✍🏻 पोस्ट 5 | 2 अक्टूबर '26
💭 विषय — फ़िल्में/गीत/पुस्तकें/कला────────────
🎨 वसीली कैंडिंस्की: जब चित्र में कुछ दिखना ज़रूरी नहीं रहा
👁️ किसी चित्र को देखते ही हमारी नज़र अक्सर खोजने लगती है इसमें बना क्या है?
पहाड़ है, चेहरा है, पेड़ है या कोई घटना?
लेकिन अगर चित्र में पहचानने लायक कुछ हो ही नहीं, तब हम उसे कैसे देखेंगे?
🖌️ वसीली कैंडिंस्की की कला इसी जगह पर चित्रकला को एक अलग दिशा देती है।
उन्होंने रंग, रेखा और आकार को केवल बाहरी दु…
अंहकार पहले से तय चीजों में ही सुरक्षा महसूस करता है।
Sandeep Kushwaha
पहले से तय अर्थ को ही पहचान रहे हैं।
YOGESH
🎨 मेरे विचार
कैंडिंस्की की कला से मुझे यह समझ आया कि देखना और पहचानना एक ही बात नहीं है।
हम किसी व्यक्ति या चीज़ को देखते ही उसे कोई नाम दे देते हैं—अच्छा, बुरा, अपना, पराया, सुंदर या खराब। नाम मिलते ही हमें लगता है कि हमने उसे समझ लिया, जबकि शायद हमने वास्तव में उसे देखा ही नहीं।
कैंडिंस्की के अमूर्त चित्र हमें बिना किसी तय कहानी के रंग, रेखा और आकार को देखने के लिए मजबूर करते हैं।
मेरे लिए इसका जीवन से संबंध यह है कि अगर मैं अपनी पुरानी धारणाओं को थोड़ी देर के लिए अलग रख सकूँ, तो शायद मैं लोगों और परिस्थितियों को जैसे वे हैं, वैसे देखने के थोड़ा करीब आ सकूँ।
सवाल यह नहीं कि मैं क्या देख रहा हूँ,
सवाल यह है—क्या मैं सचमुच देख रहा हूँ, या अपनी बनाई हुई धारणा को ही देख रहा हूँ?
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Sanket Sudhakar Mahajan
हम किसी चीज को देखते हुए पहले से तय अर्थ को ही पहचान रहे हैं,नये अर्थ से देखने की दृष्टी अभी विकसित नही हो पायी |
Deepshikha Sharma
wow! क्या बात
is नज़रिये से कभी देखा ही नहीं.. हम वास्तव मैं हम hain कँहा? हमारा तो सब कुछ is दुनिया के आधार पर ही है ( नाम, पता, पहचान,) इन सब के आधार पर ही खड़े hain.
Aalka
phle se tay
Meenu
phle se tay arth ho phchante he
Rachna Verma
pahle se tay arth ko dekhte hai
Pooja Prajapati
jo pahale se tay h use hi mahatve de rhe h
Chandra Shekhar Nayak
संज्ञान लेना होता है अहंकार के साथ । सिर्फ दृष्टा नहीं होता ।
जैसे ही आम का पेड़ कहते हैं उस पेड़ को देखना बंद हो जाता है , हम अपनी स्मृति में उस पेड़ की छवि से संबंधित हो जाते हैं । ऐसा नहीं होता कि जैसे उस पेड़ को पहली बार समग्रता से देखें । नवीनता या मौलिकता में देखें ।
Reema
पहले से तय अर्थ को ही पहचान रहे हैं |
Rupesh Vasant Sarode
मैं पहिले से तय अर्थ खोजता हूं ।
Tanishq
Yes truly agree 🙏🏻
To understand this, it took me years and reason might be I was indulged in Lokdharma. As we tend to see things with recognised meanings and defind categories, and so I used to paint things with recognised meanings like in the picture i painted cow in 2024 before joining gita sessions, with sacred pop cultural meaning or pre conceived notion. It's nothing wrong in that but no substantial weight of 'art' present in it, i recieved appreciation on that piece but so what?!
I have to credit Acharya ji in improving my art practice, ofcourse not skill wise, but as the whole perspective gets rich and real intent comes for painting or creating anything rather than just as hobby, that hits different. i can sense that progress. 🪞
When art explain itself, it's illustration but if it let the viewers with questions it's art and it's default nature of art if it's ambiguous in that way. Like Kandinsky's art has that ambiguity and tension that can force us to come up with new perspective which is problematic for ego I guess?! 😂
Btw, the second painting in the image is recent one, I'm taking street cows series forward, possibly in a right direction.
Ranjana Gautam
नहीं पहले से तय अर्थ को पहचान रहे है
Shilpi kumar
नहीं हम किसी भी चीज को देखते कम है बस जो उसका पहले से अरथ होता है उसे ही देखते हैं
SHIV PRATAP SINGH
नहीं हम देख नहीं रहे होते है हम तो बस पहले तय अर्थ को पहचानने लग जाते है।
Pradeep Verma
"हम अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और परिस्थितियों को भी अक्सर पहले से दिए हुए नामों और धारणाओं के जरिए देखते हैं। नाम सामने आते ही देखना बंद, और पहचानना शुरू।"
यह बात अहंकार की वृत्ति को उजागर करती है। अहंकार लोगो पर, घटनाओं पर अपने अर्थ प्रक्षेपित करता है। "देखना"(Seeing) से अहंकार घबराता है।
क्योंकि उस प्रक्षेपित अर्थ से ही अहंकार का अस्तित्व बचा रहता है। इन पहचानों, कहानियों के माध्यम से ही तो अहंकार सघन होता रहता है और बचा रहता है।
Deepti Singh
Mostly we recognize, instead of seeing; and supeimpose meaning onto the object, image, situation etc.
It's rare that we can actually see, what's in front of our eyes.
Layers of conditioning, environment, and us all amalgamate while we see something, which doesn't let us see what the thing is actually.
Sangita mote
आधुनिक समय में किसी चीज़ को देखते समय हम अक्सर उसे सचमुच देखने के बजाय मस्तिष्क में पहले से तय अर्थ, लेबल और अनुभवों को ही पहचानते हैं।
Chandra Prakash kumar
pahle se Tay arth ko hi pahchan rahe hain
Poonam Kawre
पहले से तय अर्थ को ही पहचान रहे हैं।
Kamlesh Sharma
हम पहले से ही तय अर्थ को पहचानने लग जाते हैं! हम सचमुच किसी चीज़ को नही देखते , उसके मूल अर्थ को स्पष्ट रूप से नही देख पाते, क्योंकि अहंकार को पहले से बने बनाये रास्तों पर चलना आसान लगता है!
Shama Parween
We view things from the lens of our preconceived notions and interpret them accordingly. When the meaning is decided in advance, where is the true seeing?
Sarita
pahle se tay arth ko hi phchante h
Jyoti kumari
पहले से तय अर्थ को ही पहचान रहे हैं?
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Soni kumari
हां ये बात बिल्कुल सही है 🤔 कि हम पहले से मौजूद उनसभी चीज़ों को देखना चाहते हैं चाहे वह चित्र,समाज ,अपनी जिंदगी सब पहले से मौजूद हैं उसी की उम्मीद रहती हैं,शायद 🤔
जब भी मुझे ये महसूस होता हैं कि हा मैं सही दिशा में चल रही हूं अब जो चाहिए होगा,पर होता उल्टा है उस वक्त से सब विपरीत होने लगता है,ऐसा क्यों?
Shiv Shankar
मैने जब पहले वीडियो में दिखाए चित्र को देखा तो मेरे बुद्धि ने उसे मेरे मन में पहले से बने अन्य वस्तुओं के छवि से जोड़ा कि हो सकता है कि मैने पहले इन्हें देखा हूं।
लेकिन पहली ही बार में इसमें कुछ नया देखने के लिए मेरे बुद्धि ने नहीं विचार किया।
इससे यही पता चलता है कि हम कुछ नया देखने की कोशिश नहीं करते बस एक छवि खोजने का प्रयास करते हैं जो उससे मिलता जुलता हो ताकि उसे जानने में कोई संघर्ष न करना पड़े।
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Kamlesh Yadav
हम पहले तय पहचान को ही देखते है बिना पहचान के हम किसी भी तस्वीर को नहीं देखते