✍🏻 पोस्ट 24 | 26 अगस्त '26 💭 विषय —… | AP Community
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Vidya-Avidya
✍🏻 पोस्ट 24 | 26 अगस्त '26
💭 विषय — मनोविज्ञान──────────
🔮 'क्या आपको भी लगता है कि ये बात सिर्फ आपके लिए कही गई है?
🤔 "जो बातें हर इंसान पर लागू होती हैं, वे हमें केवल हमारे लिए ही खास लगती हैं।" यह एक गहरा मनोवैज्ञानिक सच है। जब हम अपना राशिफल या कोई पर्सनालिटी टेस्ट पढ़ते हैं, तो हमें लगता है कि यह बात बिल्कुल हमारे बारे में ही कही गई है, जबकि वह बात हर किसी पर सटीक बैठती है।
📜 *1948 में मनोवैज्ञानिक बर्ट्राम फॉरर ने एक प्रयोग किय…
Words which praises us we instantly start believing as we mostly are ego driven. We often are ready to accept sweet lie rather than harsh truth as it satisfies our ego .
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Mahima
hm sb apne mnn ko khus Krna chahte h ...koi achi baat bol de to khus ho jate h ..jbki sch hmare bheetar baitha h wo hmare ego ko todta h isliye use ansuna krte rhte h
Kavita bidasar
जानने की कोशिश तो वास्तविकता की होती है। पर कभी कभी अपने अंहकार को सहलाने वाली बातो में उलझ जाती हूं।
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Sukhmani Singh
क्यूंकि अहंकार सच नहीं जानना चाहता है।अगर सच जाने गा तो अहंकार घट जाएगा।
Prateeksha Srivastav
मुझे व्यक्तिगत रूप से कभी कोई दिलचस्पि नहीं रही भविष्य जानने में लेकिन अपने घर में कई लोगों को देखती हूं जो भविष्य फल देखता है। माई कर्म में विश्वास करती हूं और ये मानती हूं कि आप जैसा करोगे waisa hi bharoge
Kiran
ये सच है, ये हमारा अहंकार ही होता है जिसे हम अपने ही बारे में मान लेते हैं ।
अभी भी ये सब newspapers, magazines मे छाप देते हैं ।
R
Ritu Choudhary
ये तथ्य बिल्कुल सही, इस दुविधा से हर इन्सान गुजर रहा है।
Ujjawal Kumar
hmare society me abhi v yahi bate chlta hai log kisi pe v viswas kr late hai iska sbse bra karan gyan ki kami hai knowledge na hone ke wajah se log drte hai dusre se.
Sanket Sudhakar Mahajan
🔎 "प्रश्न यह नहीं है कि राशिफल या भविष्य बताने वाले हमें कैसे बेवकूफ बनाते हैं। प्रश्न यह है कि मैं खुद को 'खास' महसूस कराने वाली किसी भी गोलमोल बात पर तुरंत भरोसा क्यों कर लेता हूँ?"
👉🏽 मै का सघन होना हि एकमात्र कारण हैं |
Mahesh Gujale
हम कभी भी अपना स्वार्थ देखते हैं और भविष्य बारे में अच्छा सुनना चाहते हैं। इसलिए सत्य की खोज करना चाहिए। असली अहंकार का चेहरा देखना चाहिए।
Sushant Mohite
🤦🏻मुझे भी पहले राशिफल पढ़ने की आदत थी। बाद में youtube पर videos देखता था और सोचता था कि इसमें से बस practical चीजों पे ध्यान दूंगा।
😇लेकिन "गीता सत्रों" से जुड़ने के बाद और आचार्य जी को "ज्योतिष" विषय पर सुनने के बाद ये समझ में आने लगा कि इन videos में ऐसी कोई surety वाली या pointed बात है ही नहीं। सारा मामला घूमानेवाला है।
अभी "राशिफल", "ज्योतिष", "भविष्य" ऐसी कोई बात दिमाग में आती ही नहीं है।
Neha
जी, पहले ऐसा ही होता था , लेकिन अब नहीं। अब और बातों पर ध्यान नहीं मैं नहीं सही से बता सकती। लेकिन जैसे अब मैं आचार्य जी को सुनती हूँ तो हर बार मुझे ये लगता है , कि बात मेरी ही हो रही है। आचार्य जी वो बात हर किसी के बारे में बोलते हैं , और मुझे लगता है बिल्कुल ऐसा ही तो है , ये तो मेरी बात है। जब आचार्य जी ये बताते हैं कि हम कैसे हैं, कितने बेचैन हैं , जहाँ समस्या की बात आती है, तो वो बात ऐसा लगता है, मैं ही तो हूँ मेरे बारे में बोली जा रही है। 💯
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Durgesh Nandani
Maine rashifal ya kisi annya prakar ka bhavishya kabhi janne ki koshish nhi ki kyu ki humare nam ke lakhon log hote honge wo bat un sabhi k liye ek jaisi kahi jati he.
Ab samjh aya he ki achha hi hua jo nhi dekha. Par ab Acharya ji ko sunti hu lagta hai sab mere liye hi bola gya ho.
Dhanyavad Acharya ji... 🙏
Hridesh Chandra
कुछ लगभग पंद्रह बीस दिन पहले मैंने ये पोस्ट लिखी।
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पोस्ट---
✍🏻 विषय — समाज, मनोविज्ञान व दर्शन
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🔮 जब झुन्नु को लगा कि ज्योतिषी उसके ही घर में छुपकर बैठा है! 🤣
☕ झुन्नु भाई का सुबह का नियम एकदम पक्का है—चाय का घूंट बाद में लेंगे, पहले अखबार या मोबाइल स्क्रीन पर अपना "आज का राशिफल" देखेंगे!
किसी दिन अगर लिखा मिल जाए— "आज कुंभ राशि वालों को भारी सफलता मिलेगी", तो झुन्नु बिना किसी तैयारी के ही हवा में उड़ने लगता है!
और किसी दिन अगर लिखा हो— "आज दोपहर किसी से अनबन हो सकती है और घर की कोई खोई हुई चीज़ ढूँढने में थोड़ा वक्त लग सकता है", तो झुन्नु की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं! वह चौंककर बोलता है— "अरे बाप रे! ज्योतिषी बाबा को कैसे पता चला कि मेरी मोटरसाइकिल की चाबी आज सोफे के नीचे ही मिलेगी?" 🤯
अब झुन्नु दिनभर इसी डर और वहम में जी रहा है कि दोपहर को किससे झगड़ा होगा! वह अपनी बीवी, अपने दोस्त और यहाँ तक कि बेचारे दूधवाले को भी शक की निगाहों से देख रहा है कि कहीं यही वो इंसान तो नहीं जिससे आज मेरा पंगा होना लिखा है! 😅
🧠 1️⃣ दिमाग का मज़ाकिया खेल: 'बर्नम इफेक्ट' (Barnum Effect)
मनोविज्ञान की भाषा में इस पूरी चालाकी को बर्नम इफेक्ट कहते हैं। राशिफल लिखने वाले ऐसी गोल-मोल बातें लिखते हैं जो दुनिया के पूरे 8 अरब इंसानों पर एक साथ और एक जैसी लागू होती हैं:
"आप बाहर से बहुत सख्त दिखते हैं, लेकिन अंदर से बड़े भावुक हैं।" (अरे भाई, दुनिया में ऐसा कौन सा इंसान है जो खुद को अंदर से भावुक नहीं मानता?!)
"आज कोई छोटा अनचाहा खर्च हो सकता है या मन प्रसन्न रहेगा।" (वाह जी वाह! या तो ₹20 की चाय-सब्जी का एक्स्ट्रा खर्च हो जाएगा या कोई चुटकुला सुनकर हँसी आ जाएगी—दोनों में से कुछ न कुछ तो होना तय ही है!)
"आज किसी से विवाद होने के योग हैं।" (अब जब झुन्नु सुबह से ही तनाव और शक का कीड़ा लेकर घूम रहा है, तो किसी न किसी से तो अपनी बहस करवा ही लेगा!)
📊 2️⃣ गणित का कमाल: 'प्रोबेबिलिटी' (Probability) और समाज का भ्रम
अक्सर लोग पूछते हैं कि "कभी-कभी तो राशिफल की बात बिल्कुल सटीक बैठ जाती है, वो कैसे?"
इसे समझने के लिए गणित का एक सरल नियम काम आता है, जिसे प्रोबेबिलिटी (संभावनाओं का गणित) कहते हैं। जब दुनिया में अरबों लोग हैं और रोज लाखों-करोड़ों घटनाएं हो रही हैं, तो गणित के नियम के मुताबिक कभी-कभी कुछ बहुत ही अजीब, अनोखी या दुर्लभ घटनाएं (चाहे बहुत अच्छी हों या बहुत बुरी) अपने आप तुक्के से घट जाती हैं।
भाग्य और दुर्भाग्य का सच: जब अचानक कोई बहुत अनोखी अच्छी घटना घटती है, तो अंधविश्वासी या पहले से 'भाग्य' को मानकर बैठे लोग उसे 'मेरा भाग्य/किस्मत' कह देते हैं। और जब कोई अनोखी बुरी घटना घट जाती है, तो उसे 'दुर्भाग्य या शनि का प्रकोप' बोल देते हैं। जबकि असल में वह सिर्फ गणितीय संभावना (Mathematical Probability) का एक दुर्लभ क्षण मात्र होता है!
यह समाज में कैसे काम करता है?
मान लीजिए आज अखबार में लिखा है— "आज आपको कोई अप्रत्याशित (सरप्राइज) लाभ या खबर मिलेगी।"
अब अगर देश में 10 लाख लोग यह राशिफल पढ़ रहे हैं, तो प्रोबेबिलिटी के हिसाब से कम से कम 500 से 1000 लोगों के साथ दिनभर में कोई न कोई सरप्राइज अपने आप (Random Coincidence से) हो ही जाएगा!
वे 1000 लोग खुशी से चिल्ला-चिल्लाकर सबको बताएंगे— "देखा! ज्योतिषी बाबा की बात 100% सच निकली!"
और बाकी जो 9,99,000 लोग हैं, जिनका राशिफल पूरी तरह गलत निकला, उनका दिमाग उस असफलता को चुपचाप भुला देता है। इसी तरह समाज में यह भ्रम जिंदा रहता है कि राशिफल काम करता है!
🎬 3️⃣ कंधे तक की फोटो और 'अंगूठी' का पूरा बाज़ार
अखबार में जो 'आज जन्मे जातक' वाला कॉलम होता है, उसमें हमेशा किसी बॉलीवुड हीरो या हीरोइन की कंधे तक की (पासपोर्ट साइज) फोटो छपी होती है।
अखबार वाले तो सिर्फ चेहरा ही छापते हैं, पर बाकी का काम टीवी न्यूज़ और गॉसिप चैनल पहले ही हमारे दिमाग में कर चुके होते हैं! झुन्नु को न्यूज़ से पहले ही रटा दिया गया होता है कि— "अमुक हीरो की फिल्में फ्लॉप हो रही थीं, फिर उसने नीलम की अंगूठी पहनी और उसकी किस्मत रातों-रात चमक गई!"
अखबार में सिर्फ कंधे तक की फोटो देखते ही झुन्नु के दिमाग में उस हीरो की उंगलियों में चमकती 4-4 अंगूठियां अपने आप तैरने लगती हैं। झुन्नु तुरंत सोचता है— "बस! मुझे भी वही नीलम की अंगूठी खरीदनी पड़ेगी!" 💎📈
💥 जरा एक बार ठंडे दिमाग से सोचकर देखिए...
अखबारों के राशिफल वाले पन्नों पर कभी महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. होमी जहांगीर भाभा या सी वी रमन जैसे महान लोगों की फोटो क्यों नहीं होती?
अगर भगत सिंह सुबह उठकर पहले अपना राशिफल देखते कि— "आज राहु काल चल रहा है, बम नहीं फेंकना चाहिए", या अंगूठी पहनने के शुभ मुहूर्त का इंतज़ार करते, तो क्या वे देश की आज़ादी के लिए क्रांति ला पाते? 😅
अगर सी वी रमन या होमी भाभा नीलम और पन्ना की अंगूठियों के भरोसे बैठे रहते, तो क्या वे विज्ञान की दुनिया में भारत का झंडा गाड़ पाते?
ये महान हस्तियां कभी इन 12 राशियों और चमत्कारी पत्थरों के पाखंड में बंधी ही नहीं!
📢 4️⃣ सामाजिक व बाज़ारू षड्यंत्र (Social Conditioning)
अक्सर आपने ध्यान दिया होगा कि जब भी देश में लोग अपने हक, अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य या रोज़गार के लिए सवाल उठाने लगते हैं या कोई आंदोलन खड़ा होता है, तब बाज़ार के व्यापारी और पाखंडी वर्ग इस तरह के 'राशिफल' और 'चमत्कारी रत्नों' का प्रचार-प्रसार और तेज़ कर देते हैं।
ताकि झुन्नु जैसा आम नागरिक अपने अधिकारों के लिए लड़ने या सरकार से सवाल पूछने के बजाय घर बैठकर यह सोचने लगे कि— "अरे भाई! अभी तो मेरा शनि ही भारी चल रहा है, उंगली में अंगूठी पहनो और चुपचाप घर में दुबक कर बैठो।"
जनता को मशीनी सांचे में ढालकर 'भाग्यवादी' बनाए रखना, बाज़ार और सत्ता के आकाओं को खुश करने का सबसे आसान और पुराना तरीका रहा है।
👤 5️⃣ असली विडंबना: इंसान के अंदर छुपा हुआ डर
🧩 एक इंसान अपनी असीमित चेतना को 12 राशियों और उंगली की अंगूठियों के छोटे से सांचे में खुद ही ढालने की कोशिश करता है—क्योंकि वह अंदर से बहुत गहरा डरा हुआ है!
अहंकार जब अपनी जिम्मेदारियों, अपनी मेहनत, सही प्लानिंग और जिंदगी की अनिश्चितता से घबराने लगता है, तो वह एक झूठी 'सांत्वना' (Comfort) तलाशता है। वह खुद को एक मशीनी ढर्रे में बांध लेता है ताकि उसे अपनी कमियों, गलतियों और डर का सामना न करना पड़े।
💭 जिसे झुन्नु बड़े गर्व से "भाग्य में मेरा विश्वास" कहता है, वह असल में उसके अपने ही अंदरूनी डर और अज्ञान को ढकने का एक पर्दा मात्र है—और अहंकार हमेशा यही चाहता आया है कि व्यक्ति किसी भी तरह अज्ञानी ही बना रहे।
❓ जब भी ऐसी स्थिति आए, तो झुन्नु को रुककर खुद से यह सवाल पूछना चाहिए:
"क्या मेरी असीम चेतना का वजूद अखबार की दो गोल-मोल लाइनों, किसी एक्टर की फोटो और उंगली में फँसी एक अंगूठी का मोहताज है?"
🧱 जब तक आप खुद को इस मशीनी पैटर्न और अंधविश्वास के ढर्रे में बांधकर रखेंगे, तब तक बाज़ार के चालाक व्यापारी आपकी जेब ढीली करते रहेंगे और आपका शोषण होता रहेगा।
🪞 अष्टावक्र गीता हमें याद दिलाती है कि आप कोई बंधन में बंधने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि आप 'शुद्ध और असीम चेतना' हैं। अष्टावक्र गीता के अध्ययन के बाद व्यक्ति को स्वयं ही समझना चाहिए कि व्यक्ति कोई ग्रह-नक्षत्रों के इशारों पर नाचने वाले मशीनी जीव नहीं है।
किसी गोल-मोल भविष्यवाणी, प्रोबेबिलिटी के भ्रम और पाखंड के चक्कर को छोड़कर तथा अपने अहंकार को समझते हुए अंदर बैठे डर का सीधे सामना करना ही असली समाधान है। असली मुक्ति किसी सांचे में ढलने या अंगूठी पहनने में नहीं, बल्कि व्यक्ति द्वारा अपने असीम स्वरूप को पहचानकर जागने में है।
समस्या अहंकार की है जो ऐसे पाखंडियों को तरह-तरह से समर्थन देता रहा है। आचार्य प्रशांत जी द्वारा चलाया जा रहा 'गीता मिशन' व्यक्ति को उसके अहंकार के प्रति सजग बनाकर इसी अंधविश्वास पर गहरा प्रहार करता है।
अहंकार कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता, लेकिन अहंकार द्वारा समय-समय पर चली जा रही चालों को सहज रूप में सजग रहकर देख पाना ही गीता मिशन का मुख्य उद्देश्य है। बहुत से गीता प्रतिभागी आज भी अंगूठियाँ आदि धारण करते हैं, जो यह दर्शाता है कि अहंकार ने अपनी नई चाल चलकर ज्ञान अर्जन के साथ ही खुद को ढाल लिया है। चूँकि अहंकार अज्ञानी बने रहने में बहुत माहिर है, इसलिए किसी ज्ञानी व्यक्ति से बोध लेते वक्त भी वह ऐसी चाल चलता है कि व्यक्ति अपनी पुरानी मान्यताओं और बंधनों पर प्रश्न-चिह्न ही न उठा पाए।
प्रश्न-चिह्न सिर्फ सजगता और अपने अहंकार के प्रति शत्रुता रखकर ही उठ सकता है, तभी इसका समाधान संभव है। इसी से व्यक्ति बंधनों से मुक्त होकर अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए सही और प्रभावी कदम उठा सकता है।
आइए, गीता मिशन को और अधिक सशक्त बनाएं, अपने बंधनों को तोड़ें, और स्वयं समझते हुए दूसरों तक भी आचार्य जी की बात पहुंचाएँ!
#AcharyaPrashant #Lokdharma
Posted by Hridesh Chandra on Acharya Prashant App.
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Kanta Wankhede
🌿हा सिर्फ अपने अहंकार को सहलाने वाली मीठी बातों में उलझा हर व्यक्ती l
इस लिए बाबाजी वाली बातो पर यकीन कर लेता हैं l
अहंकार को बचाये राखता हैं l
Saloni
ह ऐसा मेरे साथ होता है।
JITESH KUMAR TELI
में अपने अहंकार को सहलाने वाली मीठी बातों में उलझा हुआ हूँ?
Urmil
शुक्र है 😇🙏🏻 मैंने कभी भी ज्योतिष वगैरा व बाबाओं पर कभी विश्वास नहीं किया । यह मेरी सोच के दायरे से बाहर है । मैं अक्सर सोचा करतीं 🤔 क्या ही हो जाएंगा ये सब करके जो कुछ भी है अपनी बंद मुट्ठी ✊ और पुरुषार्थ में है ।
Khushi pandey
पहले मैं भी अखबार में अपनी राशि पढ़ती थी और कई बार मुझे लगता था कि उसमें लिखी बातें बिल्कुल मेरे ऊपर ही लागू हो रही हैं। लेकिन अब समझ आता है कि ऐसा इसलिए नहीं था कि वह भविष्यवाणी सच थी, बल्कि हम सामान्य बातों में भी अपने जीवन से जुड़ा अर्थ ढूँढ लेते हैं। यह पोस्ट पढ़कर अपने ऊपर भी इस ‘बार्नम इफेक्ट’ को महसूस किया। सच में, हमारा मन वही देखने और मानने लगता है जिसे वह अपने बारे में सच समझना चाहता है।
Shikha
pahle mai bhi news paper me raasi dekhti thi aur yakin tha ki mai hi hu wo jiske liye h ye pr ab bahut kuch ki tarah ye bhi samajh aa gayi ki bs chhalna h khud ko
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ROHIT SINGH GUSAIN
अहंकार का खेल बाबू भैया। 😅 इसी को तो समझना है।
Priyanka yadav
वास्तविक जानने का प्रयास कर रही हूँ ।
Reetika
ha mere sath aksar hota hai jab bhi koi kuch kahta hai to mujhe lagta hai ki meri hi bat ho rhi hai but aj pta chala ki iske piche psychology hai jise barman effect kahte hai
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MaNorama Vyas
पहले मैं भी ज्योतिष पर विश्वास करती थी और उसमें कही गई बातों को सच मानकर अपने जीवन को उसी के अनुसार देखने लगती थी। लेकिन जब से आचार्य जी को सुनना शुरू किया, धीरे-धीरे इन मान्यताओं पर प्रश्न उठने लगे। अब किसी बाहरी भविष्यवाणी में अपना जीवन तलाशने के बजाय अपने भीतर के अहंकार को देखने और समझने की कोशिश करती हूँ। मुझे लगता है कि सच्चा परिवर्तन भविष्य जानने में नहीं, बल्कि वर्तमान में स्वयं को पहचानने और अपने भ्रमों से मुक्त होने में है।
Anuja Kand
मैं पहले ज्योतिष में बहुत विश्वास रखती थी। आचार्य जी से जुड़ने के बाद पता चला कि मेरा समय कोई ग्रह तय नहीं करता बल्कि गदहवा अहंकार तय करता है 😂
वो ग्रह तो घूम रहा है मस्त अपना, उसको कुछ नहीं पड़ी है मेरी। 🤣
PULAKESH GHORUI
अहंकार खुद को बचाने के लिए,हर वक्तव्य को अपने स्वार्थ के अनुसार अर्थ वाना लेता है।
Anjalli yadav
हा अक्सर यही होता हैं जेसीबी कोई व्यक्ति तरीफ कर देता है उसे हम तुरंत मान लेते है क्योंकि वह बात अहंकार को सही लगती हैं
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anshu Kumari
मुझे ये सब पर कभी विश्वास नहीं होता था।मैं जब भी कभी किसी को अपने भविष्य के बारे में पूछने और हाथ दिखाते हुए देखती थीं तो मन में बहुत सवाल आते थे फिर मैंने इसकी वास्तविकता को जानने का प्रयास किया लेकिन सही जवाब अब मिला।
Keshar Devi
mujhe bhi hamesh aisa hi lagata hai ki jo achhi ya buri baaten hai vo sab mere liye hai aur hum khud ki hakikat bhool jaate hai
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रजनी सिंह
आज तक मैं किसी ज्योतिषी या किसी अंधविश्वास में नहीं पड़ी हूं क्योंकि मुझे पता है यह सबकुछ बकवास होता है
✍🏻 पोस्ट 24 | 26 अगस्त '26 💭 विषय — मनोविज्ञान ────────── 🔮 'क्या आपको भी लगता है कि ये…