
जन्माष्टमी को सही अर्थों में कैसे मनाया जाए, यह आचार्य जी ने इस पुस्तक में बहुत स्पष्टता से समझाया है। कृष्ण का जन्मदिन मनाने भर से जन्माष्टमी पूरी नहीं होती असली जन्माष्टमी तब है जब हम अपने भीतर एक नया जन्म होने दें। संकल्प लें कि जैसे अब तक अज्ञान और पुरानी आदतों में जीते आए हैं, वैसे आगे नहीं जिएँगे। कृष्ण का जन्मदिन नहीं, अपना नया जन्म मनाइए—यही जन्माष्टमी का सच्चा अर्थ है।
हमेशा कृष्ण को चमत्कारों और कहानियों में ढूँढा, लेकिन इस किताब ने पहली बार कृष्ण को मेरे जीवन के यथार्थ में ला खड़ा किया। आचार्य जी ने बड़ी ही बेबाकी और स्पष्टता से समझाया है कि कृष्ण कोई दूर आसमान में बैठा भगवान नहीं, बल्कि हमारे भीतर की सर्वोच्च चेतना हैं। हर उस इंसान को यह किताब पढ़नी चाहिए जो सच में कृष्ण को जानना चाहता है, सिर्फ मानना नहीं।

इस किताब ने मेरी यह धारणा तोड़ी कि कृष्ण किसी पुरानी कथा के पात्र भर हैं। आचार्य प्रशांत बहुत सीधे शब्दों में समझाते हैं कि गीता समयातीत है, परिस्थितियाँ बदल जाती हैं, पर कृष्णत्व नहीं बदलता। जन्माष्टमी का असली अर्थ भी मुझे पहली बार यहीं समझ आया। जो अध्यात्म की शुरुआत कर रहे हैं, उनके लिए यह एक स्पष्ट और ईमानदार शुरुआत है।

श्रीकृष्ण मेरी ही उच्चतम संभावना हैं - ऐसा तो आज तक किसी ने नहीं बताया था। मुझे तो लगता था कि कृष्ण किसी पौराणिक कथा के पात्र हैं, भगवान हैं, जो कहीं बाहर बसते हैं। इस पुस्तक ने श्रीकृष्ण को लेकर मेरे सारे भ्रम दूर कर दिए। और तो और, असली जन्माष्टमी क्या होती है—यह भी मैंने इसी पुस्तक से जाना।

“श्रीकृष्ण” किताब ने मेरे लिए गीता और श्रीकृष्ण के संदेशों को एक नए और आधुनिक नजरिए से समझाया। पहले मैं गीता को केवल एक धार्मिक ग्रंथ के रूप में देखता था, लेकिन इस किताब ने बताया कि यह जीवन को समझने और सही निर्णय लेने का एक व्यावहारिक मार्गदर्शन है। मुझे खास तौर पर यह बात बहुत प्रभावशाली लगी कि चाहे समय बदल जाए, परिस्थितियाँ बदल जाएँ, लेकिन सत्य और सही ज्ञान कभी नहीं बदलते। किताब में श्रीकृष्ण के ...

श्री कृष्ण ने गीता में जो संदेश दिया है उससे उनके व्यक्तित्व के बारे में पता चलता है। यह पुस्तक उनके व्यक्तित्व और उनके संदेश का एक अच्छा परिचय हमसे करवाती है। अगर आपने आध्यात्मिक यात्रा की अभी शुरुआत करी है तो यह पुस्तक आपके लिए है।