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जानने की कोशिश तो वास्तविकता की होती है। पर कभी कभी अपने अंहकार को सहलाने वाली बातो में उलझ जाती हूं।
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जानने की कोशिश तो वास्तविकता की होती है। पर कभी कभी अपने अंहकार को सहलाने वाली बातो में उलझ जाती हूं।

कविता जी, यही ईमानदारी काफी है। यह देखना कि कभी कभी उलझ जाती हूं, खुद उस उलझने से निकलने का पहला कदम है, क्योंकि उलझा हुआ मन खुद को उलझा हुआ मानने से पहले हमेशा सफाई देता है। आप सफाई नहीं दे रहीं, बस देख रही हैं। यही देखना अभ्यास से गहरा और तेज़ होता जाता है, अगर इसे यहीं थमने न दिया जाए।