
जी, पहले ऐसा ही होता था , लेकिन अब नहीं। अब और बातों पर ध्यान नहीं मैं नहीं सही से बता सकती। लेकिन जैसे अब मैं आचार्य जी को सुनती हूँ तो हर बार मुझे ये लगता है , कि बात मेरी ही हो रही है। आचार्य जी वो बात हर किसी के बारे में बोलते हैं , और मुझे लगता है बिल्कुल ऐसा ही तो है , ये तो मेरी बात है। जब आचार्य जी ये बताते हैं कि हम कैसे हैं, कितने बेचैन हैं , जहाँ समस्या की बात आती है, तो वो बात ऐसा लगता है, मैं ही तो हूँ मेरे बारे में बोली जा रही है। 💯
















