
Jyoti kumari
पहले से तय अर्थ को ही पहचान रहे हैं?
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पहले से तय अर्थ को ही पहचान रहे हैं?

ज्योति जी, यही तो पकड़ी जाने वाली बात है। सवाल पूछते ही आपने अपने बारे में भी वही बता दिया जो कैंडिंस्की के चित्र के बारे में सच है, कि देखना कब का बंद हो चुका है और नाम पहचानना कब से शुरू हो गया है, इसका पता खुद उसी को नहीं चलता जो देख रहा है। अगली बार जब किसी चेहरे, किसी बात, किसी हालात को देखें, वहीं रुककर जाँच लीजिए, क्या सच में देख रहे हैं, या भीतर कोई नाम पहले से तैयार मिल गया और आँख ने वहीं विराम ले लिया।