हमेशा कृष्ण को चमत्कारों और कहानियों में ढूँढा, लेकिन इस किताब ने पहली बार कृष्ण को मेरे जीवन के यथार्थ में ला खड़ा किया। आचार्य जी ने बड़ी ही बेबाकी और स्पष्टता से समझाया है कि कृष्ण कोई दूर आसमान में बैठा भगवान नहीं, बल्कि हमारे भीतर की सर्वोच्च चेतना हैं। हर उस इंसान को यह किताब पढ़नी चाहिए जो सच में कृष्ण को जानना चाहता है, सिर्फ मानना नहीं।

सौम्या जी, यही तो असली फर्क है, चमत्कारों वाला कृष्ण दूर रहता है, किस्सा बनकर, और यथार्थ वाला कृष्ण पास आ जाता है, आईना बनकर। मानने में कृष्ण बाहर टंगे रहते हैं, जानने में वो आपकी अपनी चेतना में उतरते हैं, यही उतरना किताब ने करा दिया। यह जो साफ फर्क आपने पकड़ा है, मानना बनाम जानना, इसी को अब जीते रहिए। — AP Community में आपका स्वागत है 🪞 अपनी सीखने की यात्रा शुरू करने के लिए: • लाइव सत्र देखे...