✍🏻 पोस्ट 1 | 13 अक्टूबर '26💭 विषय — इंडियन करंट अफ़ेयर्स──────── Gen Z की नवरात्रि! नवरात्रि, देवी दुर्गा से सीखने का पर्व है। लेकिन क्या हम इसके मर्म को समझ रहे हैं, या यह अहंकार की भेंट चढ़ता जा रहा है?📰 NDTV की हाल ही की रिपोर्ट के अनुसार, अहमदाबाद में कुछ लोग गरबा से पहले ऊर्जा और त्वचा में निखार पाने के लिए IV ड्रिप लगवा रहे हैं।
💉 एक सत्र की कीमत ₹4,000 से ₹10,000 है, जबकि कुछ पैकेज ₹15,000 तक पहुँचते हैं। इनमें *वि…
Jaise Ham vaisi hamari lalsa. hamari upbhoktavadi soch humein upbhog karne ke liye prerit karti hai Ham prakriti ke sandesh ko naa samajh uska upyog karna chahte hain aur lagatar adhik pane aur dusron se behtar dikhne ke liye vrat tyohar ko bhi sunhara mauka samajhte hain .
Archana
obvious yes
Raushan Kumar
haa ham taiyar ho rahe hii.
Sai Swaroop Solanki
हाँ, मुझे लगता है, कि मैं तो तैयार हूँ।
पर शायद हम नहीं। न हम सही दुर्गा को पहचान पा रहे हैं, न ही राक्षस कौन है उसको। माँ प्रकृति, जो सबकी माँ है, वही दुर्गा है, और हम ही राक्षस हैं,
जो उसका अंधाधुंध भोग कर रहे हैं।
Dhananjay Kumar Pal
Pure nonsense and unawareness.
Preeti kumari
हा हम तैयार हैं।
चलो एक चीज तो है जिस पे मैं कभी भी 1रुपया भी नहीं लगाई हु इस बात की खुशी है मुझे।
🙈ब्यूटी पार्लर गई हु एक बार दीदी के साथ पर कुछ नहीं करवाई यहां तक आज तक हेयर कट भी नहीं करवाई हु ।
इस सब में इंटेलीजेंट हु अपना हेयर कट खुद कर लेती हूं।
😀
🌱चलो कुछ तो अच्छा है मुझ में।
मुझे लगता था सारी कमी मुझ में ही है।
🍂और आगे भी 1 रुपए भी नहीं खर्च करूंगी इस सब में।
मुझे बुद्धि देना बड़ी माँ।🌼
Shailesh Patel
The pursuit of external beauty is not confined to those who are already attractive or aspire to be so. Instead, it often stems from a desire for validation from others based solely on physical appearance. This tendency can be seen as an ego praising an ego, devoid of deeper meaning or value. It may also indicate a deficiency in inner beauty, prompting a greater focus on outward presentation. True fulfillment lies in being appreciated for one's inner qualities.
Kundan Kumar
नहीं, क्योंकि हम(अहंकार) अपने खालीपन को भरने के लिए बाहर को भागते है और सोचते है, ये बाहरी चीजें है जो हमे पूर्ण कर देगी इस तरह से हरेक चीज को आजमाते है, अंततः खाली हाथ लौटना पड़ता है, वजह है भीतर को न देखना। और इस भोग के नतीजा (result) आज हम क्लाइमेट चेंज के रूप में देखते है आज दुनिया में कई तरह की आपदा देखने को मिलता है जैसे हाल ही में नेपाल में दूसरा बार बाढ़ आया और ये कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है बल्कि अहंकार के भोग का नतीजा है।
Pratibha Kumari
सही कहा आपने आज हमारे त्यौहार मनोरंजन बन चुके है।हमें खुद पता नहीं होता कि त्यौहार का असली मतलब क्या होता है😔।त्यौहार को बस मनोरंजन की तरह न देखे ये हमें समझना होगा ।
Pankaj
🙏👍
Rahul Kumar
👍👍👍👍
Rahul Singh
We are more stucking into our incompleteness
Mithu Das
may job pohele korte the Puja k somoi ab souch kay mujhe bohot gussa vi aata hay or hashi vi aata hay kiya kor rohi the may kopda to lena hi hota tha or bohot Kharche kiya korte the Acharya ji ko bohot bohot dhanya baad ye sab se chut paye hu jo deta tha bohot baat vi bolta tha ab puchta hay ku nhi lena hay may bolte hu achha nhi logta ab
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SUBHASH SURESH RATHOD
क्या हम उस लालसा को पहचानने के लिए तैयार हैं, जो हमें लगातार अधिक पाने और दूसरों से बेहतर दिखने के लिए प्रेरित करती है?
Ans:- हा मैं तैयार हु ..
Sarita Kumari
🙏 ji bilkul mai taiyar hun
bharti tanwar
मैं अगर सिर्फ अपनी बात करूँ तो हाँ जब सब मुझसे कुछ अलग कर रहें होते हैं तब मुझे भी लगता हैं ये जैसे सब लोग बताते आये हैं कि इसी को आगे बढ़ना कहते हैं। तब मैं भी निराश, हताश महसूस करती हूँ फिर जैसा आचार्य जी समझाते हैं कि ये आगे बढ़ने जैसा concept अपने आप में बे बुनियाद हैं। हम बस अंधे बनकर भीड़ के साथ चल पड़ते हैं बिना ये पूछे कि ये जो हम कर रहें हैं इसका क्या औचित्य हैं?
तो इसलिए ठहरना जरूरी हैं!!!!
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Reetika
हां
RADHA RAY
नमस्ते आचार्य जी पहले मैं नौ दिन तक कलश रखती थी पुजा करती किताब पढ़ती थी वो भी बीना जाने समझे कभी एक समय खाना खाकर कभी फल खाकर और अंदर से खाने के लिए बेचैन थी भुख ही नहीं मिटती थी ऐसे करके कम से कम पन्द्रह साल ये पुजा पाठ किया पर कुछ समझ में नहीं आया जब से आचार्य जी के शिक्षा से जुड़ी हूं तब से समझने लगी हूं असली पुजा क्या है धीरे धीरे मान्यता भी हट रही है धन्यवाद
Kavita bidasar
ha
Anju Bajaj
भला हुआ मोरी गगरी टूटी
में पनिया भरण से छूटी ।😂😂
ये किस तरीके की जिंदगी हम जी रहे है ।किसके लिए क्यों ।
Santosh Sagar
इस नवरात्रि प्रश्न यह नहीं कि देवी ने कितने असुरों का वध किया, बल्कि यह है कि हम अपने भीतर के किस असुर को पहचानने और उससे मुक्त होने के लिए तैयार हैं।
🌺 जिस दिन मनुष्य अपनी इच्छाओं का अंधा अनुयायी होना छोड़ देगा, उसी दिन उसके भीतर देवी की शक्ति को समझने की शुरुआत होगी।
Sunita
क्या हम उस लालसा को पहचानने के लिए तैयार हैं, जो हमें लगातार अधिक पाने और दूसरों से बेहतर दिखने के लिए प्रेरित करती है?
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जो हम बने बैठे है उसके रहते उस लालसा को पहचानना सम्भव नहीं है लेकिन बोध की आँखों, वेदांत,आचार्य जी की शिक्षाओं से ये सम्भव है 🙏🙏
किरण Bhardwaj
क्या हम उस लालसा को पहचानने के लिए तैयार हैं, जो हमें लगातार अधिक पाने और दूसरों से बेहतर दिखने के लिए प्रेरित करती है?
हा जरूर।
किरण Bhardwaj
अपने भीतर की प्रवृत्ति को भी पहचानने का अवसर है।
Amisha khandey
1. नवरात्रि केवल देवी का उत्सव मनाने का अवसर है, या अपने भीतर की प्रवृत्तियों को पहिचानने का भी?
प्रवृत्तियों को पहिचानने का अवसर:
आचार्य जी के अनुसार, नवरात्रि जैसे पर्वों का वास्तविक अर्थ किसी बाहरी मूर्ति या शक्ति की पूजा तक सीमित नहीं है। यह हमारे अपने भीतर की तामसिक, राजसिक और आसुरी प्रवृत्तियों (अहंकार, वासना, ईर्ष्या, और अज्ञान) को देखने और पहिचानने का एक गंभीर अवसर है।
देवी का वास्तविक स्वरूप:
'देवी' या 'शक्ति' कोई बाहर बैठी हुई काल्पनिक सत्ता नहीं हैं, बल्कि वे विवेक, चेतना और सत्य का प्रतीक हैं। उत्सव का उद्देश्य अपने मन की गंदगी को साफ करना और भीतर छिपी नकारात्मकता का वध करना होना चाहिए।
2. क्या हम उस लालसा को पहिचानने के लिए तैयार हैं, जो हमें लगातार अधिक पाने और दूसरों से बेहतर दिखने के लिए प्रेरित करती है?
अहंकार की अंतहीन दौड़:
हमारे मन में जो लगातार संग्रह करने की (अधिक पाने की) और समाज में खुद को दूसरों से श्रेष्ठ दिखाने की जो अंधी लालसा (Ambition/Greed) बैठी है, वही हमारे सारे दुखों का मूल है।
आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता:
वास्तविक साधना तभी शुरू होती है जब हम इस लालसा से नजरें चुराने के बजाय साहस जुटाकर इसका सामना करें। यह देखना जरूरी है कि हमारा यह पाखंड और दिखावा असल में हमारे भीतर के गहरे असुरक्षा बोध और खोखलेपन को छिपाने का एक असफल प्रयास मात्र है।
Bharti Parmar
ये बात नवरात्रि की नहीं है ।
मुझे तो आज तक बाकी त्योहार पर भी लड़कियां या औरतें सब करवाती वो भी समझ नही आया ।
पहले मेरा ये था कि कोई शादी में खर्चा करके सुन्दर बनता है वहां तक तो ठीक है , लेकिन करवा चौथ व्रत हो , हड़ताली तीज हो या अन्य कोई भी त्यौहार हो उसमें वेक्स करवाना ओर मुंह पर फेशियल करवाना उसका क्या ही लेना देना होता है ।
लेकिन अब समझ आता है ।
ये सब इशारा कहा हो करते है ।
Saksham Bharti
People are living just to show off. 😵💫😵💫
मेरे क्षेत्र में लोग प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं कि किसकी दुर्गा मां की मूर्ति बड़ी है | और उसपर 2 लाख खर्च करके भव्य मूर्ति लाए हैं, मैं ये सोच कर हैरान हू कि जहां मूर्ति को बहाएंगे उस जगह का क्या होगा 🤦🤦🤦
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Rekha Shewale
tyoharo ke nam kya kuch chalata hai samaj mein ye hm sbko pta hai. bhagvan ke nam pe dikhava aur bs dhong chal rha hai. apne aapko dusre se jyada sudar dikhana, apna rutba dikhana ye sb tyohari ke samay jyada chalta hai.
jb se mai Aacharya ji ko sunati tb mujhe ye sb kuch dhakosle lagate hai, aur aaspaas mahol ko dekhkr hansi aati hai, aur dukh bhi hota hai🥺
हसी is bat ki aati hai ki tyoharo के nam pr kya kya krte rhte hai log, sabko bs sundar dikhna hai chahe kuch bhi krna pde, sirf tyoharo ke liye log kitna kharch krte hai.ye nachana, gana, DJ ki bhayank aavaj aur ye dikhava isase na to devi maa khush hogi, na hm kisi uchhatam prapti kr payenge, ye sb krke hm sirf vinaash kr rhe hai maa prakriti ke sath khilwaad ka natija hm abhi vartman mein hi bhog rhe hai phir bhi hme kuch hosh nhi aa rha hai.
aur dukh is bat ka hai ki devi ke nam pr pashuhatyaye hoti hai apne swad ke liye nam ishwar ka liya jata hai, aur ye log itne rakshashi vrutti ke hote hai ki inhe samjhane pr bhi nhi smjhte😔
✍🏻 पोस्ट 1 | 13 अक्टूबर '26 💭 विषय — इंडियन करंट अफ़ेयर्स ──────── Gen Z की नवरात्रि!…