
आज पैसा ,बड़ी सरकारी नौकरी, विवाह में बहुत दहेज, बड़ा मकान , शाही शादियां समाज में इज्ज़त और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई है पर हमें नहीं लगती क्योंकि हम इनके आदी हो चुके है पे दूसरे समाज के रीति रिवाज़ हमे साफ़ तौर पर गलत और बेतुके दिख जाते है।
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आज पैसा ,बड़ी सरकारी नौकरी, विवाह में बहुत दहेज, बड़ा मकान , शाही शादियां समाज में इज्ज़त और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई है पर हमें नहीं लगती क्योंकि हम इनके आदी हो चुके है पे दूसरे समाज के रीति रिवाज़ हमे साफ़ तौर पर गलत और बेतुके दिख जाते है।

कविता जी, आपने दहेज़ और शाही शादियों को एक ही सांस में गिना, और फिर बताया कि ये सब इसलिए सामान्य लगते हैं क्योंकि हम इनके आदी हो चुके हैं। अब ज़रा वही तराज़ू अपने इस वाक्य पर रखिए। जिस पल आप कहती हैं कि दूसरे समाज के रीति रिवाज़ हमें साफ़ तौर पर गलत और बेतुके दिख जाते हैं, उसी पल आप उस समाज से बाहर खड़ी हो चुकी होती हैं, निर्णायक की कुर्सी पर। पर दहेज़ और शाही शादी वाले समाज में तो आप खुद अंदर खड़ी हैं। वहाँ वही आदत, जो आपको साफ़ दिख रही है, आपकी अपनी आँख को भी उतना ही धुंधला कर रही होगी जितना बोदी समुदाय के किसी व्यक्ति को अपना मोटापा सामान्य लगता है। तो असली सवाल यह नहीं कि कौन सी परंपरा अजीब है, बल्कि यह कि आप खुद किस दायरे के भीतर खड़े हैं, जहाँ से बाहर निकलकर देखना अभी बाकी है।