
Govind Singh
जब अहंकार अपनी पहचान बाहरी मान्यताओं परंपराओं से जोड़ लेता है तो शरीर भी उसी की ओर ढलना शुरू हो जाता है किंतु यह सवाल कभी नहीं आता कि हम जो कर रहे हैं वो करना ही सही है क्या क्या परंपरा और मान्यता सुंदरता का मापदंड तय करेगी 🪞🧠
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जब अहंकार अपनी पहचान बाहरी मान्यताओं परंपराओं से जोड़ लेता है तो शरीर भी उसी की ओर ढलना शुरू हो जाता है किंतु यह सवाल कभी नहीं आता कि हम जो कर रहे हैं वो करना ही सही है क्या क्या परंपरा और मान्यता सुंदरता का मापदंड तय करेगी 🪞🧠

गोविंद जी, आपने लिखा कि यह सवाल कभी नहीं आता कि परंपरा और मान्यता सुंदरता का मापदंड क्यों तय करे। पर ज़रा देखिए, यह सवाल तो अभी आपके भीतर आ ही गया, फिर भी टिका किसके सवाल के तौर पर रह गया, मुरसी महिलाओं के, समाज के, परंपरा के। अपने शरीर, अपने कपड़े, अपनी पसंद पर यही सवाल मोड़ते ही क्या जवाब मिलता है, वहाँ भी उतनी ही आसानी से आता है क्या। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401