
श्रीकृष्ण मेरी ही उच्चतम संभावना हैं - ऐसा तो आज तक किसी ने नहीं बताया था। मुझे तो लगता था कि कृष्ण किसी पौराणिक कथा के पात्र हैं, भगवान हैं, जो कहीं बाहर बसते हैं। इस पुस्तक ने श्रीकृष्ण को लेकर मेरे सारे भ्रम दूर कर दिए। और तो और, असली जन्माष्टमी क्या होती है—यह भी मैंने इसी पुस्तक से जाना।

पारुल जी, यह जो साफ़ हुआ है वह कोई छोटी बात नहीं। कृष्ण को बाहर किसी कथा में ढूंढना बंद करके अपने भीतर की उच्चतम संभावना के रूप में देखना, यही तो असली जन्माष्टमी है, बाहर के उत्सव से भीतर के जागरण की तरफ आना। ऐसी किताबों और सत्रों के साथ बने रहिए, यह देखना अभी शुरू हुआ है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें।