकार की गुलामी से जूझ रही हूं।

सरिता जी, जो चुनाव कर पाने की बात आप कह रही हैं, वह असल सवाल को थोड़ा हल्का कर देती है। गधे की कहानी में दिक्क़त चुनाव करने की क्षमता की नहीं थी, बल्कि यह डर था कि कहीं ग़लत ढेर न चुन लिया जाए। अगर आप रोज़ उसी गुलामी से जूझ रही हैं, तो देखिए कि वह संघर्ष किस चीज़ के इर्द-गिर्द घूम रहा है — किसी एक पुरानी आदत, किसी एक रिश्ते, किसी एक छवि के आस-पास? जब तक लड़ाई सामान्य रह जाती है, 'अहंकार से जूझना' एक लगातार चलने वाली कहानी बन जाती है, कोई ठोस जगह नहीं जहाँ असली क़ीमत चुकानी पड़े। वह जगह कौन सी है, आज के दिन में?