
वह छवि जिसे देखकर कभी हम आंसू छुपा लेते है और कभी रो देते है, दोनों में ही मै को बचाने का प्रयास रहता है।
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वह छवि जिसे देखकर कभी हम आंसू छुपा लेते है और कभी रो देते है, दोनों में ही मै को बचाने का प्रयास रहता है।

पूनम जी, ठीक यहीं तक देखने के बाद एक कदम और बढ़िए। यह जो पहचान हो गया कि आंसू रोकना और आंसू बहाना दोनों एक ही छवि बचाने के खेल हैं, इसको सिर्फ़ जान लेना काफ़ी नहीं। अगली बार जब आंखों में पानी आए, उस क्षण खुद से पूछिएगा कि अभी यह जो हो रहा है, यह वाकई उस पल की सच्चाई है या किसी को दिखाने-छुपाने की कोई परत चढ़ रही है। पहचान तो एक सेकंड में हो जाती है, पर उस पहचान को उसी पल में जी लेना, छवि को बीच में आने ही न देना, यही असली काम है। समझ को जीवन में उतरने का मौका दीजिए, सिर्फ़ एक अच्छा विचार बनाकर मत छोड़िए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401