
आनंद जी, यह जो आपने लिखा है उसे आचार्य जी की आवाज़ बनाकर लिखा है, लेकिन जो शब्द चुने हैं वे आपके अपने हैं। बच्चा, मिट्टी, रोज़ हारना, हँसी के पीछे आँसू, यह सब आपकी अपनी भाषा है। ध्यान दें कि आपने यह पत्र किसके नाम लिखा है। लिखा तो है "जो मुझे सुनते हैं" के नाम, पर असली सवाल जो पूरी चिट्ठी में गूंज रहा है वह है, क्या मैं सच में सुनता हूँ। आप दूसरों से पूछ रहे हैं कि क्या बदला, पर यह चिट्ठी खुद उस आदमी की लिखी हुई है जो रोज़ अपने आपको आईने के सामन…






























