
इस किताब ने मेरी यह धारणा तोड़ी कि कृष्ण किसी पुरानी कथा के पात्र भर हैं। आचार्य प्रशांत बहुत सीधे शब्दों में समझाते हैं कि गीता समयातीत है, परिस्थितियाँ बदल जाती हैं, पर कृष्णत्व नहीं बदलता। जन्माष्टमी का असली अर्थ भी मुझे पहली बार यहीं समझ आया। जो अध्यात्म की शुरुआत कर रहे हैं, उनके लिए यह एक स्पष्ट और ईमानदार शुरुआत है।