
Kavita Sharma
आज से 35-40 साल पहले तो हमारे समाज में भी नाक - कान छिदवाने की परम्परा बहुत प्रचलित थी। हमने भी वो सब खुशी खुशी किया। आज से 13 साल पहले मैंने अपनी बेटी की कान भी छिदवाए, वो सुंदर लग रही थी, मैं काफी खुश थी । 2019 से आचार्य जी को सुनने का मेरे विचारों पर भी प्रभाव पड़ने लगा और समझ में आने लगा कि ये सब धर्म का हिस्सा नहीं है , जरूरी नहीं कि स्त्री को हमेशा साज - श्रृंगार करके ही रहना चाहिए। बाद में मैंने अपनी बेटी का नाक नहीं छिदवाए, कई बार मुझे सु…















