भारतीय समाज में स्त्री दो झूठे और कृत्रिम ढाँचों के बीच क़ैद रही है: या तो आज्ञाकारी पुतली, जिसकी डोर सामाजिक परंपराओं और पुरुषवादी व्यवस्था के हाथ में रही, या फिर पूज्य देवी, जिसे काव्यों, धार्मिक गाथाओं और गीतों में तो उच्च सिंहासन पर बिठाया गया।
_लेकिन एक सामान्य मनुष्य की तरह भूल करने, सीखने, संघर्ष करने और गिरकर खुद उठ खड़े होने की स्वाभाविक स्वतंत्रता से वंचित रखा गया। गीतों में उसका गुणगान हुआ, बाज़ार, राजनीति और खेल के मैदान से उसे जानबू…
☘️☘️जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
Ans लड़कियों को खेलों से रोकने वाली मुख्य मान्यताएँ
घरेलू जिम्मेदारी: माना जाता है कि लड़कियों का असली काम घर संभालना और चूल्हा-चौका करना है।
शादी में रुकावट: डर रहता है कि धूप में खेलने से रंग सांवला होगा या चोट लगेगी, तो शादी में दिक्कत आएगी।
कपड़ों पर रोक: खेल के छोटे कपड़े (जैसे शॉर्ट्स या स्कर्ट) पहनने को परिवार की इज्जत और बदनामी से जोड़ा जाता है।
कमजोर शरीर की सोच: समाज सोचता है कि लड़कियों का शरीर कमजोर होता है और खेल सिर्फ लड़कों के लिए बने हैं।
सुरक्षा का डर: लड़कियों को घर से दूर या अकेले बाहर भेजने में माता-पिता असुरक्षित महसूस करते हैं।
लोकधर्म की भूमिकापराया धन मानना: लोग सोचते हैं कि लड़की पर कोचिंग या खेल के सामान का पैसा खर्च करना बेकार है, क्योंकि उसे दूसरे घर जाना है।
बचपन से बंदिशें: बचपन से ही लड़कियों को खेलने के बजाय व्रत-उपवास रखने और शांत रहने की सीख दी जाती है।लड़कों को बढ़ावा: समाज में लड़कों को बाहर जाकर खेलने की आजादी होती है, जबकि लड़कियों को घर के अंदर रहने को कहा जाता है।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
आचार्य प्रशांत जी के दर्शन के अनुसार, अहंकार खुद को हमेशा अधूरा और खाली महसूस करता है। इस अधूरेपन को मिटाने के लिए उसे एक माध्यम चाहिए होता है,
जिसके जरिए वह बाहरी दुनिया की चीजों को भोग सके, देख सके और खुद को बड़ा बना सके।इसी वजह से वे शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी कहते हैं।
अहंकार का पहला कब्ज़ा: अहंकार खुद को अधूरा मानता है, इसलिए वह सबसे पहले शरीर पर कब्ज़ा करता है। जैसे कोई राजा अपनी पहली कॉलोनी बसाता है।
भोगने का साधन: अहंकार को दुनिया की सब चीजें भोगनी हैं। बिना शरीर के वह न कुछ खा सकता है, न देख सकता है और न मजे ले सकता है। शरीर ही उसका पहला औज़ार है।
अनुभव का सेंटर: हमारे सारे अनुभवों का केंद्र अहंकार ही है, और वह शरीर के ज़रिए ही खुद को 'मैं' महसूस करा पाता है।
बाहर भागने का रास्ता: जब अहंकार शरीर पर कब्ज़ा कर लेता है, तभी वह बाहर की दूसरी चीज़ों (जैसे पैसा, घर, रिश्ते) के पीछे भाग पाता है।
3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
हाँ, मेरी कई महिला मित्र हैं जिनके साथ मैं बैडमिंटन और क्रिकेट खेलता हूँ, और वे खुद भी प्रोफेशनल लेवल पर खेल रही हैं।
मैं खुद एक प्रोफेशनल क्रिकेटर हूँ और मुख्य रूप से एक फास्ट बॉलिंग ऑल-राउंडर हूँ।
अभी मैं एमपीसीए (MPCA) बोर्ड टीम के लिए अंडर-19 (U-19) डिविजन कैंप में खेल रहा हूँ। क्रिकेट ही मेरा करियर है, मेरा गेम है और मेरे लिए सब कुछ यही है। आगे भी मुझे बस प्रोफेशनली ही खेलना है।
Kamla
1. सिमोन द बोउवार (Simone de Beauvoir) का प्रसिद्ध वक्तव्य -
“स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि उसे स्त्री बनाया जाता है।”
यह बात बिल्कुल सही है।
लोकधर्म तो हर देश में है और प्रचुर मात्रा में है लेकिन भारत में जो लोकधर्म है वह स्त्रियों के लिए बहुत घातक है। भारत में लोकधर्म का असर न सिर्फ स्त्रियों की दुर्दशा, मनो दसा पर है बल्कि आर्थिक सामाजिक राजनीतिक क्षेत्रों को भी प्रभावित करता है।
जहां धर्म होना चाहिए था सर्वांगीण विकास बिना किसी भेद के चाहे वह स्त्री हो या पुरुष लेकिन ऐसा नहीं है। लोक धर्म ने धर्म का चोला पहन लिया और धर्म के नाम पर सब विकृत कर दिया जिस कारण भारतीय स्त्री हर क्षेत्र में पिछड़ी हुई नजर आती है।
और कई जगह तो नजर ही नहीं आती।
भारतीय लोकधर्म स्त्रियों को बताता है कि तुम्हारी जगह घर में है पति को खुश रखो बच्चों को देखभाल करो बड़ों की देखभाल करो। शादी एक ऐसी स्थिति भी हो सकती थी जहां दो लोग एक साथ बढ़कर एक दूसरे का साथ दे सकते थे लेकिन शादी सबसे बड़ी आफत बन गई यहां शादी का मतलब यह होता है कि पुरुष जितना ज्यादा हो सके स्त्री को घर पर रोक सके।
कपड़े जो एक स्वतंत्र निर्णय होना चाहिए था उसे भी धर्म से जोड़ दिया और घूंघट जैसी कुप्रथाएं प्रचलित हो गई। जो स्त्री अपने ही घर में घूंघट करने लग जाए वह भला अपना विकास कैसे करेगी। स्त्रियों के जहन में डाल दिया गया है कि वह खाना पूरे घर को खिलाकर ही खाए जैसा भी बचा हो।
भारत में अधिकांशत स्त्री को इंसान समझा ही नहीं जाता। वह बस एक भोग्य वस्तु है या बच्चे पैदा करने वाली मशीन।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
उत्तर - आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी इसलिए कहते हैं कि जब अहंकार के पास कुछ भी ना हो कोई भी ना हो पर अपना शरीर तो होता ही है।
3. हां अब खेलों के लिए प्रोत्साहित तो करते हैं पर पर खेलने के लिए बहुत ही काम लड़कियां खेलने पहुंचते हैं।
मैं भी खेलना भूल चुकी थी, मैं भी मान लिया था कि खेलना मेरे जीवन में है ही नहीं। फिर आचार्य जी आए जीवन में और सब बदल गया अब मैं खेलती हूं खुलकर खेलती हूं।
आचार्य जी को सुनने के बाद जीवन में पहली बार स्विमिंग करने गई और मैं अच्छा सीख रही हूं। वह भी मेरे बच्चों के साथ। मैं उन्हें अच्छा कंपटीशन देती हूं। उनकी पहली कोशिश होती है मुझे हरण जो कि इतना आसान नहीं होता। कई बार वह जीत जाते हैं कई बार मैं जीत जाती हूं । मजा आ जाता है।
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Dipti jadhao
1️⃣ भारत में स्त्री को देवी माना जाता हैं और देवी कि छवी जैसी होती हैं वैसा हम महीला को होना चाहिए ऐसा दावा भी किया जाता हैं। सौम्य ,कोमल मर्यादा में बंधी।और जो समाज स्त्री को देवी के रुप में देखता हैं ,उस स्त्री कि हालत उतनी ही बुरी बना दी गयी हैं।भारत में जिस भी प्रतीक को भगवान से जोडकर देखा गया हैं उसकी हालत उतनी बुरी कर दी जाती हैं।
🌿समाज में स्त्री को लेकर मान्यता.........
महीला कि इज्जत उसके काम से नहीं कि, जाती उसके शरीर से कि जाती हैं।अगर एक स्त्री खुद के बलबुते पर कुछ करना चाहती हैं तो सामने स्त्री का शरीर आता हैं।अगर कोई लडकी किसी लडके साथ बात भी कर ले तो उससे कहा जाता हैं,हमारी घर की इज्जत ऐसे सरे आम निलाम करोगी क्या? लडकी को बचपन से ही सजने सवरने को सिखा दिया जाता हैं।समाज स्त्री को एक उपभोग कि वस्तु के अलावा ज्यादा कुछ मानता नहीं ।यहा कैसे पदक आ सकते हैं।
घर - परीवार से स्त्री को लेकर मान्यता..........
हमारे घरो में स्त्री को लेकर बहुत सी मान्यता गढ दि गयी हैं।माॅं तो सिर्फ घर का काम करती हैं,वह बाहर जाकर कुछ कमा नहीं सकती, क्योंकि वह बहुत कमजोर हैं।बहुत भारी काम उससे नहीं होगा।
जैसे खेल के क्षेत्र मे कही बार खेल के हिसाब से कपडे पहनने होते हैं। लेकीन यहा हमारी मान्यता आ जाती हैं।छोटे कपडे पहन कर इज्जत की निलामी कर रही हैं, ऐसे अनगिनत ताने हर स्त्री के लिये तयार होते हैं।
लोकधर्म...........
हाल के समय मे यह हुआ हैं,विनेश पोगाट जी ने कुस्ती में पदक हासिल किया हैं ,पहीले कुस्ती सिर्फ पुरुष कि दावेदारी वाला खेल माना जाता लेकीन इसमे अब स्त्री भी पदक लेकर आ रही हैं। समाज ने उन्हे ताने देकर उनकी जो स्त्री के लिए मान्यता हैं उसको तोड मरोड दिया हैं।
2️⃣क्योंकि अहंकार कि उत्पत्ती शरीर में ही होती है, वही उसका घर हैं। अहंकार रहता हैं उसी जगह वह सबसे ज्यादा नुकसान करता हैं। अंहकार किसी का सगा नहीं हैं। शरीर के साथ दशको कि वृत्ती हैं जो अहंकार को पोषण देती हैं, इसका सहारा लेकर अहंकार हमारा इस्तेमाल करता हैं।
Sumedha Kaushik
1️⃣ भारत में लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित करने के पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ हैं? लोकधर्म की क्या भूमिका है?
मुझे लगता है कि समस्या केवल यह नहीं है कि भारत में लड़कियों को खेलने के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। उसके पीछे स्त्री के शरीर और उसके जीवन को लेकर हमारी बहुत पुरानी conditioning है।
लोकधर्म ने स्त्री के शरीर को बहुत पहले से ही उसके अपने जीवन के लिए कम और दूसरों की दृष्टि से अधिक देखना सिखाया है—वह कैसी दिखती है, कितनी गोरी है, कितनी पतली या “feminine” है, कैसे कपड़े पहनती है, शरीर कितना ढका हुआ है, शादी के लिए कैसी दिखाई देगी आदि। इसलिए लड़की अपने शरीर को उसकी शक्ति और क्षमता के माध्यम से जानने से पहले ही उसे दूसरों की निगाह से देखना सीख जाती है।
खेल इस conditioning को सीधे चुनौती देता है। खेल में शरीर सजाने की वस्तु नहीं रह सकता। वहाँ शरीर को दौड़ना है, गिरना है, पसीना बहाना है, चोट सहनी है, ताकत विकसित करनी है और अपनी सीमाओं को चुनौती देनी है। Boxing और wrestling जैसे खेल तो और भी सीधे उस “नाज़ुक स्त्री” की छवि को तोड़ते हैं।
मैंने अपने जीवन में भी महसूस किया है कि शरीर को लेकर हमारा संबंध कितना appearance-centred हो सकता है। Boxing में आने के बाद शरीर को देखने की एक दूसरी संभावना दिखाई देती है—मेरे punches कितने powerful हैं, stamina कितना है, legs कितनी मजबूत हैं, balance कैसा है, मैं कितनी देर लड़ सकती हूँ। यहाँ शरीर केवल कैसा दिखता है का प्रश्न नहीं रहता; वह क्या कर सकता है यह भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
लोकधर्म को यह स्वतंत्रता असुविधाजनक भी हो सकती है, क्योंकि उसने स्त्री के लिए पहले से भूमिकाएँ बना रखी हैं—अच्छी बेटी, अच्छी पत्नी, अच्छी माँ, सुन्दर और मर्यादित स्त्री। अगर लड़की अपने शरीर, शिक्षा, आर्थिक जीवन और समय पर स्वयं अधिकार लेने लगे तो इन भूमिकाओं की अनिवार्यता पर प्रश्न उठता है।
महिला पहलवानों का विरोध-प्रदर्शन इसका अच्छा recent example है। जिन महिलाओं से देश medal चाहता है, उन्हीं को अपने sporting institution के भीतर सुरक्षा और dignity के लिए सड़क पर उतरना पड़ा। इससे दिखाई देता है कि केवल महिला को medal जीतते देखकर “देश की बेटी” कह देना empowerment नहीं है। प्रश्न यह भी है कि क्या हम उसे अपने जीवन और शरीर पर वास्तविक agency देते हैं?
इसलिए समस्या “लड़कियाँ sports में कम interested हैं” जितनी सरल नहीं है। बचपन से अगर लड़के को बाहर खेलने, गिरने, लड़ने, risk लेने और physically strong होने की अधिक छूट मिले और लड़की को appearance, modesty, safety और respectability की चिंता दी जाए, तो बाद में दोनों के sporting participation में अंतर आना आश्चर्य की बात नहीं है।
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2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली colony क्यों कहते हैं?
मेरी समझ में “शरीर अहंकार की पहली colony है” का अर्थ यह है कि अहंकार सबसे पहले शरीर को “मैं” और “मेरा” घोषित कर देता है।
शरीर प्रकृति का है। उसका जन्म हुआ है, वह लगातार बदल रहा है, hormones और biological processes से चलता है, बूढ़ा होगा और एक दिन समाप्त हो जाएगा। लेकिन अहंकार उससे अपनी identity जोड़ लेता है—मैं सुंदर हूँ, मैं बदसूरत हूँ, मैं स्त्री हूँ, मैं पुरुष हूँ, मेरा रंग ऐसा है, मेरी height ऐसी है, लोग मेरे शरीर के बारे में क्या सोचते हैं।
और शरीर पर कब्ज़े के बाद समाज के लिए अहंकार को नियंत्रित करना भी आसान हो जाता है। स्त्री को कहा जा सकता है—तुम्हारा शरीर ऐसा होना चाहिए, ऐसे कपड़े पहनो, ऐसे बैठो, menstruation में यह मत करो, तुम्हें माँ बनना चाहिए, muscular मत दिखो, बहुत बाहर मत घूमो। पुरुष को दूसरी conditioning दी जा सकती है—तुम्हें ताकतवर दिखना चाहिए, दर्द नहीं दिखाना, रोना नहीं, masculine दिखाई देना है।
दोनों में शरीर अब सहज जैविक तथ्य नहीं रहा; identity और social approval का battlefield बन गया।
और शायद इसी कारण शरीर को मजबूत करना और शरीर से identity बनाना भी दो अलग बातें हैं। मैं boxing करूँ, strength बढ़ाऊँ और अपने शरीर को सक्षम बनाऊँ—यह अपने-आप में समस्या नहीं है। लेकिन अगर फिर मेरी नई पहचान बन जाए—मैं boxer हूँ, मैं strong हूँ, मुझे दूसरों से अधिक powerful दिखना है—तो अहंकार ने पुरानी colony में केवल नया झंडा लगा दिया।
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मेरे मामले में institutional encouragement बहुत कम रहा है। मेरी पढ़ाई का बड़ा हिस्सा distance/open mode में होने के कारण वैसे भी regular college के sports culture, teams, tournaments और physical activities का हिस्सा बनने का अवसर बहुत कम मिला। लेकिन मेरे कॉलेज के दोस्त भी बताते है की कॉलेज की तरफ़ से ख़ास प्रोत्साहन नहीं मिलता।
हाल में ही मैंने अपने स्तर पर gym or boxing शुरू की। मेरे लिए यह केवल exercise नहीं रही; इसने मेरी अपनी physical weakness को बहुत सीधे सामने रखा है—stamina, strength, balance, speed और endurance जैसी चीज़ें जिन्हें केवल सोचकर नहीं सुधारा जा सकता।
मुझे इसमें यह भी अच्छा लगता है कि boxing शरीर को ornamental चीज़ की तरह देखने की गुंजाइश बहुत कम छोड़ती है। वहाँ इस बात का कोई खास मतलब नहीं कि शरीर केवल देखने में कैसा है। सवाल बहुत concrete हो जाते हैं—क्या मैं दो मिनट का round निकाल सकती हूँ? क्या मैं थकने के बाद भी technique बनाए रख सकती हूँ? क्या मेरे legs और shoulders में पर्याप्त strength है? क्या मैं discomfort के बावजूद training जारी रख सकती हूँ?
मेरे लिए खेल का एक मूल्य यह भी है कि वह शरीर के बारे में कई कल्पनाओं को वास्तविक क्षमता के सामने ला खड़ा करता है। वहाँ केवल अपने बारे में सोचने से काम नहीं चलता—शरीर जितना सक्षम है, उतना ही प्रदर्शन सामने आ जाता है। और फिर काम भी वहीं से शुरू करना पड़ता है।
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Kriti
🌻 बोधकार्य : 6 August 2026 ; Thursday 🌻
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
🌟उत्तर:
भारत के अनेक हिस्सों में आज भी यह धारणा मौजूद है कि लड़की का मुख्य दायित्व परिवार, विवाह और घरेलू जीवन है, जबकि खेल, साहसिक कार्य या सार्वजनिक जीवन पुरुषों के क्षेत्र माने जाते हैं। इसलिए लड़कियों को बचपन से ही "संकोच", "लज्जा" और "मर्यादा" के नाम पर सीमित किया जाता है।
उनके पहनावे, रंग, शरीर और व्यवहार पर अधिक चर्चा होती है, जबकि उनकी प्रतिभा और परिश्रम को गौण कर दिया जाता है।
यदि "लोकधर्म" का अर्थ समाज में प्रचलित परंपरागत मान्यताओं और व्यवहार से लिया जाए, तो वह कई बार इन धारणाओं को मजबूत करता है। उदाहरण के लिए—
कई क्षेत्रों में किशोरावस्था के बाद लड़कियों का खेलना "उचित नहीं" माना जाता है।
महिला खिलाड़ियों के प्रदर्शन की बजाय उनके कपड़ों या निजी जीवन पर सोशल मीडिया में अधिक चर्चा होती है।
2023 में महिला पहलवानों के आंदोलन के दौरान अनेक खिलाड़ियों ने बताया कि खेल संस्थानों में सुरक्षित वातावरण और सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना प्रशिक्षण।
कई परिवारों में आज भी बेटियों के खेल पर होने वाले खर्च को अनावश्यक माना जाता है, जबकि बेटों के लिए उसे निवेश समझा जाता है।
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2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
🌟उत्तर:
आचार्य जी के अनुसार मनुष्य सबसे पहले स्वयं को शरीर मान लेता है। इसी पहचान से "मैं", "मेरा", "मेरा रूप", "मेरी शक्ति", "मेरा लिंग", "मेरी जाति" जैसी धारणाएँ जन्म लेती हैं।
यही अहंकार का प्रारंभिक आधार बनता है। जब व्यक्ति शरीर से अपनी पहचान जोड़ लेता है, तब वह दूसरों को भी शरीर के आधार पर देखने लगता है—जैसे स्त्री-पुरुष, सुंदर-असुंदर, शक्तिशाली-कमज़ोर आदि। इसलिए वे कहते हैं कि शरीर अहंकार की पहली कॉलोनी है; वास्तविक मुक्ति तब है जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर तक सीमित न माने।
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3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
🌟उत्तर:
मुझे खेलना बहुत पसंद है, हतोत्साहित किसी ने किया कि नहीं ये तो नहीं पता ।
Deeksha kumari
1️⃣ भारत में लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित करने के पीछे कौन-सी मान्यताएँ काम करती हैं? लोकधर्म की क्या भूमिका है?
भारत में समस्या केवल संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि उससे भी बड़ी समस्या लोकधर्म द्वारा गढ़ी गई मान्यताएँ हैं। सदियों से यह धारणा बनाई गई कि स्त्री का प्रमुख कार्य घर, परिवार और सेवा है; जबकि साहस, प्रतिस्पर्धा, नेतृत्व और जोखिम पुरुषों के क्षेत्र हैं। इसी कारण खेल, जो आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और शारीरिक क्षमता की माँग करते हैं, लड़कियों के लिए "अनुचित" माने जाते रहे।
आज भी अनेक परिवारों में लड़कियों से कहा जाता है कि "ज़्यादा मत दौड़ो", "धूप में मत खेलो", "रंग काला हो जाएगा", "चोट लग जाएगी", "अब बड़ी हो गई हो, खेलना छोड़ो।" खेल की चर्चा से अधिक उनके पहनावे, शरीर और "मर्यादा" पर ध्यान दिया जाता है। यही लोकधर्म है—जहाँ समाज की रूढ़ियाँ सत्य का स्थान ले लेती हैं।
हाल के वर्षों में महिला पहलवानों का आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है। विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और अन्य खिलाड़ियों को केवल खेल में ही नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षित वातावरण के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। दूसरी ओर, कॉमनवेल्थ खेलों और एशियाई खेलों में भारतीय महिला खिलाड़ियों ने सिद्ध किया कि अवसर मिलने पर वे देश की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कमी महिलाओं में नहीं, बल्कि समाज की मान्यताओं में है।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
आचार्य जी कहते हैं कि अहंकार सबसे पहले स्वयं को शरीर मान लेता है। "मैं यह शरीर हूँ"—यहीं से सारी सीमाएँ, भय, तुलना, आकर्षण और हीनता शुरू होती है। जब व्यक्ति अपनी पहचान शरीर से जोड़ लेता है, तब वह स्त्री-पुरुष, रंग, रूप, जाति, आयु और बाहरी विशेषताओं के आधार पर स्वयं को और दूसरों को देखने लगता है।
यही कारण है कि समाज स्त्री के शरीर को नियंत्रित करने का प्रयास करता है—उसके कपड़े, चाल, व्यवहार और जीवन के निर्णय तक। यदि पहचान शरीर से आगे आत्मबोध में स्थापित हो जाए, तो ये कृत्रिम भेद स्वतः कमज़ोर पड़ जाते हैं। इसलिए आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी कहते हैं, क्योंकि यहीं से अज्ञान और बंधन की पूरी व्यवस्था खड़ी होती है।
3️⃣ क्या आपका कार्यस्थल या अध्ययन स्थल खेल के लिए प्रोत्साहित करता है?
वर्तमान में मैं जिस वातावरण में हूँ, वहाँ खेलों के लिए विशेष प्रोत्साहन या नियमित व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। फिर भी मेरा बैडमिंटन में काफ़ी रुचि है। मै पहले तो नहीं खेल पाती थी, लेकिन अब मैं खेलती हु जब से आचार्य जी को सुनने लगी हूँ, क्योंकि आचार्य जी हमेशा समझाते है कि खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि अनुशासन, साहस, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास विकसित करने का सशक्त साधन हैं। क्योंकि खेल जीवन में प्रतिस्पर्धा से अधिक स्वयं की सीमाओं को चुनौती देने की कला सिखाते हैं।
आभार आचार्य जी मेरे जीवन में आने के लिए। 🙏🙏
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Rakesh Yadav
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है। इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये कि कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
लोकधर्म स्त्री को सबसे पहले एक स्वतंत्र मनुष्य नहीं, बल्कि किसी की बेटी, पत्नी, बहू या माँ के रूप में देखता है। इसलिए उसके शरीर, व्यवहार और निर्णयों पर समाज अपना अधिकार मान लेता है। खेलों में भाग लेना, देर तक अभ्यास करना, यात्रा करना या प्रतिस्पर्धी बनना अक्सर "लड़कियों के लिए उचित नहीं" कहकर रोका जाता है।
हाल के वर्षों में महिला पहलवानों के आंदोलन ने दिखाया कि जब उन्होंने शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई, तो चर्चा का बड़ा हिस्सा उनकी शिकायतों से अधिक उनके चरित्र, नीयत और विरोध पर केंद्रित हो गया। कई बार महिला खिलाड़ियों की उपलब्धियों से अधिक उनके कपड़ों, रंग-रूप या निजी जीवन पर टिप्पणी की जाती है। यह सब बताता है कि समस्या केवल सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि लोकधर्म की उन मान्यताओं में है जो स्त्री को स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं बनने देना चाहतीं। सानिया मिर्जा का ही देखते हैं तो कितने मुस्लिम संगठन थे जो उसके पीछे हाथ धूल कर पड़े रहते थे उसके कपड़ों को ले कर। सानिया के गेम में क्या विशेषता थी को तो उन्हें पता भी नहीं या मायने ही नहीं रखती ये बात।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
आचार्य जी कहते हैं कि अहंकार सबसे पहले स्वयं को शरीर मान लेता है। "मैं यही शरीर हूँ" यहीं से 'मैं' और 'दूसरे' का विभाजन शुरू होता है। इसके बाद जाति, धर्म, लिंग, परिवार, भाषा, देश और असंख्य पहचानें इसी पहली पहचान के ऊपर खड़ी होती जाती हैं।
जब हम स्वयं को केवल शरीर मानते हैं, तब स्त्री और पुरुष का भेद भी अंतिम सच लगने लगता है। फिर शरीर के आधार पर श्रेष्ठता, हीनता, अधिकार और नियंत्रण की पूरी व्यवस्था खड़ी हो जाती है। इसलिए शरीर अहंकार की पहली कॉलोनी है - वह पहला क्षेत्र जहाँ अहंकार अपना शासन स्थापित करता है।
3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
यह उत्तर व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित होगा। उदाहरण के लिए:
"मेरे घर, कार्यस्थल/शिक्षण संस्थान में खेलों को कुछ हद तक प्रोत्साहन मिलता रहा है, लेकिन नियमित अभ्यास और भागीदारी की संस्कृति अभी भी सीमित है। मेरा मानना है कि खेल केवल शरीर को स्वस्थ नहीं बनाते, बल्कि अनुशासन, साहस और टीम भावना भी विकसित करते हैं। यदि हम खेल को केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि आत्म-विकास का माध्यम मानें, तो अधिक लोग इससे जुड़ेंगे।
मेरी पत्नी को बोल बोल कर भी बाहर वॉक करने तक नहीं जाती, वहीँ बच्चे के साथ जाएगी भी तो महिलाओं के साथ गपबाजी में ज़्यादा ध्यान रहता है न कि कुछ खेल कूद लूँ - इसको थोड़ा जानने का प्रयास करता हूं तो परिवार में महिलाओं का खेलना जैसे कोई बड़ी खगोलीय घटना हो। मुझे खेले बिना चैन नहीं आता और बच्चे के साथ निरंतर ट्रेनिंग करता हूं जब भी चंडीगढ़ रहता हूं!
Radha Sengar
1️⃣ भारत में लड़कियों को खेलने के लिए कभी प्ररित नहीं किया जाता था ।
लड़कों को बाहर खेलने की इजाजत रहती थी लड़कियों को नहीं ।
लड़कियों को केवल घर के अंदर खेलने वाले खेल ही खेलने दिये जाते हैं !
भारत में महिलाओं को सिर्फ घर के कामों को सिखाने को महत्व दिया जाता है ।
घर में तो महिलाओं के ऊपर बहुत सारे बन्धन थोपे ही गये थे ऊपर से लोकधर्म ने इन बेमतलब के नियम लाद दिये , लड़की को ऐसे चलना चाहिए, ऐसे बैठना चाहिए, ऐसे खाना चाहिए,
धीरे बोलना चाहिए, और कैसे कपड़े पहनने चाहिए सब लोकधर्म तय करता है ।
ऐसे में महिलायें को बाहरी सफलता हासिल करने में बहुत संघर्ष करना पड़ता है ।
महिलायें अगर थोड़ा बदलने का प्रयास भी करती है तो समाज में उसको बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है ।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
क्योंकि अंहकार का घर शरीर ही है , वो शरीर में ही रहता है ,
सारा कुनवा भी अंहकार शरीर के द्वारा ही बनाता है ।
3️⃣ आचार्य जी को सुनकर मेरे पति में बहुत परिवर्तन आया है ,
अब वो मुझे जो मेरे हित में उनको करने से बिल्कुल नहीं रोकते बल्कि मुझे मजबूत बनाने में सहयोग करते हैं ।
MAMTA
प्रिय आचार्य जी..
मेरा नाम धड़कन है। मैं आपको अपनी मम्मी के साथ 2022 से सुन रही हूं।
आपको सुनने के बाद मुझे समझ आया कि पढ़ाई के साथ-साथ खेलना स्वास्थ्य के लिए कितना जरूरी है। मुझे अच्छा लगा, फिर खेलों में भाग लेना शुरू किया। फिर मुझे इतने सारे 🥇 मिले—कभी कबड्डी, कभी खो-खो, कभी रेस, कभी रोप स्कीपिंग, कभी सिंगिंग, कभी डांसिंग, कभी क्रिकेट, कभी डिबेट, कभी कविता, कभी योगा, बहुत कुछ।
और पढ़ाई में फर्स्ट पोजीशन। मुझे ऑल राउंडर की ट्रॉफी भी मिली अपने स्कूल से, और सभी टीचर का प्यार भी।
जब हम रोप स्कीपिंग में नेशनल खेलने के लिए दिल्ली से झारखंड गए थे, तो वहां से जीतकर वापस आने पर हमें 5000 का चेक मिला। अच्छा लगा। फिर वो पैसे खुशी-खुशी अपनी काउंसलर चेतना मैम से बात करके संस्था को डोनेट कर दिया।
क्योंकि मुझे ट्रॉफी और 🥇 पसंद है। मैं छोटी हूं, मैं पैसा क्या करूंगी? मुझे जो चाहिए, वो मां खुद ही दिलाती हैं।
ये सब आचार्य जी को सुनने की वजह से मिला।
मुझे सही रास्ते दिखाने के लिए थैक्यू, आचार्य जी।
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Madhavi sahu
बोधकार्य:
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
मनुस्मृति में महिला को बचपन में पिता के ऊपर निर्भर दिखाया जाता है, और युवावस्था में पति के ऊपर एवं वृद्धावस्था में पुत्र के ऊपर निर्भर माना जाता है। यही व्यवस्था अभी भी काम कर रही है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं?
(क) स्त्री का शरीर निजी नहीं, सामाजिक निगरानी की वस्तु है
लड़के के मजबूत शरीर को खेल-कौशल माना जाता है, लेकिन लड़की के उसी मजबूत, मांसल शरीर को कई बार “सुंदरता” और “स्त्रियोचित” होने के पैमाने से देखा जाता है। परिणाम यह कि खिलाड़ी की गति, ताकत और तकनीक के बजाय उसके कपड़े और शरीर चर्चा का विषय बन जाते हैं।
(ख) “अच्छी लड़की” की परिभाषा—संकोची, नियंत्रित और घर-केंद्रित
कई परिवारों में लड़की के लिए प्राथमिकताएँ होती हैं—पढ़ाई करो, सुरक्षित रहो, शादी के योग्य रहो; जबकि खेल को चोट, धूप, यात्रा, अलग पोशाक और लड़कों के साथ प्रशिक्षण से जोड़कर “अनावश्यक जोखिम” माना जाता है।
इसका एक उदाहरण धाविका ज्योति याराजी का है। उन्होंने बताया कि किशोरावस्था में उन्हें खेल में करियर बनाने को लेकर अपने भाई की असहमति का डर था और उन्होंने उसे पत्र लिखकर दौड़ने की अनुमति माँगी थी।
लोकधर्म में प्रश्न बन जाता है—“लोग क्या कहेंगे?”
यही “लोकधर्म” स्त्री के लिए कई अदृश्य नियम बना देता है:
लड़की को कितना शरीर दिखाना चाहिए?
कैसे कपड़े पहनने चाहिए?
कितनी देर बाहर रहना चाहिए?
किसके साथ खेलना चाहिए?
खेल में शरीर को कितना मजबूत/मांसल बनाया जा सकता है?
इसलिए वास्तविक बदलाव यह नहीं है कि हम केवल अधिक लड़कियों को खेल मैदान तक पहुँचाएँ। बदलाव तब होगा जब हम यह जानें कि महिला का शरीर प्रदर्शन की वस्तु नहीं, उसकी क्षमता का साधन है; और उसकी मर्यादा समाज की निगाह से नहीं, उसकी स्वतंत्रता और विवेक से तय होगी।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?अहंकार पहला अंधविश्वास है— जो हर चीज को बिगाड़ता है। लेकिन वह पहले शरीर को बिगाड़ता है।
यदि आपसे कोई कहे—तुम सुंदर हो।
ये अहंकार को पोषण देता है। इससे महिला स्वयं को और ज्यादा शरीर मानने लगती है।
वो सिर्फ शरीर को चमकाने में लग जाती है।
इस तरह से वह विगलन की दिशा में जाना छोड़ वह अहंकार के गर्त में जाने लगेगी।
इसलिए आचार्य जी ऐसा कहते हैं।
3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
मेरे पति ने मुझे खेल में जाने के लिए प्रेरित किया। मैं बॉक्सिंग सीख रही हूं।
Ram Sharma
1️⃣ लोकधर्म के कारण भारत में यह मान लिया गया है कि खेलकूद सिर्फ लड़कों के लिए ही होते हैं, लड़कियां घर के काम करती हुई ही अच्छी लगती है और शादी करके दूसरे घर जाकर फिर उस दूसरे घर के काम काज करते हुए और अपने बच्चों और पति की देखभाल करने के लिए होती है। परंतु वास्तविकता बिल्कुल अलग है, खेल भेदभाव नहीं करते गोल्ड मेडल का कलर गोल्ड ही रहेगा फिर चाहे वह लड़की लाए या फिर लड़का। 🥇
लोकधर्म में यही सिखाया जाता है कि कैसे आप एक आदर्श बेटी, आदर्श पत्नी, आदर्श बहू, आदर्श मां बन सकती हो लेकिन एक आदर्श खिलाड़ी बनना कभी उसे सिखाया ही नहीं जाता।
उदाहरण के तौर पर वर्तमान भारतीय हॉकी टीम की अनेक खिलाड़ियों ने बताया कि किस प्रकार जब वो practice के लिए घर से बाहर निकलती थी तो पूरा समाज उनके कपड़ों को लेकर प्रश्न चिन्ह खड़े करता था, यह सोच लोकधर्म की ही देन है।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी कहते हैं क्योंकि अहंकार शरीर के द्वारा ही अपने विषयों को और अधिक मजबूती प्रदान करता है। वह शरीर को समझा सकता है तुम कमजोर हो, या तुम एक लड़की हो। खेलकूद तुम्हारे लिए नहीं बने तुम इनसे दूर रहो इत्यादि - इत्यादि।
3️⃣ एक Cricket match खेलते हुए, मैं wicket keeping कर रहा था तो match का first ball ही ground पर bounce करके मेरी नाक पर लगा और खून ऐसे बहा जैसे किसी ने water tap on करदी हो।
मुझे लगा ठीक है होता है, लेकिन फिर दोस्तों के चेहरे पर डर देखकर थोड़ा सा डर मुझे भी लगा कहीं मेरी नाक vecna [Stranger Things] के जैसी तो नहीं हो गई, उसके बाद headache भी होने लगा फिर मेरे दोस्त मुझे hospital लेकर गए जहाँ xray हुआ और उसमें 2 fractures आये।
Doctors ने कहा बेटा 6-7 महीने rest करना है अब practice नहीं हो पाएगी। उस time कुछ समझ नहीं आ रहा था बस दर्द बर्दास्त के बाहर हो रहा था फिर सोचा यार इस moment की एक picture तो capture करनी चाहिए मेरे दोस्त मुझे देख कर डरे हुए थे और मैं smile के साथ photo click करवा रहा था।
मेरे इस pic को देखकर बहुत सारे दोस्तों ने पूछा हँस कैसे रहा था यार तू इतनी चोट के बाद मैंने कहा geeta sessions join कर लो तुम भी हँसने लगोगे ऐसी छोटी- मोटी injury पर।
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Durgesh Chandrawanshi
Wisdom activity 06/08/2026
1. Women are enslaved by putting them on pedestal first during crucial years of their careers and forcing them to marry fast, this tendency supports the current exploitative social structure.
By making poetry about their physical appearance or by promoting being external attractive and gentle what they are doing is enforcing their body identification.
2. The ego when starts to identify itself with body, as I'm a women or I'm a man, all the related social norms and bondages starts to enter one's life.
3. Yes, they encourage sports activities, though I need to increase my involvement in various games, currently I do cycling and weightlifting workouts.
~🌻
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Gagan Bala
बोध कार्य: 06/08/2026
1⃣मेरे अनुभव में लड़कियों के खेलों से दूर होने का एक बड़ा कारण केवल सुविधाओं की कमी नहीं, बल्कि समाज की नज़र है। मैं अपनी 12 वर्षीय बेटी वेदिका को रोज़ स्विमिंग के लिए लेकर जाती हूँ।
कुछ दिन पहले मैंने देखा कि लगभग 16–17 वर्ष की दो लड़कियाँ अभ्यास से ज़्यादा समय अपने कपड़े ठीक करने में लगा रही थीं। वे बार-बार अपनी टी-शर्ट नीचे खींच रही थीं, मानो तैराकी से ज़्यादा चिंता लोगों की नज़रों की हो।
मुझे लगा कि समाज लड़कियों को बचपन से ही शरीर के प्रति इतना सजग और असहज बना देता है कि खेल भी खुलकर नहीं खेल पातीं। समस्या शरीर में नहीं, देखने वाली दृष्टि में है। लेकिन लोकधर्म बार-बार यही सिखाता है कि "लोग क्या कहेंगे?" और यही डर लड़कियों की स्वतंत्रता और खेल—दोनों को सीमित कर देता है।
आचार्य जी से जुड़ने के बाद समझ आया कि जीवन भीड़ की मान्यताओं के अनुसार नहीं, सत्य के अनुसार जीना चाहिए। जब तक लोकधर्म हावी रहेगा, तब तक खेल के मैदान में बराबरी केवल नीतियों से नहीं आएगी, दृष्टि बदलने से आएगी।
2⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी इसलिए कहते हैं क्योंकि हमारी पहली पहचान ही शरीर से बन जाती है—मैं स्त्री हूँ, पुरुष हूँ, सुंदर हूँ, कमजोर हूँ। फिर पूरा जीवन इन्हीं पहचानों की रक्षा और तुलना में निकल जाता है।
जब तक हम स्वयं को केवल शरीर मानते रहेंगे, तब तक समाज भी हमें शरीर के आधार पर नियंत्रित करता रहेगा। शरीर साधन है, हमारी वास्तविक पहचान नहीं। यही समझ हमें भय और हीनता से मुक्त करती है।
3⃣मैं हरियाणा से हूँ, जहाँ खेलों का अच्छा माहौल है। लड़को के मुकाबले लड़कियों का रुझान तो कम है पर फिर भी काफी है। मैंने अपनी बेटी वेदिका को बचपन से किसी न किसी खेल से जोड़े रखा—पहले स्केटिंग, फिर कराटे और अब स्विमिंग।
आज वह 12 वर्ष की है, जिला स्तर पर दूसरा स्थान प्राप्त कर चुकी है और स्कूल गेम्स की जिला स्तरीय प्रतियोगिता की तैयारी कर रही है।
आचार्य जी से जुड़ने के बाद बच्चों की परवरिश को लेकर मेरी दृष्टि बदली है। अब मेरा उद्देश्य केवल पदक नहीं, बल्कि बेटी का निर्भय, स्वतंत्र और स्वस्थ व्यक्तित्व है। खेल अब मेरे लिए प्रतियोगिता से अधिक आत्म-विकास का माध्यम है।
विडियो में बेटी वेदिका (रेड कैप) में ❤❤
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KIRTI JAIN
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइए कि कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
उत्तर 1️⃣ : हमारा समाज लोकधर्म के हिसाब से ही चलता है जो कि समाज में प्रचलित मान्यताओं और संस्कृतियों को देखकर समझ आता है। समाज में महिलाएँ का जो स्थान है उससे साफ तौर पर समझा जा सकता है कि वो श्रुति धर्म पर नहीं बल्कि स्मृति धर्म पर चलता है। जैसे कि मनुस्मृति में लिखा है कि एक महिला को हमेशा पिता, पति या पुत्र पर आश्रित ही रहना है, तो इस ही प्रकार की धारणा हमें पूरे समाज में फैली हुई दिखती है।
हाल के उदाहरण लेकर समझें तो देखा जा सकता है किस प्रकार महिलाएँ स्वयं ही कैसे रूढ़िवादी धर्म का हिस्सा बनकर खुद के ही शोषण का कारण बन गई हैं। और वो ऐसे कर्मकाण्डों में हिस्सा लेने को ही धर्म मानती हैं। वो ये तक नहीं समझ पातीं कि उनको ऐसे ही लोकधर्म में फँसाकर उनको दबाए रखने का उपक्रम किया जा रहा है।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
उत्तर 2️⃣ : आचार्य जी ने AP Framework द्वारा समझाया है कि अहंकार मनुष्य के शरीर के साथ ही जन्म लेता है और जब तक शरीर मनुष्य के इस रूप में रहता है तब तक उसमें अहंकार भी रहता ही है। हम उस अहंकार को क्षीण भी कर सकते हैं और सघन भी; वो हमारे चुनाव पर है। हम में स्वयं के प्रति कितना प्रेम है, ये उस पर निर्भर करता है कि हम अहंकार को सघन करने की दिशा में बढ़ेंगे या क्षीण करने की। अहंकार जितना अधिक सघन होगा वो उतने ही सहारे ढूँढेगा और उतना ही अधिक अपनी वृत्तियों पर चलने में सुविधा मानेगा। इसके विपरीत अहंकार जैसे-जैसे क्षीण होता जाएगा, वो निरालंब होने की ओर बढ़ेगा और दूसरों का सहारा स्वयं बनेगा।
3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
उत्तर 3️⃣ : मेरा खुद का ही व्यवसाय है जहाँ मैं दोपहर बारह से रात के 9:30 तक काम करता हूँ। इस समय के बाद मैं अक्सर घर पहुँचकर TV देखकर सो ज़ाया करता था। आचार्य जी से जुड़ने के बाद मैं अपने काम से आने के बाद सर्दियों में cycling करने जाता था और अभी badminton भी शुरू किया है। सत्रों से जुड़ने के बाद से खुद को चैलेंज करने में मजा आने लगा है। साफ-साफ समझ आता है कि अंदर कुछ है जो बहुत सारे तर्क दे रहा है खुद को न टूटने देने के, उस सब के बवाजूद भी खुद को खुद से तोड़ने में और उसके बाद के संघर्ष के बाद खुद को शाबाशी देने में मज़ा आने लगा है। कई बार जब उस बचने की पुकार और लालच के आगे घुटने टेक देता हूँ तो बाद में दुख और बेचैनी भी होती है। वो दुख दोबारा न उठ पाए, इसलिए उसको भी अच्छी तरह धयान में रखता हूँ कि ये क्यों ही उठा।
Badminton खेलते हुए ही कल का ही वीडीओ साझा कर रहा हूँ।
anuradha sharma
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये कि कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
भारत में लड़कियों को खेल से दूर रखने के पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि एक पूरा लोकधर्म काम करता है — वह सामूहिक, अलिखित नियमों की व्यवस्था, जो बताती है कि "अच्छी लड़की" कैसी दिखनी चाहिए। खेल में पसीना, चोट, शॉर्ट्स, प्रतिस्पर्धा — ये सब उस "शालीनता" की छवि से टकराते हैं, जो समाज ने स्त्री पर थोप रखी है। इसलिए बेटी को मैदान में उतरने से पहले ही रोक दिया जाता है, या रोका न भी जाए, तो उसकी काबिलियत की जगह उसका पहनावा चर्चा का विषय बन जाता है।
हाल के उदाहरण इसे साफ़ दिखाते हैं — जब भी कोई भारतीय महिला एथलीट शॉर्ट्स या फिटेड स्पोर्ट्सवियर में मेडल जीतती है, सोशल मीडिया पर उसकी उपलब्धि से पहले उसके "पहनावे" पर टिप्पणियाँ आने लगती हैं। विनेश फोगाट और साक्षी मलिक जैसी पहलवानों का संघर्ष भी यही दिखाता है — उन्हें मैदान की चुनौतियों से ज़्यादा समाज की उस निगाह से लड़ना पड़ा, जो एक महिला पहलवान के शरीर को "अनुचित" मानती थी। यह लोकधर्म स्त्री को यह याद दिलाता रहता है कि उसका शरीर पहले "देखे जाने" की वस्तु है, "प्रदर्शन" का माध्यम बाद में।
आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी इसलिए कहते हैं क्योंकि अहंकार का जन्म ही शरीर के साथ तादात्म्य (identification) से होता है। "मैं यह देह हूँ" — यही वह पहला झूठ है, जिस पर बाकी सारा अहंकार-भवन खड़ा होता है। जन्म लेते ही चेतना सबसे पहले शरीर को अपना घर, अपनी सीमा और अपनी पहचान मान लेती है। फिर उसी शरीर के आधार पर लिंग, जाति, रंग, सुंदरता, ताक़त — ये सारी कॉलोनियाँ एक के बाद एक बसती चली जाती हैं।
इसीलिए स्त्री के शरीर पर समाज की जो पकड़ है — नाज़ुकता थोपना, शर्म सिखाना, "छुईमुई" बनाना — वह दरअसल अहंकार की उसी कॉलोनी को और मज़बूत करने का तरीका है। जब तक कोई देह से खुद को देह ही समझता रहेगा, वह उन नियमों से बंधा रहेगा, जो देह पर थोपे गए हैं। मुक्ति वहीं से शुरू होती है, जहाँ यह साफ़ हो जाए — मैं देह नहीं हूँ, देह मेरा माध्यम है, मेरी सीमा नहीं।
योगा करते हुए मेरी फ़ोटो
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Kalpana
1️⃣ भारत में लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित करने के पीछे की मान्यताएँ
🔸समाज मानता है कि स्त्री का शरीर व्यक्तिगत नहीं, पारिवारिक और सामाजिक "इज़्ज़त" की संपत्ति है। इसलिए दौड़ना, कूदना, पसीना बहाना, टाइट कपड़े पहनना, यह सब "मर्यादा" के विरुद्ध माना जाता है।
🔸माँ-बाप को डर रहता है कि खेलने से रंग काला पड़ेगा, शरीर "मर्दाना" दिखेगा (कंधे चौड़े हो जाने का मुद्दा), चोट लगेगी, और यह सब शादी के बाज़ार में उसकी "क़ीमत" घटा देगा।
🔸यहाँ लोकधर्म का मतलब है वह अलिखित, रोज़मर्रा का सामाजिक नैतिकता-तंत्र जो शास्त्रों से नहीं, बल्कि गली-मोहल्ले की टिप्पणियों, सास-ननद की नज़रों, और "लोग क्या कहेंगे" से चलता है।
हाल के उदाहरण:
🔸 जुलाई 2026 में एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप के दौरान भारतीय महिला धाविकाओं की जर्सी की लंबाई को लेकर सोशल मीडिया पर हुई बहस, प्रदर्शन से ज़्यादा पहनावे पर चर्चा।
🔸कुश्ती जैसे खेलों में महिला पहलवानों को अक्सर परिवार में यह सुनना पड़ता है कि "यह लड़कों का खेल है, तुम्हारी शादी में दिक़्क़त होगी।" यही वजह है कि विनेश फोगाट और साक्षी मलिक जैसी खिलाड़ियों का संघर्ष सिर्फ़ मैदान तक सीमित नहीं रहा, घर की सहमति जीतना भी एक लड़ाई थी।
🔸कबड्डी और फुटबॉल जैसे "स्पर्श-आधारित" खेलों में लड़कियों की भागीदारी पर अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि "यह खेल लड़कियों के लिए ठीक नहीं," जबकि लड़कों के लिए वही खेल शौर्य का प्रतीक है।
अंततः मुद्दा सिर्फ एक ही है कि एक लड़की के शरीर को बचाकर रखो कि वह बच्चे जन्म देने तक सीमित थे बस और इस तरह उसके ऊर्जा पर एक अदृश्य नियंत्रण बनाए रखता है।
कल की बात फिर एक बार घर में मुद्दा बन गया कहते हैं अगर शादी नहीं करोगी तो सृष्टि रुक जाएगी फिर कहते हैं अबकी बार खूब शादी हुई क्षेत्र में😂 , इसका मतलब ये हुआ कि अगर जिधर भीड़ जा रही है तो अंधी थोड़ी है। फिर कहते हैं समाज ही तो आईना है।यही है फिर जब आचार्य जी कहते हैं उम्र तो खेलने की भी निकली जा रही है तब अहंकार ऐसा चोटिल होता है कि फिर कुछ दिन के लिए मुँह पर ताला लग जाता है।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
अहंकार के पास कोई विषय हो या न हो लेकिन शरीर तो जन्मजात मिला हुआ है तो उससे अलग तो छिन भर नहीं है इसीलिए तो पहली कॉलोनी है।
अहंकार सबसे पहले शरीर पर ही अपनी पकड़ बनाता है। "यह शरीर मेरा है," "यह शरीर कैसा दिखे," "यह शरीर किसके नियंत्रण में रहे," और फिर यही दावा नियंत्रण समाज स्त्री के शरीर पर करता है क्योंकि इस पर नियंत्रण के बाद ही उसकी चेतना पर कब्ज़ा करता है।
3️⃣ खेलों को प्रोत्साहन
नहीं, बिल्कुल नहीं पहले काम होना चाहिए खेल में क्या रखा है हमें इतना अच्छे से बचपन से ही दिमाग में घुसा जो दिया गया है
"पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब।"
ये इतना आसानी से कैसे निकले।
लेकिन मैं फिर भी खेलती हूँ वैसे तो मैं हमेशा से लगभग फिजिकल वर्क करने की तरफ झुकाव रहा ही है कि कुछ शारीरिक श्रम तो चाहिए शरीर को नहीं तो थोड़ा अजीब लगने लगता है कि आज कुछ तो नहीं किया।
रनिंग तो मैं हमेशा से करती थी लेकिन आचार्य जी से जुड़ने के बाद ही मैंने रनिंग में मेडल भी प्राप्त किए और अब बैडमिंटन भी खेलती हूँ और रनिंग तो मुझे अधिक प्रिय है क्योंकि मुझे इससे काफी बाहरी तौर पर ही नहीं आंतरिक तौर पर भी काफी मजबूत बनाता है। और साइकिलिंग भी करती हूँ।
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ARCHANA TAK
जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
1. लड़की को बाहर धूप मिट्टी में खेलने भेजते हैं तो, वह काली, हो जाती है, बाल व खाल खराब हो जाती है, चोट लगती है तो कौन बियाह करेगा इससे 😅
2 पिरियड आ जाता है, तो दौड़ धूप नहीं करना चाहिए अधिकतर जगह कोच व साथ वाले पुरूष होतें हैं, गलत संगत में पड़ सकती है, पिरियड में स्विमिंग कैसे करेगीं 😅
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
शरीर को जरूरत होती है खेलने की, पर अहंकार कहता है क्यो परेशान होना है मस्त पड़े रहो,सुवर की तरह खाओ व लोट जाओ। कौन दोडे़ अहंकार चाहता ही नहीं की उसकी गंदी आदत छूटे, उसे खेलने से भय लगता है क्योंकि उसमें मेहनत लगती है, संघर्ष करना पड़ता है स्वयं से।
3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
हाँ आचार्य जी हम आचार्य जी के गीता सत्रों से जुड़े हैं, तब से आचार्य जी ने सदैव प्रेरित किया है कुछ ना कुछ सीखों,मेने स्विमिंग सीखी है
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Deepak Kumar
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
हमारे घर में गांव और परिवार में ऐसा है कि उसे खेल के नाम पर सिर्फ लड़कों खेलने दिया जाता हैं। यहां की वातावरण और आधारभूत संरचना कमी के साथ कई सारी अंधी मान्यता और शोषक व्यवस्था भरपूर है जिसका हिस्सा हम है।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
अहंकार असत्य का केंद्र है। जो है नहीं उसका केन्द्र है। Ap framework के अनुसार अहम शरीर का जन्म स्थान है लेकिन भस्मासुर की भांति अपने मैं का विस्तार करते हुए शरीर को अपनी जैविक संरचना से मानसिक अहंकार की संरचना बनाकर उनका शोषण करता है। इसलिए इसे कॉलोनी कहा गया है।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ 7.4
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥7.5
अहंकार से परे क्या है केवल अहंकार और मन से परे क्या है मन बाकी आठो तत्व अपने प्राकृतिक गुणों के रूप कार्य सहज रूप से करते हैं अहंकार यह न्यून रहे।
Harikishore Mahto
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं और लोकधर्म की भूमिका क्या है?
भारत में लड़कियों को खेल से रोकने के पीछे 3 गहरी मान्यताएँ हैं। ये जैविक सच नहीं हैं, ये समाज द्वारा बनाई गई "कहानियाँ" हैं। और इन्हीं कहानियों को AP फ्रेमवर्क में 'लोकधर्म' कहते हैं।
वो 3 गहरी मान्यताएँ:1. "स्त्री का शरीर = इज्ज़त का विषय, प्रदर्शन का नहीं"
लोकधर्म ने शरीर को 2 हिस्सों में बाँट दिया:
- पुरुष का शरीर = ताकत, मेडल, गर्व
- स्त्री का शरीर = लज्जा, पर्दा, "संस्कार"
इसलिए जैसे ही लड़की शॉर्ट्स, जर्सी या बिना दुपट्टे के दौड़ती है, चर्चा खेल से हटकर "पहनावे" पर चली जाती है। मेडल बाद में आता है, "लोग क्या कहेंगे" पहले।
2. "अच्छी लड़की = चुप, सहनशील, घर में रहने वाली"
लोकधर्म में स्त्री के 2 ही रोल तय हैं: आज्ञाकारी पुतली या पूज्य देवी।
तीसरा रोल नहीं - "संघर्ष करने वाली, गिरने वाली, जीतने वाली इंसान"।
खेल में हार-जीत, चोट, गुस्सा, जिद सब चलता है। लोकधर्म को ये "अनलेडी" लगता है। इसलिए कहते हैं "बेटी हो, संभलकर रहो"।
3. "खेल = टाइम पास, करियर नहीं। और वो भी लड़कों के लिए"
लोकधर्म में लड़की की सफलता = शादी + घर।
अगर परिवार अमीर है तो "खेलने की जरूरत क्या है?"।
अगर गरीब है तो "पढ़-लिखकर नौकरी कर लो, खेल में क्या रखा है?"।
इसलिए 14 साल की उम्र के बाद लड़कियां लड़कों से दोगुनी रफ्तार से खेल छोड़ देती हैं।
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लोकधर्म की भूमिका - हाल के उदाहरण
लोकधर्म = क्षैतिज तल। "समाज क्या सोचेगा" वाला धर्म। ये रुकावट बनता है:
1. विनेश फोगाट, साक्षी मलिक, बजरंग पूनिया - 2023 का आंदोलन
मुद्दा: शोषण और असुरक्षा।
लोकधर्म की प्रतिक्रिया: सबसे पहले सवाल उनके "चरित्र", "प्रोटेस्ट की टाइमिंग", "राजनीति" पर उठे।
असली मुद्दा गायब। क्योंकि लोकधर्म कहता है "अच्छी बेटी चुप रहती है, शिकायत नहीं करती"। बोलने वाली को ही दोषी बना दो।
2. पहनावे पर बहस हर टूर्नामेंट में
चाहे बैडमिंटन में PV सिंधु हो, एथलेटिक्स में दुती चंद हो, या फुटबॉल टीम।
हर बार कमेंट में पहले आता है "ये क्या पहना है, संस्कार कहाँ गए?"।
अमेरिका में 1973 से समान पुरस्कार राशि है, वहाँ चर्चा परफॉर्मेंस की होती है। यहाँ चर्चा कपड़ों की। ये लोकधर्म है।
3. "बेटी सुरक्षित रहेगी इसलिए बाहर मत भेजो"
कोच, ग्राउंड, हॉस्टल की कमी को "सुरक्षा" के नाम पर जस्टिफाई कर दिया जाता है।
जबकि नीदरलैंड, न्यूज़ीलैंड जैसे देश छोटी आबादी में भी महिला हॉकी/रग्बी में चैंपियन हैं क्योंकि वहाँ ढाँचा और नीयत है।
हमारे यहाँ "सुरक्षा" बहाना बन गया है नियंत्रण का।
4. कमाई और मीडिया कवरेज
2024 में दुनिया के टॉप 100 कमाई वाले एथलीटों में 1 भी महिला नहीं।
महिला फुटबॉल वर्ल्ड कप 2023 की प्राइज मनी = पुरुष की 1/4।
लोकधर्म मानता ही नहीं कि स्त्री से "राष्ट्रीय गर्व" आ सकता है। इसलिए स्पॉन्सर, मीडिया, फेडरेशन पैसा नहीं लगाते।
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1 लाइन में सार:विकसित देश खेल को "राष्ट्रीय शक्ति" मानते हैं।भारत का लोकधर्म खेल को "लड़की की मर्यादा का खतरा" मानता है।
जब तक हम "अच्छी लड़की" की कहानी से "सशक्त इंसान" की कहानी पर नहीं जाएंगे, तब तक कॉमनवेल्थ में 8/13 स्वर्ण जीतने के बाद भी ओलंपिक में हम 10 पदक पर अटके रहेंगे।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?,
क्योंकि अहंकार को पैदा होने के लिए सबसे पहली जमीन यहीं मिलती है।
AP फ्रेमवर्क में अहंकार = "मैं" की झूठी कहानी।
और वो कहानी शुरू ही शरीर से होती है।
3 वजह:1. पहचान यहीं से शुरू होती है
बच्चा सबसे पहले क्या सीखता है? "ये मेरा हाथ है, मेरा पैर है, मेरा चेहरा है"।
धीरे-धीरे "मेरा शरीर" से "मैं शरीर हूँ" बन जाता है।
"मैं गोरा हूँ, काला हूँ, मोटा हूँ, लंबा हूँ" - सारी पहचान शरीर पर चिपक गई।
जब तक शरीर से चिपकाव है, तब तक अहंकार को खाना मिलता रहेगा।
2. तुलना और संघर्ष यहीं से शुरू होता है
"उसका शरीर मुझसे बेहतर है" - ईर्ष्या
"मेरा शरीर ऐसा क्यों नहीं" - शर्म
"लोग मेरे शरीर के बारे में क्या सोचेंगे" - डर
सारा खेल शरीर को लेकर है। समाज भी सबसे पहले शरीर को ही कंट्रोल करता है:
"ऐसे मत बैठो, ऐसे मत हंसो, ये मत पहनो, इतना मत खाओ"।
शरीर गुलाम = मन गुलाम। इसलिए ये पहली कॉलोनी है।
3. भोग यहीं से होता है
अहंकार को सुख चाहिए। और सुख का सबसे पहला दरवाजा शरीर है - खाना, नींद, स्पर्श, दिखावा।
शरीर के सुख में फंसते ही हम "अनुभवोक्ता" बन जाते हैं। "मैंने मजा लिया"।
योग में उल्टा होता है - शरीर को औज़ार बनाते हैं, मालिक नहीं बनने देते।
खेल के उदाहरण से समझें:
जब ली मेइज़ेन 34वें km पर पीरियड्स के दर्द के बावजूद 42km दौड़ पूरी करती है,
तब वो शरीर की कॉलोनी तोड़ रही होती है।
वो कह रही होती है "दर्द है, पर मैं दर्द नहीं हूँ"।
विनेश फोगाट जब चोट और शोषण के बाद भी अखाड़े में उतरती है,
तब वो साबित कर रही होती है कि शरीर "इज्ज़त" की वस्तु नहीं, "शक्ति" का औज़ार है।
1 लाइन में सार:शरीर अहंकार की पहली कॉलोनी है क्योंकि यहीं "मैं" पैदा होता है।
जिस दिन तुम शरीर के साक्षी बन गए, उसी दिन कॉलोनी आज़ाद हो गई।
इसीलिए खेल बहुत बड़ा बोध का रास्ता है। वो शरीर को गुलाम से योद्धा बना देता है।
3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।प्रोत्साहित करने वाली जगह की 3 निशानी:
1. बजट और साधन: ग्राउंड, कोच, इक्विपमेंट, पीरियड्स के लिए सुविधा। सिर्फ भाषण नहीं।
2. भाषा: लड़कियों से कहा जाए "जीतकर आओ" न कि "संभलकर खेलना"।
3. रोल मॉडल: दीवार पर सिर्फ विराट कोहली नहीं, PV सिंधु, मैरी कॉम, मिताली राज की फोटो भी हो।
हतोत्साहित करने वाली जगह की 3 निशानी:
1. "पढ़ाई पर ध्यान दो": जैसे ही 9वीं-10वीं आए, खेल बंद।
2. पहनावे पर कमेंट: "शॉर्ट्स मत पहनो, लोग क्या कहेंगे"
3. सिर्फ लड़कों की टीम: लड़कियों की टीम ही न बने।
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अब बारी आपकी है 👇
आप जिन जगहों पर पढ़ते/काम करते हैं वहाँ का माहौल कैसा है?
1. प्रोत्साहित करता है?
2. रोकता है?
3. या "करना है तो करो, पर हम कुछ नहीं देंगे" वाला है?
और अगर आप कोई खेल खेलते हैं - बैडमिंटन, दौड़, क्रिकेट, योग, कुछ भी - तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर शेयर करें।
आपकी एक पोस्ट किसी और लड़की को "मैं भी ट्राई कर सकती हूँ" का हौसला दे सकती है।
Sarita kumari
आपका बोधकार्य:
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
✍️ लड़कियों को खेलों से और बाहरी कामों से हतोत्साहित करना और उनके पहनावे या शरीर तक उन्हें सीमित रखने की गहरी मान्यताएं ' मनु स्मृति' के श्लोकों से आती है।
यहां बहुत सारे लोग शिक्षा से वंचित रहे है और जो शिक्षित वर्ग हुए है वो कभी मूल(वेदांत) को समझने की कोशिश ही नहीं किए। वो सब- के- सब कुछ ऐसे ' शास्त्र ' है जिसे विकृत कर के लिखा गया है, अपनी सुविधा के अनुसार।
हम सब उन्हीं को मानते गए और अशिक्षित वर्ग में फैलाते गए और अब यह एक गहरी बीमारी का रूप ले चुका है जो परंपरा बन कर, संस्कार बन कर हम सभी स्त्रियों के लिए सामाजिक ढांचा बनते जा रहा है।
पुरुष वर्ग को इसमें फायदा दिखाता है, उन्हें ये लगता है की लड़कियों की सामाजिक आत्मनिर्भरता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, राजनीतिक आत्मनिर्भरता उनके अहंकार को चुनौती दे सकता है!
इसलिए वो नहीं चाहते ये ढांचा तीतर- बितर हो और स्वयं महिलाओं को भी उसी गुलामी/परंपरा/बीमारी/मान्यता में जीना सुविधाजनक लगता है।
हाल के समय कि बात करें तो मैं कल ही स्कूल से आ रही थी तो मैंने देखा कि सड़क पर एक भीड़ लगी है। उस भीड़ में बहुत सारी महिलाएं एक साथ इकट्ठी हुई थी, काफी सजी- सवारी, पूरे बदन पर एक अलग पहनावा जो उन्हें उनके अनुसार शायद! आकर्षक बना रही थी
परंतु क्या ये आकर्षण सचमुच उनकी थी? ये एक सामाजिक मान्यताओं की गहरी परंपरा थी - "मधुश्वनी" जो पीढ़ियों से ब्राह्मण परिवार में चलते आ रही है परंतु आज तक किसी महिला ने ये सवाल नहीं पूछा! ये हम क्यों करें?
इसका हमारे नए जेनरेशन के लिए क्या फायदा है? क्या ये करना उचित भी है? जो हमें सीखा दिया गया उसी को बस हम दोहराना सिख गए है।
इसे क्या हो रहा है -ज्ञान/कौशल से महियालयें वंचित होती जा रही है। तो लोकधर्म अपने आप नहीं आगे पढ़ता हम उसे बढ़ावा देते है।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
✍️ क्यों कि अहंकार के वजह से ही सारी कहानी/मान्यताएं/परंपराएं शुरू होती है। अहंकार को शरीर से वो सब करने के लिए मिलता है जिससे वो अपने अधूरेपन को पूरा कर सके। इसलिए अहंकार सबसे पहले अपने शरीर को ही गुलाम बनाता है।
परंतु क्या ये अधूरापन पूरा हो पाएगा? इस अधूरेपन की समझ को "गीता मिशन" हम सभी तक पहुंचने का काम कर रही है । हम दिल से शुक्रिया करना चाहते है "आचार्य जी" को 🙏🙏🙏🙏...
3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
✍️ मैं जिन जगहों पर रहती हूं वहां लडकियों के लिए खेल खेलना गुनाह करने के समान है। यहां तो लड़कियों के खेल में स्कूल में भी भेदभाव किया जाता है कि ये खेल लडकियों के लिए ठीक नहीं टीचर्स ही बोलते है, गांव में तो खेल को लेकर अलग ही धारणा है।
लड़की है जवान हो गई, अंग विकसित हो गए और देखी कैसे उछलती है! उन्हें खुल कर जीने का जैसे अधिकार ही ना हो! वही लड़के जाते है मैदान में खेलने, जैसे खेतों में, पर! लड़की नहीं जा सकती।
कोई लड़की खेलना भी चाहती है तो उन्हें अपने घर में भयानक चुनौती का सामना करना पड़ता है और आम तौर पर हमारे शिक्षा व्यवस्था में इतनी ताकत है नहीं की लड़की को को आंतरिक बल मिले।
मैं कक्षा में खेल के लिए प्रेरित भी करती हूं, सड़क पर खेलती भी हूं और स्टेटस भी लगती हूं ताकि लड़कियों को इससे बल मिले और वो अपनी मानसिक बंधन को तोड़ कर आगे आए।
ये वीडियो साझा कर रही हूं -
Abhishek shukla
प्रणाम 🌷 🙏,
1.जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है। इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये कि कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
मेरी समझ में इसकी सबसे बड़ी वजह लोकधर्म द्वारा बनाई गई स्त्री की छवि है। बचपन से ही लड़कियों को यह सिखाया जाता है कि उनका असली धर्म घर संभालना, परिवार की सेवा करना और हर परिस्थिति में "संस्कारी" दिखना है। खेल, प्रतिस्पर्धा, नेतृत्व और जोखिम लेना मानो लड़कों का क्षेत्र मान लिया गया है। इसलिए जब कोई लड़की खेलों में आगे बढ़ना चाहती है, तो उसके खेल से ज़्यादा उसके कपड़ों, शरीर और चरित्र पर चर्चा होने लगती है।
हाल के वर्षों में हमने देखा कि ओलंपियन विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और अन्य महिला पहलवानों को अपने ही खेल तंत्र में शोषण के विरुद्ध सड़कों पर उतरकर संघर्ष करना पड़ा। उस समय भी बहुत से लोगों ने उनकी बात सुनने के बजाय उनके इरादों और चरित्र पर सवाल उठाए। यही लोकधर्म की मानसिकता है—अन्याय पर प्रश्न कम और प्रश्न उठाने वाली स्त्री पर अधिक।
दूसरी ओर, जब भारतीय महिला खिलाड़ियों ने कॉमनवेल्थ, एशियाई खेलों और ओलंपिक में देश का नाम रोशन किया, तब वही समाज कुछ समय के लिए उनका सम्मान करता है, लेकिन सामान्य जीवन में करोड़ों लड़कियों को आज भी खेल के मैदान तक पहुँचने की समान स्वतंत्रता नहीं देता। इससे स्पष्ट होता है कि समस्या प्रतिभा की नहीं, बल्कि उन मान्यताओं की है जो स्त्री को स्वतंत्र मनुष्य नहीं, बल्कि किसी भूमिका तक सीमित करके देखती हैं।
2. आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
आचार्य जी कहते हैं कि अहंकार सबसे पहले शरीर से अपनी पहचान बना लेता है। "मैं पुरुष हूँ", "मैं स्त्री हूँ", "मैं सुंदर हूँ", "मैं बलवान हूँ", "मैं कमज़ोर हूँ"—ये सभी पहचानें शरीर से जुड़ी हुई हैं। जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर मान लेता है, तभी समाज उसके ऊपर तरह-तरह की धारणाएँ लाद देता है।
इसी कारण स्त्रियों को "नाज़ुक", "अबला" और "संरक्षण की पात्र" कहा गया, जबकि पुरुषों को "मजबूत", "कमाने वाला" और "निर्णय लेने वाला" घोषित कर दिया गया। यदि हम जान लें कि हमारी वास्तविक पहचान शरीर नहीं बल्कि चेतना है, तो ये कृत्रिम विभाजन स्वतः टूटने लगते हैं। तब व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार जीता है, न कि समाज द्वारा थोपी गई पहचान के अनुसार।
3.क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
मैं मंदिर में अपनी सेवा करता हूँ और साथ ही मनोविज्ञान की पढ़ाई भी कर रहा हूँ। वहाँ खेलों के लिए कोई विशेष व्यवस्था या प्रोत्साहन नहीं मिलता, इसलिए मुझे स्वयं ही अपने स्वास्थ्य और फिटनेस के लिए समय निकालना पड़ता है।
पिछले कुछ समय से मैंने अपने स्वास्थ्य पर गंभीरता से काम करना शुरू किया है। मैं नियमित रूप से क्रॉस-ट्रेनर पर व्यायाम करता हूँ और तैराकी भी करता हूं। मेरा उद्देश्य केवल वजन कम करना नहीं, बल्कि शरीर को स्वस्थ और मन को अनुशासित बनाना है। अब मैं यह भी समझने लगा हूँ कि आध्यात्मिक जीवन और शारीरिक फिटनेस एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। अवसर मिलने पर मैं अपनी फिटनेस गतिविधियों की फ़ोटो और वीडियो भी कम्युनिटी में साझा करता हूं, ताकि अन्य लोग भी स्वास्थ्य और जागरूक जीवन के लिए प्रेरित हों।
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Saniya Tyagi
✍🏼 भारत में लड़कियों को खेलो से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर की ही चर्चाएं रहती है बस....यह बिल्कुल सही बात है, मैने 19 की उम्र में हाथ में रैकेट पकड़ा, उससे पहले कभी ना खेल के बारे में जानती थी नाही उतनी समझदारी थी।
जब पहली बार खेलना शुरू किया तो मन में बहुत डर रहता था बहुत बाते चलती थी, लेकिन आचार्य जी मेरे साथ थे।
मैने खेल में हर तरीके की चीज़ें देखी और सीखी भी, अनुशासन, खेलना, स्ट्रेंथ क्या होती है, खान पान में बदलाव और बहुत खर्चे भी😄
जब सबसे पहले खेलने के लिए गई तो शॉर्ट्स पहनना था मुझे उसमें बहुत शरम आ रही थी, मानो कोई बरसों से छुपी हुई चीज का उजागर कर दिया हो उस शरम के कारण ना अच्छे से खेल पाती थी और नाही खुद पर ध्यान दे पाती थी।
वहां जो अंकल लोग खेलने आते थे उनकी नजरें हमेशा टांगों पर ही रहती थी पर इस बात को मैने धीरे धीरे समझा और अपना डर खत्म किया।
आज में जब कोर्ट में खेलती हु तो बेधड़क होकर खेलती हु। और यह साहस किसी मोटीवेशनल बेडिओ को देख कर नहीं आया यह साहस मुझे आचार्य जी ने दिया🙏🏼😌
✍🏼 मैने सबसे पहले जयपुर में खेलना शुरू किया था, जहां मैं अपने भइया के साथ रहती थी, उन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया, उन्होंने मेरा जीवन बहुत आसान कर दिया है मैं आज इतना कर पाती हु केवल उनके साथ की वजह से ऐसा नहीं है कि उनके ऊपर में निर्भर हु बिल्कुल नहीं।😄 वह खुद मुझे लगाव रखने से मना करते है और खुद लड़ने सीखने की बाते करते है।
जब कहीं गिरती ( मन से ) तो उनके साथ बैठकर बात करती, समझती और आचार्य जी की सीख से आगे बढ़ती रहती।
लेकिन कुछ महीने पहले ही मैं घर वापस आ गई और मेरा खेलना रुक गया मैने अपने अंदर हलचल देखी और जब पता लगा मेरे लिए खेलना कितना जरूरी है हालांकि में बहुत छोटे शहर से आती हु।
बहुत ढूंढने के बाद मुझे केवल एक अकेडमी ही मिली मैने वहां बात की, घर पर जब बात की तो पहले मना किया क्योंकि यहां इतने छोटे कपड़े पहनकर कोई नहीं खेलता लेकिन मैने उन्हें समझाया और खेलना शुरू किया।
जब उस अकेडमी में खेलने गई तो देखा वहां लड़कियों के नाम पर केवल छोटी बच्चियां आती थी, मेरे उम्र की मुझे कोई वहां नहीं दिखी मैने जब वह के लड़कों से पूछा तो कहते है कि आप आ रही हो बहुत बड़ी बात है वरना ऐसे कपड़ पहनकर यहां पर कोई अपनी बच्ची को खेलने नहीं भेजता।
🍀 खेलना मुझे बहुत पसंद है, मैने अपने अंदर बहुत से बदलाव केवल खेल से देखे है, मैने कॉलेज में ऐडमिशन ले लिया है कुछ ही दिनों में क्लासेज स्टार्ट होंगी, मैं तो आगे भी खेलना चाहती हु 😄 और खेलूंगी भी खेलना नहीं छोड़ूंगी।
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Sony Sharma
1️⃣ समाज की गहरी मान्यताएँ और लोकधर्म (Folk Religion) की भूमिका
भारत में लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित करने और उनके प्रदर्शन के बजाय उनके पहनावे, शरीर या विवाह-योग्यता पर ध्यान केंद्रित करने के पीछे सदियों पुरानी सामाजिक और मानसिक संरचनाएँ काम करती हैं:
स्त्री शरीर पर नियंत्रण और स्वामित्त्व का भाव:
पुरुषवादी समाज में स्त्री के शरीर को उसकी अपनी व्यक्तिगत इकाई न मानकर 'परिवार की प्रतिष्ठा' और 'जातीय/सामाजिक शुद्धता' का प्रतीक माना जाता है। खेलकूद में स्वतंत्रता, शारीरिक हलचल और ऐसे वस्त्र शामिल होते हैं जो शरीर को नियंत्रण से मुक्त करते हैं, जिसे समाज अपनी सत्ता के लिए चुनौती मानता है।
'छुईमुई' और 'आश्रित' बनाने की मानसिकता:
समाज स्त्री को शारीरिक रूप से सशक्त नहीं देखना चाहता, क्योंकि एक सशक्त और निडर स्त्री पुरुषों की सर्वोच्चता को चुनौती देती है।
💡 हालिया उदाहरण और लोकधर्म की भूमिका:
लोकधर्म (Folk Religion/Popular Cultural Beliefs) से तात्पर्य धर्म के उन व्यावहारिक, स्थानीय और रीति-रिवाज आधारित रूपों से है, जो शास्त्र से इतर सामाजिक परंपराओं और रूढ़ियों को पोषित करते हैं।
वेशभूषा और 'लाज/शर्म' का लोक-संस्कार:उदाहरण: जब महिला पहलवान (जैसे विनेश फोगाट या साक्षी मलिक) या मुक्केबाज़ निक्कत ज़रीन जैसे खिलाड़ी निकर या स्पोर्ट्स गियर में मैदान में उतरते हैं, तो स्थानीय स्तर पर "गाँव-घर की इज़्ज़त", "शरीर ढकने की परंपरा" और "लज्जा ही स्त्री का गहना है" जैसे लोक-धार्मिक मूल्यों का हवाला देकर उनके परिवारों पर सामाजिक दबाव बनाया जाता है।
मासिक धर्म (Periods) और अपवित्रता की लोक-मान्यता:उदाहरण: आज भी देश के कई हिस्सों में लोक-रीतियों के तहत मासिक धर्म के दौरान लड़कियों को 'अपवित्र' माना जाता है। खेल के मैदान में एथलीटों को अक्सर इस शारीरिक प्रक्रिया के बावजूद प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है (जैसे जुलाई 2026 में चीन की ली मेइज़ेन का उदाहरण)। भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लोक-मान्यताओं के कारण इस विषय पर चुप्पी साधी जाती है, जिससे 14 वर्ष की आयु तक आते-आते अधिकांश लड़कियाँ संसाधनों और मार्गदर्शन के अभाव में खेल छोड़ देती हैं।
कुश्ती और 'अखाड़ा संस्कृति' का पितृसत्तात्मक ढाँचा:उदाहरण: पारंपरिक लोक-संस्कृति में अखाड़ों और पहलवानी को केवल पुरुषों का क्षेत्र (ब्रह्मचर्य और पौरुष से जुड़ा) माना जाता था। दंगल में महिलाओं के प्रवेश को लेकर शुरुआत में खाप पंचायतों और लोक-धार्मिक गुरुओं द्वारा भारी विरोध किया गया था कि यह परंपराओं के विरुद्ध है।
2️⃣ शरीर को 'अहंकार की पहली कॉलोनी' क्यों कहा जाता है?
वेदांत दर्शन और आचार्य जी के विचारों के अनुसार, शरीर अहंकार की पहली कॉलोनी (First Colony of Ego) है। इसे समझने के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
तादात्म्य (Identification) की शुरुआत:
अहंकार का अर्थ है 'मैं' होने का भाव। मनुष्य का सबसे पहला और गहरा अज्ञान यही है कि वह स्वयं को अपनी चेतना न मानकर केवल 'यह 5-6 फीट का मांस और हड्डियों का पुतला' (शरीर) मान लेता है। अहंकार सबसे पहले शरीर पर अपना अधिकार (कब्ज़ा) जमाता है।
प्रकृति के हाथों कठपुतली बनना:
शरीर पूरी तरह जैविक (Biological) और प्राकृतिक नियमों (आहार, भय, नींद, लिंग-भेद) से संचालित होता है। जब अहंकार शरीर को ही सब कुछ मान लेता है, तो वह प्रकृति के बनाए जैविक ढर्रे—जैसे "पुरुष को आक्रामक होना है" या "स्त्री को नाज़ुक और लज्जावंती होना है"—को अपना सत्य मान बैठता है।
शोषण का आधार:
जब समाज स्त्री को केवल 'शरीर' के रूप में देखता है (चाहे पूज्य देवी बनाकर या भोग की वस्तु बनाकर), तो वह उसकी चेतना का हनन करता है। स्त्री को यह विश्वास दिला दिया जाता है कि उसका मुख्य अस्तित्व उसकी नाज़ुकता, सुंदरता या प्रजनन क्षमता में है।
निष्कर्ष: जब तक व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) शरीर भाव से ऊपर नहीं उठता, तब तक वह अहंकार की इस 'कॉलोनी' का गुलाम बना रहता है और समाज द्वारा थोपी गई जैविक एवं सामाजिक धारणाओं को ही अपना सच मानता रहता है।
3️⃣ कार्यस्थल/शिक्षण संस्थान का माहौल और व्यक्तिगत सहभागिता
🏫 क्या वर्तमान संस्थान खेलों को प्रोत्साहित करते हैं?
जमीनी हकीकत: भारत में अधिकांश कॉर्पोरेट दफ़्तरों और शैक्षणिक संस्थानों में खेलों को केवल 'वार्षिक खेल दिवस' (Annual Sports Day) या 'टीम बिल्डिंग एक्टिविटी' तक सीमित रखा जाता है। यह अक्सर एक औपचारिकता मात्र होती है।
अवसंरचना का अभाव:
कार्यस्थलों पर न तो खेल का मैदान होता है और न ही शारीरिक फिटनेस के लिए पर्याप्त समय या प्रोत्साहन। महिलाओं के लिए सुरक्षित और अनुकूल खेल अवसंरचना (जैसे चेंजिंग रूम, कोचिंग Facilities) की कमी और भी ज़्यादा है।
मानसिकता में बदलाव की ज़रूरत:
संस्थानों को खेल को केवल 'मनोरंजन' या 'समय की बर्बादी' न मानकर इसे मानसिक स्वास्थ्य, अनुशासन और व्यक्तित्व निर्माण का अनिवार्य हिस्सा बनाना चाहिए।
Archana
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
लोकधर्म यानी समाज की बनी-बनाई मान्यताएँ इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं। आज भी बहुत से लोग मानते हैं कि लड़की का मुख्य काम घर संभालना है, खेलना नहीं। इसलिए उसकी मेहनत और उपलब्धियों से ज़्यादा उसके कपड़ों, शरीर या व्यवहार पर ध्यान दिया जाता है।
हाल के वर्षों में कई महिला खिलाड़ियों को सोशल मीडिया पर उनके प्रदर्शन से ज़्यादा उनके पहनावे और निजी जीवन को लेकर आलोचना झेलनी पड़ी। कई परिवार आज भी बेटियों को खेल में करियर बनाने से रोक देते हैं, क्योंकि उन्हें समाज की बातें और "इज़्ज़त" की चिंता रहती है।
यही लोकधर्म है- जहाँ समाज की पुरानी धारणाएँ प्रतिभा और मेहनत से बड़ी हो जाती हैं। जब तक इन मान्यताओं को नहीं बदला जाएगा, तब तक लड़कियों को खेलों में बराबरी का अवसर और सम्मान मिलना कठिन रहेगा।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
आचार्य जी🙏 शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी इसलिए कहते हैं क्योंकि अहंकार सबसे पहले खुद को शरीर मान लेता है। यहीं से "मैं" और "मेरा" की भावना शुरू होती है।
* जैसे ही हम सोचते हैं "मैं यही शरीर हूँ", अहंकार जन्म ले लेता है।
* फिर शरीर से जुड़ी हर चीज़- रूप, रंग, उम्र, जाति, लिंग, ताकत, सुंदरता- हमारी पहचान बन जाती है।
* इसके बाद अहंकार और भी "कॉलोनियाँ" बसाता है, जैसे मेरा परिवार, मेरा धर्म, मेरी जाति, मेरा देश, मेरी नौकरी, मेरी संपत्ति, मेरी उपलब्धियाँ।
* इन सबका आधार वही पहली पहचान है- शरीर से जुड़ाव।
शरीर अहंकार की पहली कॉलोनी है, क्योंकि यहीं से झूठी पहचान का पूरा संसार खड़ा होता है। जब यह समझ आ जाती है कि मैं केवल शरीर नहीं हूँ, तब अहंकार की जड़ कमजोर होने लगती है।
3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
मेरे पापा एयर फोर्स में थे, तो हम पांच भाई बहन है - दो भाई और तीन बहने। हमें पांचों को ही छोटे से स्पोर्ट्स के लिए प्रोत्साहित करते थे पापा मम्मी। स्कूल में Taekwondo 🥋 (मार्शल आर्ट्स), बास्केटबॉल, मैराथन(10km, 21km और 6hr स्टेडियम रन जिसमें 40km किया)।
अब वेट ट्रेनिंग मॉर्निंग में कर रही हूँ, क्योंकि अब 48 की आयु में ज्यादा जरूरी है, और इवनिंग में 5km वॉकिंग करती हूँ। अभी आसपास बास्केट बॉल कोर्ट नहीं है वरना जहाँ भी होता है खेलती जरूर हूँ।
Deepak
Every game is a step away from conditioning and toward freedom.
1️⃣ Using some recent examples, explain how lokhdharma plays a major role in this.???¿The real issue is Lokdharma—the social conditioning that sees women not as free human beings but as carriers of family honour and tradition. That is why, instead of discussing a girl's talent and achievements, society often focuses on her clothes, body, or "modesty."
This mindset discourages many girls from pursuing sports and independence.The 2023 protests by Vinesh Phogat, Sakshi Malik, and other women wrestlers showed that their struggle is not only to win medals but also to fight exploitation and social conditioning. Similarly, PV Sindhu and Mirabai Chanu have repeatedly brought glory to India,
yet public discussions often shift from their achievements to stereotypes about how women should behave.
Lokdharma wants women to remain obedient, while sports demand confidence, freedom, discipline, and courage.
2️⃣ Why does Acharya Ji call the body the ego’s first colony???¿Acharya Ji calls the body the ego's first colony because the ego's very first identification is with the body. It starts believing, "I am this body," and therefore sees itself as separate from Prakriti. This false sense of separation creates fear, insecurity, and a constant feeling of incompleteness.
To protect and satisfy itself, the ego begins using the body as an instrument to dominate and exploit Prakriti. It seeks endless consumption, comfort, pleasure, and control over nature to fill its inner emptiness. Thus, the body becomes the ego's first colony—the base from which it wages its exploitative relationship with the rest of existence, resulting in environmental destruction and suffering.
3️⃣ Do the places where you work or study encourage you to play sports? If you play any sport, do share your photo or video on the community.?????The place where I used to work did not encourage sports or any kind of physical activities. There were no facilities or initiatives to motivate employees to participate in games.
Now that I run my own business, I consciously make time for sports and physical fitness. I regularly play volleyball, as it helps me stay active, improves teamwork, and keeps me physically and mentally refreshed. I will be happy to share a photo or video with the community.
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Vinay Kandpal
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
इसके पीछे कौन-सी गहरी मान्यताएँ काम करती हैं? हाल के समय से कुछ उदाहरण देकर बताइये की कैसे लोकधर्म इसमें एक बड़ी भूमिका निभाता है।
इसके पीछे वो मान्यता आ रही है जिसने सदियों से स्त्री को केवल देह मात्र समझा है वो भी उनके शोषण के लिए। इस मान्यता ने स्त्रियों के लिए जो उनके संभावना रोकने का पूरा काम किया है।
लोकधर्म में ये बात चलती आ रहा ही कि स्त्री का स्थान केवल घर तक है वो भी किसी के अधिकार के भीतर।
तुम स्त्री को तुम्हारा काम समाज में केवल परिवार बढ़ना उनको सम्भालना है बाकी सब काम मर्दो का है। इस मान्यता ने स्त्रियों को हर क्षेत्र में पीछे कर दिया। अज्ञान वश स्त्रियों ने भी स्वीकार कर लिया। स्वार्थों की पूर्ति के लिए।
2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
क्योंकि कि अहंकार की कोई हस्ती नहीं है वो विषयों के सहारे स्वयं को हस्ती बताता है। और शरीर अहंकार का पहला विषय होता है जिसे अपना कह कर ये मैं हूँ का भाव आता है। शरीर के सहारे ही वो अन्य विषयों को भोगता है।
3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
आफिस में कोई खेल नहीं।
मैंने आचार्य जी से जुड़ने के बाद तैराकी और बैडमिंटन खेलना शुरू किया।
Umabati Saha
1️⃣ जहाँ कई विकसित देशों में महिलाओं की खेल उपलब्धियाँ राष्ट्रीय सफलता का बड़ा आधार हैं, वहीं भारत में अक्सर लड़कियों को खेलों से हतोत्साहित किया जाता है और उनके पहनावे या शरीर तक चर्चा सीमित रह जाती है।
उत्तर: ✍️
लोकधर्म ने सदियों से स्त्री को उसकी क्षमता से नहीं, बल्कि उसकी देह और सामाजिक भूमिकाओं से परिभाषित किया है। 👤
बचपन से ही लड़कियों के मन में यह डर बैठा दिया जाता है—"बाहर मत जाओ, लड़के छेड़ेंगे", "चरित्र पर दाग लग जाएगा", "लड़कियाँ ज़्यादा बाहर अच्छी नहीं लगतीं।" इन मान्यताओं के कारण उनका संसार घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया जाता है। 🏠
थोड़ी-बहुत पढ़ाई के बाद विवाह को ही उनका अंतिम लक्ष्य बना दिया जाता है। फिर सास-ससुर की सेवा, पति की देखभाल और घर की ज़िम्मेदारियों को ही उनका धर्म घोषित कर दिया जाता है। ऐसे वातावरण में खेल, साहस और अपनी क्षमताओं को विकसित करने का विचार ही उनके मन में पनप नहीं पाता। 🥀
यदि कोई लड़की खेलना भी चाहे, तो समाज के ताने, पहनावे पर टिप्पणियाँ और चरित्र पर प्रश्न उसे पीछे हटने के लिए विवश कर देते हैं। 🎭
आज भी हम देखते हैं कि कई बार महिला खिलाड़ियों की उपलब्धियों से अधिक उनके कपड़ों, शरीर या निजी जीवन पर चर्चा होती है। यही लोकधर्म की मानसिकता है, जो स्त्री को व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सामाजिक वस्तु की तरह देखती है। जबकि अध्यात्म व्यक्ति को उसकी चेतना और क्षमता से पहचानने की बात करता है, न कि उसके शरीर से। 🪷
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2️⃣ आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी क्यों कहते हैं?
उत्तर: ✍️
आचार्य जी कहते हैं कि शरीर अहंकार की पहली कॉलोनी है, क्योंकि अहंकार सबसे पहले स्वयं को शरीर के रूप में ही पहचानता है। यही देहाभिमान आगे चलकर "मैं" और "मेरा" की पूरी दुनिया खड़ी कर देता है। 🪞
इसी संदर्भ में आचार्य जी कहते हैं कि हमारा वास्तविक जन्म केवल जन्मदिन से नहीं माना जा सकता, क्योंकि अहंकार की संरचना गर्भ में ही बनने लगती है। इसलिए वे कहते हैं कि जन्मदिन से लगभग छह महीने पहले ही तुम्हारा जन्म हो चुका था, अर्थात अहंकार की नींव पड़ चुकी थी। 🌱
जब तक "मैं शरीर हूँ" की मान्यता बनी रहती है, तब तक अहंकार भी बना रहता है। अध्यात्म इसी देहाभिमान को देखकर उससे मुक्त होने की यात्रा है। 🕊️
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3️⃣ क्या आप जिन जगहों पर काम करते हैं या पढ़ते हैं, वे आपको खेल के लिए प्रोत्साहित करती हैं? अगर आप कोई खेल खेलते हैं, तो अपनी फ़ोटो या वीडियो कम्युनिटी पर ज़रूर साझा करें।
उत्तर: ✍️
जहाँ मैं काम करती हूँ, वहाँ खेलों को विशेष रूप से प्रोत्साहित नहीं किया जाता। फिर भी मैं अपने लिए समय निकालकर नियमित रूप से जिम और MMA का अभ्यास करती हूँ। 🏋️♀️🥊
पिछले कुछ महीनों से मेरे कॉलेज की परीक्षाएँ होने के कारण मेरा पूरा ध्यान पढ़ाई पर था, इसलिए खेल से थोड़ी दूरी बन गई थी। 📚
अब मेरी परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी हैं, और आज से मैं पूरे उत्साह और अनुशासन के साथ फिर से अपने खेल अभ्यास की शुरुआत कर रही हूँ। मेरा प्रयास केवल शरीर को मज़बूत बनाना नहीं, बल्कि स्वयं को अधिक सजग, अनुशासित और चुनौती स्वीकार करने योग्य बनाना है। 💪✨
Madhumati prasad
1• 📝 भारत में महिलाओं के खेलों के प्रति नकारात्मक सोच के पीछे पितृसत्तात्मक मानसिकता, रूढ़िवादी सामाजिक मूल्य और महिलाओं की देह को नियंत्रित करने की भावना काम करती है। लोकधर्म और पारंपरिक मान्यताएँ अक्सर यह तय करती हैं कि महिलाओं की भूमिका केवल घर-परिवार तक सीमित होनी चाहिए।
पितृसत्तात्मक सोच:
परिवार और समाज पर पुरुषों का नियंत्रण होता है। वे तय करते हैं कि महिलाएँ बाहर कब और कैसे जाएँ।
शरीर पर नियंत्रण:
महिलाओं के पहनावे और शरीर को समाज की 'इज्जत' से जोड़कर देखा जाता है। खेल के दौरान पहनावा इस सोच के आड़े आता है।
पारंपरिक भूमिकाएँ:
महिलाओं को चूल्हे-चौके और देखभाल तक सीमित माना जाता है। खेलकूद को पुरुषों का क्षेत्र समझा जाता है।
सदाचार का दबाव:
लोक-संस्कृति में आदर्श भारतीय नारी की छवि गढ़ी गई है। जोर-शोर से खेलने वाली या आक्रामक दिखने वाली महिला को 'लोक-मर्यादा' के खिलाफ माना जाता है।
हालिया उदाहरण:
विनेश फोगाट और साक्षी मलिक जैसे खिलाड़ियों को जब संघर्ष करना पड़ा, तो समाज के एक वर्ग ने उनके पहनावे, प्रदर्शन और धरने-प्रदर्शन के दौरान उनके चरित्र पर सवाल उठाए। यह इस बात का प्रमाण है कि खेल कौशल से ज्यादा उनकी देह और आचरण को लोक-मान्यता के तराजू में तौला गया।
2 •📝 आचार्य जी शरीर को अहंकार की पहली कॉलोनी कहते हैं क्योंकि शरीर वही जगह है जहाँ अहंकार को पहली बार सीमा मिलती है। जन्म के साथ ही जो त्वचा है, वो एक रेखा खींच देती है - इसके भीतर "मैं", इसके बाहर "बाकी सब"। यह रेखा किसी ने सोच-समझकर नहीं खींची, यह शरीर के होने से ही खिंच गई। और अहंकार इस रेखा को पकड़कर कहता है - यही मैं हूँ, यह अलग, यह बचाने वाला।
तो शरीर अहंकार की कोई रचना नहीं है, पर अहंकार का पहला घर ज़रूर है। जैसे कोई कॉलोनी बनती है किसी ज़मीन पर, वैसे ही अहंकार अपनी पहली बुनियाद शरीर की सीमा पर रखता है। फिर वहाँ से आगे बढ़ता है - नाम, रिश्ते, उपलब्धियाँ, विचार, यह सब अहंकार बाद में जोड़ता है, अपनी कॉलोनी बढ़ाता है। पर नींव वही शरीर की सीमा है।
3• 📝 जब मैं स्कूल में शिक्षिका थी, तब सरकारी नियमों के तहत खेलकूद (स्पोर्ट्स) अनिवार्य था और इसके लिए सरकार की ओर से वार्षिक अनुदान भी आता था। विद्यार्थियों में खेल का नाम सुनते ही भारी उत्साह देखने को मिलता था।
परंतु मेरा अनुभव यह रहा कि यदि स्कूल में शारीरिक शिक्षक (P.I. Teacher) का पद रिक्त होता, तो किसी भी अन्य शिक्षिका को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी जाती थी।कहने का तात्पर्य यह है कि केवल कोच की ही कमी नहीं थी, बल्कि खेल के मैदानों का अभाव, सुरक्षा की कमी और स्कूल प्रशासन की ओर से की जाने वाली केवल औपचारिकता (खानापूर्ति) भी बड़ी बाधाएँ थीं।
खेल के लिए अनुकूल माहौल न मिलने के कारण शिक्षिकाओं का उत्साह भी ठंडा पड़ जाता था। अंततः इसका खामियाजा स्कूल की छात्राओं को भुगतना पड़ता था, जबकि उनके भीतर प्रतिभा और क्षमता की कोई कमी नहीं थी।"
CHANDNI VERMA
1️⃣ भारत में लड़कियों को खेलों से क्यों हतोत्साहित किया जाता है? लोकधर्म की भूमिका
विकसित देशों में खेल = देश का गर्व है। पर भारत में अक्सर लड़की = "घर की इज्जत" मान ली जाती है। इसके पीछे 3 गहरी मान्यताएँ काम करती हैं:
A. "शरीर पर नियंत्रण = संस्कार" वाली सोच
लोकधर्म में लड़की के शरीर, पहनावे, बालों तक पर नज़र रखी जाती है। "छोटे कपड़े मत पहनो, धूप में मत जाओ, काली हो जाओगी"। खेल में पसीना, मिट्टी, चोट - इसे "असंस्कारी" मान लिया जाता है।
उदाहरण: 2023 में विनेश फोगाट, साक्षी मलिक के प्रोटेस्ट के समय सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा ट्रोल उनके "कपड़ों" और "सड़क पर बैठने" को लेकर हुआ था, उनके आरोपों पर नहीं।
B. "शादी और घर ही अंतिम लक्ष्य"
14 साल के बाद लड़कियों को "अब खेल से क्या मिलेगा? शादी करनी है" कहकर हटा दिया जाता है। खेल को करियर नहीं, टाइमपास माना जाता है।
उदाहरण: गांव में कबड्डी खेलने वाली लड़की को "लड़कों जैसे" कहकर ताने दिए जाते हैं। माता-पिता को डर होता है "कौन शादी करेगा?"
C. "नाज़ुकता का मिथक"
जैसा तुमने लिखा - "छुईमुई" वाली सोच। पीरियड्स, चोट, धूप को बहाना बनाकर रोक दिया जाता है। जबकि ली मेइज़ेन जैसी एथलीट पीरियड्स में भी 42km दौड़ती हैं।
उदाहरण: स्कूल में पीटी के समय लड़कियों को "तुम बैठो, लड़के खेलेंगे" कहना। या फुटबॉल ग्राउंड पर "ये लड़कियों का खेल नहीं है"।
लोकधर्म की भूमिका:
लोकधर्म यानी "लोग क्या कहेंगे"। पंचायत, रिश्तेदार, मोहल्ले की आंटी। अगर कोई लड़की बॉक्सिंग या वेटलिफ्टिंग करती है तो पहला सवाल "इसकी शादी कैसे होगी?" होता है। यही डर माता-पिता को लड़की को घर में बैठाने पर मजबूर करता है। जबकि US में 1973 में समान इनाम से माता-पिता को लगा "बेटी से भी नाम और पैसा कमा सकती है"।
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2️⃣ आचार्य प्रशांत जी शरीर को "अहंकार की पहली कॉलोनी" क्यों कहते हैं?
आचार्य जी कहते हैं - अहंकार सबसे पहले शरीर से शुरू होता है।
कारण:
1. पहचान: "मैं गोरा हूँ, मैं मोटा हूँ, मैं एथलीट हूँ" - हम सबसे पहले खुद को शरीर से ही डिफाइन करते हैं।
2. तुलना और डर: "लोग क्या कहेंगे अगर मैं मैदान में पसीने से लथपथ दिखी?" "मेरी स्किन काली हो जाएगी"।
यही डर लड़कियों को खेल से रोकता है।
3. नियंत्रण: समाज ने स्त्री के शरीर को कंट्रोल करके ही उसे कंट्रोल किया। "इज्जत शरीर में है" कहकर उसकी आज़ादी छीन ली।
इसलिए आचार्य जी कहते हैं - जब तक तुम शरीर से चिपके रहोगे, तब तक आज़ाद नहीं हो सकते। खेल, संघर्ष, हार-जीत - ये सब शरीर से परे "मैं" को जानने के रास्ते हैं। तभी विनेश जैसी खिलाड़ी सड़क पर उतरकर कह पाती हैं "मेरा शरीर मेरा है, मेरा सम्मान मेरा है"।
सारांश - 2 लाइन में
समाज ने स्त्री को "पूज्य देवी" या "आज्ञाकारी पुतली" बनाकर रखा, "इंसान" नहीं बनने दिया।
जब तक हम "नाज़ुकता" के झूठ को तोड़कर मैदान, बाज़ार, राजनीति में बराबरी नहीं देंगे, तब तक ओलंपिक में 41 में से 10 पदक ही रहेंगे।
Mohan Kumar
1️⃣ In many developed countries, women’s sporting achievements form a major foundation of national success. In India, however, girls are often discouraged from sports, and the conversation about them tends to get reduced merely to their clothes or their bodies.
What deeper beliefs are at work behind this? Using some recent examples, explain how lokhdharma plays a major role in this.
In our country, sports have not become an integral part or a necessity of life; instead, they are treated as a separate and secondary pursuit. A popular saying that has been passed down for generations is, "If you play, you'll be ruined; if you study, you'll become a nobleman."
Children grow up hearing this repeatedly. Whenever a child spends too much time playing, parents often ask them to stay indoors and focus on their studies. As a result, many children develop the belief that playing is a waste of time and that only academic success matters.
This is one of the reasons I have observed in my own life as well. I played many different sports during my childhood, but I was never able to pursue any of them seriously or develop real skill.
Girls, in particular, receive very little encouragement to participate in sports. Our social conditioning has traditionally assigned them the roles of cooking, managing the household, and bearing children. In my own family, my sister was an excellent runner.
She competed up to the state level, but after that she was pressured to prepare for a government job instead of continuing her athletic career. Once she secured a job, she was married, and now she is expecting a child. Gradually, her life became absorbed into the conventional social pattern, and she drifted completely away from sports.
One reason behind the issue of clothing in sports is that women in our society lived under the practice of ghoonghat (veil) for a very long time. Although this tradition has weakened in cities, its influence still remains strong in many villages.
Another major reason is the lack of education. Without education, people are more likely to follow superstitions and inherited beliefs unquestioningly. They often lack the courage to ask whether what they have been taught or are expected to follow is actually right or wrong.
2️⃣ Why does Acharya Ji call the body the ego’s first colony?
Acharya Ji calls the body the first colony of the ego because the ego derives its very existence from identification with the body. As long as one identifies oneself with the body, the ego continues to assert, "I exist."
In reality, however, the ego has no independent existence of its own. It is false and survives only through this mistaken identification with the body.
3️⃣ Do the places where you work or study encourage you to play sports? If you play any sport, do share your photo or video on the community.
At present, I have completed my college education. However, I would like to mention that from my very first year of school until the end of college, I never received genuine encouragement to participate in sports.
I observed that sports events were indeed organized, but they were mostly a formality. Excelling in sports requires consistent practice, and that cannot be achieved in just one or two days.
Since these events were conducted merely to fulfill institutional obligations, very little attention was given to proper training or long-term development. As a result, sports were never treated as something truly important or deserving of serious commitment.