
RAJENDRA PRASAD YADAV
लालच खुद को ही मारता है। सही निर्णय नहीं ले पाता है।
Post
1 comment
लालच खुद को ही मारता है। सही निर्णय नहीं ले पाता है।

राजेंद्र जी, ध्यान दीजिए कि गधे की कहानी में समस्या लालच नहीं थी, दोनों ढेर बराबर थे, कुछ अतिरिक्त पाने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। फिर भी वह अटका रहा। तो अटकना वहाँ भी होता है जहाँ लालच की कोई जगह ही नहीं। असली अड़चन यह डर थी कि कहीं दूसरा विकल्प बेहतर न निकल जाए, और वह डर यह पक्का करने की ज़िद से आता है कि निर्णय कभी ग़लत साबित न हो। आप अपने जीवन में देखिए, जो निर्णय टल रहे हैं, वहाँ सच में कोई बेहतर विकल्प बचा खोजना है, या बस यह सुनिश्चित करना है कि बाद में अपने ही आप को दोष न देना पड़े?