✍🏻 पोस्ट 2 | 12 सितम्बर '26
💭 विषय — लोकधर्म─────────होंठ में इतनी बड़ी प्लेट क्यों पहनती हैं ये महिलाएँ?
🇪🇹 इथियोपिया की मुरसी समुदाय की कुछ महिलाएँ अपने निचले होंठ को धीरे-धीरे खींचकर उसमें लकड़ी या मिट्टी की बड़ी गोल प्लेट पहनती हैं।
🌱 यह परंपरा आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, हालांकि युवा पीढ़ी में इसका चलन कम हो रहा है।
👧🏻 *आमतौर पर किशोरावस्था के आसपास निचले होंठ में छेद किया जाता है। फिर धीरे-धीरे बड़े प्लग लगाए जाते हैं,…
कितना दर्दनाक है 🙁 हमारे समाज में स्त्रियां कान और नाक में पहनती हैं तो कम से कम देखने में तो ठीक लगता है और यह तो देखने में भी अच्छा नहीं लग रहा है।
Suneeti Shukla
ye usi prakar h jaise hum log apne face pr makeup karte h.🙏
Govind Singh
जब अहंकार अपनी पहचान बाहरी मान्यताओं परंपराओं से जोड़ लेता है तो शरीर भी उसी की ओर ढलना शुरू हो जाता है किंतु यह सवाल कभी नहीं आता कि हम जो कर रहे हैं वो करना ही सही है क्या क्या परंपरा और मान्यता सुंदरता का मापदंड तय करेगी 🪞🧠
pahle yah main bhi sochati Thi ki Main yahan jaaungi to Samaj kya kahega Magar jab Se Aacharya ji sunna shuru ki hun yah sab sochana kam ki hun Samaj mujhe kya kah raha hai kya nahin Kah Raha Hun yah main jyada ab nahin sochati main pahle apna छोटा-मोटा bhi kam dusre se karvati Thi Magar ab apna छोटा-मोटा Kam khud Se Hi karna shuru kar di hun.
Usha
jarasal jo ham karte hai,wo ham nahi kar rahe hote hai wo to koi or hi karta hai,esliye karta hai ki samajh mujhe badsurat na kahe.
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Pankaj
apna kya hai apna to kuchh bhi nahin hai ham Jo bhi karte Hai vah sab samaj ke logon Ko dekhkar karte Hain ladkiyon ko Bachpan se hi Aisa banaya jata hai ki jo humne Kiya hai vah hi aapko karna hai
Suneeta Devi
बचपन से ही ज़्यादा सजना-सॅंवारना पसंद नहीं है पहले मैं WhatsApp D.P में अपनी फ़ोटो लगाती थी तो बड़े भाई ने कहा (समुदाय का नाम) लिया था उनकी तरह क्यों रहती हो फिर धीरे -धिरे क़रीबियों से दूरियां ही बनाकर रहती हूॅं लेकिन दबाव में किसी के नहीं।
Sushil Kumar Garg
ये पागलपन है।
Archana
समाज कुछ भी तय करे हम्मे फर्क नहीं पड़ना चाहिए बल्कि फर्क इससे पड़ना चाहिए की हम अपने लिए क्या तय कर रहे हैं.. 🙏🤗
Shradha
🎆🎆🎆🎆🎆🎆मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा क्या समाज में ऐसा भी
होता है। 🪞🪞पहली बार देखा है।🎆🎆
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Shradha
हमारा अपना क्या है कुछ भी तो नहीं।
अपनी पहचान, अपना अस्तित्व सब
कैसी दूसरे पर छोड़ दिये है।
अब ओ तय करेगा कि हम कौन है।
लेकिन एक आचार्य जी है जो किसी दूसरे से नहीं खुद से मिलवाते है।
धन्यवाद 🙏
Mukesh
वातावरण परिवेश बहुत प्रभाव डालता है शेर के बच्चे को भी भेडों के बीच रख दिया जाए तो अपने आप को भेड़ समझने लगता है निमियाने लगता है हम भी तो सामाजिक प्राणी है।
Kavita Sharma
आज से 35-40 साल पहले तो हमारे समाज में भी नाक - कान छिदवाने की परम्परा बहुत प्रचलित थी। हमने भी वो सब खुशी खुशी किया। आज से 13 साल पहले मैंने अपनी बेटी की कान भी छिदवाए, वो सुंदर लग रही थी, मैं काफी खुश थी । 2019 से आचार्य जी को सुनने का मेरे विचारों पर भी प्रभाव पड़ने लगा और समझ में आने लगा कि ये सब धर्म का हिस्सा नहीं है , जरूरी नहीं कि स्त्री को हमेशा साज - श्रृंगार करके ही रहना चाहिए। बाद में मैंने अपनी बेटी का नाक नहीं छिदवाए, कई बार मुझे सुनना भी पड़ा कि शादी के बाद बाली कैसे पहनेगी, मेरा जवाब था कि यदि उसे ये सब जरूरी लगेगा तो वो अपना देख लेगी शादी के बाद। बिना नाक में बाली पहने क्या शादी नहीं होगी।
बचपन में मैंने नारी - धर्म की किताब पढ़ी थी उसने मेरी सोच को भी बहुत बुरे तरीके से खराब कर दिया था, मैंने वो सब किया था जैसा कि उसमें लिखा था, लेकिन सब करने के बाद भी कोई खुश नहीं रहता था, तो मैं भी अगले जन्म की व्यर्थ की चिंता छोड़ दी, अगले जन्म में भगवान क्या करेंगे वो तो तब देखो जाएगा, इस जन्म में तो शांति मिले। मैंने पति को भगवान की छवि से नीचे उतारकर life - partner की जगह दे दी। बाकी members को भी सही जगह दी और आज सब काफी खुश भी हैं मुझसे।
आचार्य जी ठीक ही कहते हैं कि प्रथम को प्रथम की जगह दो, सबकी अपनी जगह होती है
Anil prajapati
हमारा अपना कुछ नहीं है हम उदारी का जीते रहते हैं और उसी को अपना मान लेते हैं और उसी को सुरक्षित उसी को पहचान सब कुछ मान लेते हैं
हम यह भूल ही जाते कि हमारा क्या है
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Rima kumari
क्या सचमुच ऐसा ही होता है !!!!🥺🥺
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Akanksha Mishra
mujhe to ye dekh kar dar lg rha hai meri beti 7 sal ki hone vali h ab sb use bolte hai ki ear aur nose ki chhed karvane ko yhi hai ye lok fharm
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Komal
सामाजिक मा न्य ता बदल ति रेहती है
Pooja Prajapati
samaj me aise bhi parampraye h jo inshan ne hi banayi h or aise hi ajibo garib parmpraye chati aa rhi h
SURBHI KUNTAL
समाज ने दिया है
RICHA CHATURVEDI
बिना खुद को जाने, बिना आत्मबोध,आत्म-अवलोकन के कुछ भी करना अपने अज्ञान, अंधेरे और अहंकार को बढ़ाना है
Rabindra
The tongue-piercing tradition is a distinctive ritual associated with the Newar community of Bode, Madhyapur Thimi, Bhaktapur, Nepal.
Prahalad kumar
समाज में सुंदरता का पैमाना बदलते रहता है, वह सुंदरता भी बहारी होती है। समाज में सभी अंधानुकरण करते हैं। क्यों कर रहे हैं ऐसा पता नहीं,
वह सामने वाले को नक़ल कर रहे हैं, और सामने वाला उसका।
Sangita mote
1) * In the Mursi society, the lip plate is associated with beauty, maturity, and respect. For them, this is an integral part of their culture.
* In today's era, different societies have their own rules regarding fashion, makeup, tattoos, and fitness.
* Everywhere, humans are part of society in
some form or another and follow its rules.
* Whose choice is our choice❓️
i)The influence of society: The environment we grow up in begins to feel right and true to us.
ii)It is very difficult to see which of our decisions is truly our own and which one is influenced by society's way of thinking.
PRIYANKA KUMARI
मेरी एक फ्रेंड से बात हो रही थी, जिसकी हाल ही में शादी हुई है। उसने कहा कि शादी के बाद अपने ही शरीर पर भी स्वतंत्रता नहीं रह जाती—बिछिया, चूड़ियाँ, सिंदूर जैसी चीज़ें करनी ही पड़ती हैं, जबकि लड़कों के लिए ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं होती। मैंने कहा, जो करने को कहा जा रहा है, एक बार पूछिए कि इसके पीछे तर्क क्या है।
उसने कहा—“समाज और परिवार में रहना है तो करना ही पड़ेगा, यही हमारा culture है।”
तब याद आया, जैसा आचार्य जी हमेशा कहते हैं—महिलाओं ने इन परंपराओं और अपनी गुलामी को इतना आत्मसात कर लिया है कि अब उन्हें ये गुलामी नहीं, संस्कृति और परंपरा ही दिखाई देती है।
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VIJAY KUMAR PANDEY
समाज या समाज का एक वर्ग कब किस जीवन जीने की पद्धति स्वीकार कर ले या अस्वीकार करदे। किस को धर्म से जोड़ दे। जब की स्व का मूल्यांकन प्राकृतिक सापेक्ष हो कर जीना चाहिए।
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Riya Patel
कुछ महीने पहले मेरे भाई की शादी थी, मैंने मेकअप नहीँ किया, लिपस्टिक नहीं लगाया तो रिश्तेदारी में जो औरतें आयी थीं, मम्मी से कह रही थी कि आपकी ये वाली बेटी क्यों मनहूस की तरह है😂
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Reena Uikey
सब तरह से पहचान और पसंद समाज द्वारा ही निर्धारित होती है।
NAVEEN SAINI
I felt really uuh, when I saw that.
however you can do with yourself.
That's the thing , lokdharma is mixed in everything.
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Govind
बड़ी अजीब - अजीब परंपराएं हैं दुनिया में।
✍🏻 पोस्ट 2 | 12 सितम्बर '26 💭 विषय — लोकधर्म ───────── होंठ में इतनी बड़ी प्लेट क्यों…