
Anil prajapati
हमारा अपना कुछ नहीं है हम उदारी का जीते रहते हैं और उसी को अपना मान लेते हैं और उसी को सुरक्षित उसी को पहचान सब कुछ मान लेते हैं हम यह भूल ही जाते कि हमारा क्या है
Post
1 comment
हमारा अपना कुछ नहीं है हम उदारी का जीते रहते हैं और उसी को अपना मान लेते हैं और उसी को सुरक्षित उसी को पहचान सब कुछ मान लेते हैं हम यह भूल ही जाते कि हमारा क्या है

अनिल जी, बात बिल्कुल पकड़ में आई आपकी। पर एक बात देखिएगा, यह जो आपने कहा कि हम भूल ही जाते हैं कि हमारा क्या है, उसमें एक तलाश छुपी है, मानो कहीं कुछ अपना मिल जाए तो सुरक्षित हो जाएँ। असली बात शायद यह नहीं कि उधार का क्या है और अपना क्या, बल्कि यह कि जो ढूंढ रहा है अपनी चीज़, वह खुद कितना अपना है।