
मेरी एक फ्रेंड से बात हो रही थी, जिसकी हाल ही में शादी हुई है। उसने कहा कि शादी के बाद अपने ही शरीर पर भी स्वतंत्रता नहीं रह जाती—बिछिया, चूड़ियाँ, सिंदूर जैसी चीज़ें करनी ही पड़ती हैं, जबकि लड़कों के लिए ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं होती। मैंने कहा, जो करने को कहा जा रहा है, एक बार पूछिए कि इसके पीछे तर्क क्या है। उसने कहा—“समाज और परिवार में रहना है तो करना ही पड़ेगा, यही हमारा culture है।” तब याद आया, जैसा आचार्य जी हमेशा कहते हैं—महिलाओं ने इन प…
















