
मैं अगर सिर्फ अपनी बात करूँ तो हाँ जब सब मुझसे कुछ अलग कर रहें होते हैं तब मुझे भी लगता हैं ये जैसे सब लोग बताते आये हैं कि इसी को आगे बढ़ना कहते हैं। तब मैं भी निराश, हताश महसूस करती हूँ फिर जैसा आचार्य जी समझाते हैं कि ये आगे बढ़ने जैसा concept अपने आप में बे बुनियाद हैं। हम बस अंधे बनकर भीड़ के साथ चल पड़ते हैं बिना ये पूछे कि ये जो हम कर रहें हैं इसका क्या औचित्य हैं? तो इसलिए ठहरना जरूरी हैं!!!!
















