
✍🏻 पोस्ट 4 | 19 अक्टूबर '26 💭 विषय — विज्ञान ────────── 😢 12 साल तक लड़के-लड़कियाँ लगभग बराबर रोते हैं, उसके बाद क्या बदल जाता है? 🚲 सोचिए, सात साल के दो बच्चे हैं, एक लड़का और एक लड़की। दोनों साइकिल से गिरते हैं, घुटने छिलते हैं और दोनों रो पड़ते हैं। दस साल बाद वही लड़का खेलते हुए चोट खाता है। आँखों में आँसू आते हैं, लेकिन वह उन्हें छिपा लेता है। कोई कहता है, “लड़का होकर रोता है?” दूसरी ओर, लड़की रोती है तो सुनने को मिलता है, “लड़कियाँ तो रोती ही हैं।” ❓ तो क्या लड़के और लड़कियों के रोने का यह अंतर प्रकृति ने बनाया है, या समाज ने उन्हें ऐसा बनना सिखाया है? 🔬 शोध क्या कहता है? डच मनोवैज्ञानिक एड विंगरहोट्स (Ad Vingerhoets) ने रोने पर लंबे समय तक शोध किया है। 2011 में Cross-Cultural Research में प्रकाशित एक अध्ययन में 37 देशों के 5,715 लोगों से उनके रोने की आदतों के बारे में पूछा गया। 📊 लगभग सभी देशों में महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा रोने की बात कही। कुछ अनुमानों के मुताबिक, महिलाएँ साल में लगभग 30 से 64 बार, जबकि पुरुष 6 से 17 बार रोते हैं। ध्यान रहे, ये आँकड़े लोगों के अपने बताए अनुभवों पर आधारित हैं। हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है। 🧒 फिर यह अंतर शुरू कब होता है? बचपन में लड़के और लड़कियों के रोने में बहुत बड़ा अंतर नहीं दिखता। लेकिन लगभग 11 से 13 साल की उम्र के आसपास यह अंतर उभरने लगता है। 😮 एक दिलचस्प बात यह है कि अंतर सिर्फ़ लड़कियों के ज़्यादा रोने से नहीं बनता, बल्कि लड़कों के रोना कम कर देने से भी बनता है। 🧪 क्या हार्मोन इसकी वजह हैं? 1985 में बायोकेमिस्ट विलियम फ्रे ने यह विचार रखा कि किशोरावस्था में होने वाले हार्मोनल बदलाव रोने की आदत को प्रभावित कर सकते हैं। 🔹 प्रोलैक्टिन नाम का हार्मोन महिलाओं में आम तौर पर अधिक होता है। यह आँसू बनने में भूमिका निभा सकता है। 🔹 टेस्टोस्टेरोन का स्तर भी रोने की प्रवृत्ति को प्रभावित कर सकता है। कुछ अध्ययनों में इसके स्तर और रोने के बीच संबंध पाया गया है। ⚠️ लेकिन विज्ञान के पास अभी इसका पूरा जवाब नहीं है। हार्मोन ही सब कुछ तय नहीं करते। एक डच अध्ययन में भी मासिक धर्म शुरू होने और रोने के बीच वैसा साफ़ अंतर नहीं मिला, जैसा इस विचार से उम्मीद की जा सकती थी। 🌍 एक और चौंकाने वाली बात! कुछ शोधों में पाया गया कि अधिक अमीर और अधिक लोकतांत्रिक देशों में स्त्री-पुरुष के रोने का अंतर कम होने के बजाय ज़्यादा था। शोधकर्ताओं का एक अनुमान है कि जहाँ भावनाएँ दिखाने की ज़्यादा छूट होती है, वहाँ महिलाएँ खुलकर रो पाती हैं। वहीं, जहाँ रोने को कमज़ोरी माना जाता है, वहाँ लोग अपने आँसू छिपाना सीख सकते हैं। 🤝 2021 में 41 देशों के 7,007 लोगों पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि आँसू भरे चेहरे देखकर लोगों की मदद करने की इच्छा बढ़ सकती है। यानी आँसू सिर्फ़ दुख जताने का तरीका नहीं हैं। वे दूसरों को यह संकेत भी दे सकते हैं कि किसी को मदद या सहारे की ज़रूरत है। 🪞 अब ज़रा अपनी ओर देखें। शरीर की अपनी बनावट है, उसके अपने हार्मोन हैं। आँसू आना शरीर की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसमें न कोई शर्म की बात है, न कमज़ोरी का प्रमाण। लेकिन आँसू आना अपने आप में अच्छाई या सच्चाई का प्रमाण भी नहीं है। “यह तो बहुत भावुक है, बात-बात पर रो देता है” और “मर्द को दर्द नहीं होता”, दोनों ही धारणाएँ हमें एक तय छवि में बाँध देती हैं। 🧠 जिस लड़के को बार-बार कहा जाता है कि रोना कमज़ोरी है, वह धीरे-धीरे अपने आँसुओं से नहीं, अपनी छवि से बँध जाता है। अब उसके लिए सवाल यह नहीं रह जाता कि उसे दुख हो रहा है या नहीं, बल्कि यह बन जाता है कि कहीं लोग उसे कमज़ोर तो नहीं समझेंगे। और यही बात उलटी दिशा में भी हो सकती है। कभी कोई व्यक्ति आँसुओं के ज़रिए दूसरों की सहानुभूति पाने की कोशिश करता है। यानी आँसू दबाना हो या उन्हें दिखाना, दोनों के पीछे दूसरों की नज़र में अपनी एक खास छवि बनाए रखने की चाह होती है। 💡 इसलिए बात सिर्फ़ रोने या न रोने की नहीं है। ज़रूरी यह देखना है कि हम खुद को समझ रहे हैं या समाज से सीखी हुई धारणाओं के हिसाब से व्यवहार कर रहे हैं। भावना को दबा देना समाधान नहीं, लेकिन हर भावना के बहाव में बह जाना भी समझदारी नहीं। ❓ आँसू आने पर हमें क्या देखना चाहिए: अपनी कमज़ोरी, अपनी अच्छाई, या वह छवि जिसे बचाने के लिए हम कभी रोते हैं और कभी अपने आँसू छिपा लेते हैं? स्रोत: 1. https://journals.sagepub.com/doi/10.1177/1069397111404519 2. https://www.apa.org/monitor/2014/02/cry 3. https://www.frontiersin.org/journals/psychology/articles/10.3389/fpsyg.2019.02288/full 4. https://link.springer.com/article/10.1007/s11199-012-0136-4 5. https://doi.org/10.1016/j.jesp.2021.104137















































