✍️ पोस्ट 14 | 12 अक्टूबर '26
💭 विषय — लोकधर्म
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🤔 दुनिया का अनोखा समारोह: सबसे मोटा पुरुष कौन?
🌍 क्या आप जानते हैं कि इथियोपिया के बोदी लोगों में वजन बढ़ाना धन-संपत्ति, ताकत और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है?
🎉 हर साल जून के आसपास, बोदी समुदाय काएल नामक एक पारंपरिक समारोह मनाता है, जो उनके नववर्ष का भी प्रतीक है। अलग-अलग कुलों के अविवाहित युवा पुरुष साल के सबसे मोटे पुरुष का खिताब जीतने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
❓ *यह कै…
मैं महाराष्ट्र में अभी रहती हूँ यहाँ बैलपोला नामक त्यौहार मनाया जाता हैं....
अपनी खेती, हल चलाने और बोआई के कामों में बैलों की कठिन मेहनत के प्रति अपना सम्मान और धन्यवाद प्रकट करते हैं।
इस दिन बैलों से खेतों में कोई काम नहीं कराया जाता है और उन्हें पूरी तरह आराम दिया जाता है ,और बैलों को नहलाया जाता है, उनकी तेल से मालिश की जाती है, सींगों को रंगा जाता है और उन्हें नई रस्सियों, घंटियों तथा सुंदर वस्त्रों से सजाया जाता है। इसके बाद उनकी विशेष पूजा और आरती की जाती है।
पर अगले ही दिन पुरुष शराब पीते हैं हर घर में मांस पकाया
जाता हैं, मैंने जब इसका कारण पूछा तो कोई भी कारण नहीं मिला बस ऐसे ही ....
ऐसा ही हमारे उत्तर प्रदेश में होली को लेकर किया जाता हैं...
Amanpreet Singh
people do lots of weird stuff with their bodies and minds to gain social acceptance.
I too think a part of reason I wear turban is because I don't have the socially accepted hair density, to just go out as is without turban/head covering etc.
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Aditya kumar pradhan
पापुआ न्यू गिनी का याम (Yam) उत्सव
अनोखी परंपरा: यहाँ याम (एक प्रकार का कंद-मूल) को केवल भोजन नहीं, बल्कि धन और सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाना माना जाता है। जिसके पास जितना बड़ा याम का भंडार होता है, समाज में उसे उतना ही प्रतिष्ठित, अमीर और शक्तिशाली माना जाता है।
हमारे समाज से तुलना: ठीक इसी तरह, हमारे आधुनिक समाज में भौतिक संपत्ति, जैसे कि आलीशान घर, बड़ी गाड़ियाँ या बैंक-बैलेंस को व्यक्ति की सफलता और प्रतिष्ठा का पैमाना मान लिया जाता है। हमें बोदी या याम की परंपरा अजीब लग सकती है, लेकिन भौतिक चीज़ों से अपनी अहमियत और पहचान जोड़ने की हमारी दौड़ भी उतनी ही गहरी होती है।
2. इंडोनेशिया के बाली में 'दांत घिसने की रस्म' (Matatah / Tooth Filing)
अनोखी परंपरा: बाली में जब किशोर वयस्क होते हैं, तो उनके सामने के नुकीले दांतों को थोड़ा रेता या घिसा जाता है। वहाँ की मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य के भीतर छिपे नकारात्मक गुण (जैसे क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और वासना) नियंत्रित हो जाते हैं और वह आध्यात्मिक रूप से एक शुद्ध और सभ्य इंसान बनता है।
हमारे समाज से तुलना: ठीक इसी तरह, हमारे आधुनिक समाज में किसी बड़े संस्थान से डिग्री लेना, कॉलर वाला टाई-सूट पहनना या कोई विशिष्ट पद पाना इस बात का प्रमाण मान लिया जाता है कि व्यक्ति अब "पूरी तरह सफल, सुसंस्कृत और योग्य" हो गया है—भले ही उसके भीतर का अहंकार या स्वार्थ अंदर से वैसा ही बना रहे।
kumari rani
मैं मुस्लिम में देखती हूं कि दाहा में लाठी और तलवार से टकराते हुए सैकड़ों की भीड़ के साथ मनाते हैं। और अपने ही शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं।
और कभी कभी बहुत बड़ा झगड़ा भी हो जाता है, इसलिए हमारे यहां त्योहार के दिन भी पुलिस रहती है।हम ऐसे हैं भगवान के उत्सव में भी लड़ लेते हैं।
Manas Kumar Das
सही बात।दूसरे को मजाक बनाते है।और खुद वो काम करता हु। उसमें खुद को जरासा शरम नहीं आता। मुझे एसब चीज से बचना होगा। यानी मान्यता से। थैंक
Anju Bajaj
हमारी पसंद हमारी नहीं है ।
समय स्थान समाज के अनुरूप ही है ।
KAMLESH VIJAY
मैं स्वयं इसी बीमारी से ग्रसित हूं
Sonam Kumari
💭 दुनिया भर की ऐसी कुछ और अजीब परंपराओं के उदाहरण दीजिए और उनकी तुलना हमारे आसपास की ऐसी प्रथाओं से कीजिए, जो देखने में उनसे मिलती-जुलती हैं, लेकिन हमें बेतुकी नहीं लगतीं।
दुनिया भर में कई ऐसी परंपराएं हैं जो पहली बार सुनने में बहुत अजीब या विचित्र लग सकती हैं, लेकिन जब हम अपने आस-पास की प्रथाओं पर गहराई से विचार करते हैं, तो हमें उनके बीच एक गहरी समानता दिखाई देती है। हम अपनी प्रथाओं के आदी हो चुके होते हैं, इसलिए वे हमें सामान्य लगती हैं, जबकि दूसरों की संस्कृति अजीब।
यहाँ दुनिया भर की कुछ अजीब परंपराओं और उनसे मिलती-जुलती हमारी जानी-पहचानी प्रथाओं की तुलना इस प्रकार है ।
1. दांतों से जुड़ी अनूठी प्रथाएं
• दुनिया की परंपरा (दांत काटना - बाली, इंडोनेशिया):
बाली में 'पोटोंग जीजी' (Potong Gigi) नाम की एक परंपरा है, जहाँ किशोरों के ऊपरी सामने के दांतों (विशेषकर नुकीले दांतों) को रगड़कर सपाट कर दिया जाता है। माना जाता है कि इससे गुस्सा, लालच और ईर्ष्या जैसी बुरी प्रवृत्तियां नियंत्रित होती हैं।
• हमारी मिलती-जुलती प्रथा (टूथ फेयरी / दांत को मिट्टी में दबाना): हमारे यहाँ जब बच्चों के दूध के दांत टूटते हैं, तो उन्हें चूहे के बिल में डालने, मिट्टी में दबाने या तकिये के नीचे रखने की प्रथा है ताकि "अच्छा और मजबूत नया दांत" आए। पश्चिमी देशों में 'टूथ फेयरी' (Tooth Fairy) दांत के बदले पैसे छोड़ जाती है।
• समानता: दोनों ही प्रथाएं जीवन के एक चरण से दूसरे चरण (बचपन से वयस्कता) में प्रवेश करने और शारीरिक बदलावों को एक संस्कार का रूप देने से जुड़ी हैं।
2. शिशुओं को ऊंचाई से गिराना बनाम हवा में उछालना
• दुनिया की परंपरा (बच्चे को गिराने की रस्म - सोलापुर, भारत / कुछ क्षेत्र):
भारत के कुछ हिस्सों (जैसे बाबा उमर दरगाह, महाराष्ट्र) में नवजात बच्चों को करीब 30-50 फीट की ऊंचाई से नीचे की ओर गिराया जाता है, और नीचे लोग चादर तानकर उन्हें सुरक्षित थाम लेते हैं। माना जाता है कि इससे बच्चा स्वस्थ और भाग्यशाली बनता है। (हालाँकि अब इस पर कानूनी रूप से रोक लगाई जा चुकी है)।
• हमारी मिलती-जुलती प्रथा (हवा में उछालकर दुलारना): लगभग हर घर में माता-पिता या बड़े बुजुर्ग छोटे बच्चों को हवा में ऊपर उछालते हैं और फिर पकड़ लेते हैं। बच्चा हंसता है और बड़े इसे प्यार जताने का तरीका मानते हैं।
• समानता: दोनों ही क्रियाओं के पीछे का मूल भाव बच्चे के प्रति सुरक्षा की भावना, उसका डर भगाना और उसके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करना है, भले ही एक तरीका अत्यधिक जोखिम भरा दिखता हो।
3.शवों के साथ समय बिताना
• दुनिया की परंपरा (मा'नेने - इंडोनेशिया): इंडोनेशिया के तोराजा (Toraja) समुदाय में हर कुछ सालों में पूर्वजों के शवों को कब्र से बाहर निकाला जाता है। उन्हें नए कपड़े पहनाए जाते हैं, सजाया जाता है और उनके साथ तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं। उनके लिए यह पूर्वजों के प्रति सम्मान दिखाने का तरीका है।
• हमारी मिलती-जुलती प्रथा (श्राद्ध / बरसी और तस्वीरें पूजना): हमारे घरों में दिवंगत पूर्वजों की तस्वीरों पर हार चढ़ाना, सुबह उठकर उन्हें प्रणाम करना और साल में एक बार 'श्राद्ध पक्ष' में उनके नाम पर खाना निकालना और कौवों/ब्राह्मणों को खिलाना बेहद सामान्य है।
• समानता: दोनों ही संस्कृतियों का मानना है कि मृत्यु के बाद भी हमारे अपनों का अस्तित्व खत्म नहीं होता। तोराजा लोग इसे शारीरिक रूप से करते हैं, जबकि हम इसे प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक रूप से करते हैं।
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Pankaj
Jo apni beti ki shaadi mein jyada Dahej deta hai use aur jo Apne bete ki shaadi mein jyada Dahej Lata hai use donon ko ya koi badi post per Ho
Bhanmati sahu
मुझ से तो अपने घर की परंपरा नहीं निभाई जाती हैं एक बार से दोबारा नहीं हो सकता हैं क्योंकि ग़लत हो रहा है एक ही बार में दिख जाता हैं।
मेरे घर वाले ही कहते है कोई नियम और परंपरा को मानती नहीं है बहुत सुनाते हैं मैं अनसुना कर के निकल जाती हूं जब उन लोग मेरा नहीं सुनते हैं।
Aalka
मंदीर मे छोटे बच्चे को उंचाई से फेंकना ओर निचे कपडे मे झेलना
Kirti Khosla
In Punjab when I was growing up I use to hear about someone who is overweight " khate peete ghar ka.. or someone belonging to prosperous house". So misleading.
Arjun Singh Sastya
Madhya Pradesh ke adivasi samudayo mai avam khaskar shadio mai, Jo vyakti jitni jyada Sharab pilaye avam jitne jyada Bakriyo ki bali dekar maans khilaye....use utna hi samraddha bataya jata hai. Irony yah bhi hai ki Shivji ke naam par ya Maa Kali ke naam par pashuo ki bali di jati hai, jabki ham bhagwan Shiv ko hi Pashupatinath ke roop mai poojte hai... jo sabki raksha krte hai.
Shivani Tripathi
exam pass करना एक laksya नहीं रह गया योग्यता साबित करना और समाज में pratistha का प्रमाण बन के रह गया है l
Kavita
आज पैसा ,बड़ी सरकारी नौकरी, विवाह में बहुत दहेज, बड़ा मकान , शाही शादियां समाज में इज्ज़त और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई है पर हमें नहीं लगती क्योंकि हम इनके आदी हो चुके है पे दूसरे समाज के रीति रिवाज़ हमे साफ़ तौर पर गलत और बेतुके दिख जाते है।
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Soni kumari
ye achha tha example jo sidhe sochne ko bajabur karta hai,sach main ye kitni ajeeb baat hai
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Raghvendra Vishwakarma
Mp में दूध खाने कों तों कहते हैं की ताकत मिलेगी और जब उनसे कहोगे की भारत बीफ ऐक्सप्रोट में कभी दुसरे कभी तीसरे नंबर पर हैं तों उहे यह चीज़ नोर्मल लगतीं हैं और उसपर यह लोग बात करना ही नहीं चाहतें
Biswaranjan Giri
इन जैसी प्रथाओं को मैं अहंकार को खुद को मोटा करना कहूँगा और वो बेवकूफ़ ये भी नहीं जानता कि मोटा होने से कोई काम ठीक से नहीं हो पाता।
मुझे याद है मेरे मम्मी पापा मुझे रोज़ 1लीटर फुल क्रीम वाला दूध पिलाते थे। एक ही बेटा हूँ न इसलिए। बहनो को एक एक कटोरी और मुझे एक बड़ा गिलास। वो तो उल्टी ही कर देती थी तो पिटाई और खाती थी पर मैं पी जाता था और मैं मोटा हो गया था और काम भी नहीं कर पाता था। अब मैं दूध नहीं पीता।
अब मैं फ़िर से पतला हो गया हूँ ,काम करने में तकलीफ़ होती है इसलिए।
Reeta Gautam
हमारे यहाँ अधिक पैसों व ऊँची तनख्वाह वाली नौकरी को सफलता का प्रतीक मानते हैं ।
गोरे रंग को सुन्दरता का प्रतीक मानना भी एक मान्यता है ।
Anuradha Varma
ऐसा बहुत ही बेतुके रीति रिवाज़ है जो हम खुद को नहीं देखते है पर किसी और ने नहीं किये हो तो दिखता है की उसने ऐसा नहीं किया है.
जैसे की एक तो ये हमारे खोखले समाज की रीत है की औरत की शादी के बाद साड़ी ही पाहेंगी चाहे उसमे कितना ही शरीर क्यों नहीं दिखता हो और अगर घर पर बहु के सर मे पल्ला ना हो तो बोलेंगे की बहु को लाज शर्म है ki नहीं फिर भले ही उसी घर के आदमी एक तौलिया लपेट कर पूरे घर मे घूम रहे हो
तो उनको वो नहीं दिखता अपना
Muskan Patel
She Is More Than Her Body: The Human Cost of Leblouh
Bala
मुझे तो हमारे समाज की हर चीज में यह बात दिखाई दे रही है शादियों में अधिक खर्च प्रतिष्ठा का प्रतिक, सरकारी नौकरी का भूत तो इतना सर चढ़ा है कि किसी व्यक्ति में और कुछ दिखाई ही नहीं देता।
Seema leena
Attaching self worth to flab or degrees ,mean the same!
Lovely Singh
भारत में शादियों में धन और दिखावे की प्रतिस्पर्धा
महँगे कपड़े, आभूषण, बड़ी दावत और भव्य सजावट को कई बार परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाता है। यह भी एक सामाजिक मानक है, जिसे हम अक्सर सामान्य मानकर स्वीकार कर लेते हैं।
Deepak Raj
इंडोनेशिया: किसी की मृत्यु पर उँगली काटने की प्रथा
पापुआ के दानी समुदाय में इकी पालेक नाम की प्रथा ऐतिहासिक रूप से शोक व्यक्त करने से जुड़ी रही है। उँगली का एक हिस्सा काटना मृत परिजन के प्रति दुख और लगाव का प्रतीक माना जाता था।
हमारे आसपास समान सोच: किसी परिजन की मृत्यु पर सिर मुंडवाना, विशेष वेश धारण करना या लंबे समय तक कुछ सामाजिक गतिविधियों से दूर रहना।
Prity
हमारी दृष्टि बाहर को देखने की इतनी आदि हो गई है कि अपनी खोट खुद ही नहीं देख पाती। जैसे खुद को देखते वक्त हाइपर्मेट्रॉपिया हो गया हो। सामने सबसे निकट की ही वस्तु नहीं दिखती। जब इस परंपरा के बारे में बात की जा रही थी तो मुझे लग रहा है कैसी अजीब परंपरा है। हमारे देश में तो नहीं है कुछ इतना अज़ीब। पर पोस्ट में अगली बात दुख गई। हमारी मान्यताएं हमें सामान्य और दूसरों की घोर असमान्य लगती है। वैसे ही बाहर लोगों की गलतियां तो दिख जाती है, पर अपनी ओर उंगली आते ही हम कहते है हम सबसे साफ है। हमपर कोई दाग नहीं है। बल्कि हमपर उंगली उठते ही हम अचकचा जाते है। ये क्या हो गया।
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✍️ पोस्ट 14 | 12 अक्टूबर '26 💭 विषय — लोकधर्म ────────── 🤔 दुनिया का अनोखा समारोह: सबसे…