
Priya Pant
मैं भी एक महिला हूं लेकिन पता नहीं क्यों मुझे जल्दी रोना नहीं आता है। मैं तब तक नहीं रोती हूं जब तक कोई बात मुझे अंदर से तोड़ ना दे। यह साल पूरा बीतने वाला है मुझे नहीं लगता इस साल मैं एक भी बार सोई हूं। पिछले साल एक बार रोई थी, जब पति ने तलाक देने की बात की थी। इस साल मेरे पति की दादी की डेथ हो गई थी। मैं भी गई थी, सब रो रहे थे, घर के लोग तो रो ही रहे थे जो गांव की औरतें आई थी वह भी एक दो आंसू बहा देती थी। पर मेरी आंखों से एक आंसू नहीं निकला मेरा मन कर रहा था, मैं यहां से उठ कर चली जाऊं। पता नहीं मेरा दिल है कि पत्थर रोना ही नहीं आता है। प्रकृति माता ने शरीर भी मर्दों जैसा दिया है और जिगरा भी मर्दों जैसा हो गया है। जल्दी पिघलता ही नहीं है।


















