
✍🏻 पोस्ट 28 | 23 सितंबर '26 💭 विषय — राज्यव्यवस्था और प्रशासन ───────── 🏛️ आपके शहर की नगरपालिका आखिर चलाता कौन है? 🛣️ सड़क टूटी हो, कचरा समय पर न उठे, पानी की समस्या हो या स्ट्रीट लाइट खराब हो, तो हम अक्सर कहते हैं, “नगरपालिका कुछ नहीं कर रही।” लेकिन नगरपालिका काम कैसे करती है? 🏢 नगरपालिका की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं होती। 🗳️ एक तरफ होते हैं चुने हुए प्रतिनिधि, जो स्थानीय जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। 👨🏻💼 दूसरी तरफ होता है प्रशासनिक तंत्र, जिसमें अलग-अलग नगर निकायों में मुख्य अधिकारी, नगर आयुक्त जैसे अधिकारी प्रशासनिक काम संभालते हैं। 🌆 नगर निकायों का काम केवल सड़क और कचरे तक सीमित नहीं है। पानी की आपूर्ति, स्वच्छता, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सड़कें, अग्निशमन, पर्यावरण, पार्क, स्ट्रीट लाइट और जन्म-मृत्यु पंजीकरण जैसे कई विषय नगरपालिकाओं से जुड़े हैं। 📌 संविधान की 12वीं अनुसूची में नगरपालिकाओं से जुड़े 18 विषयों का उल्लेख है। ⚖️ लेकिन अब सवाल प्रशासन से आगे जाता है। शहर की व्यवस्था बनाने में सिर्फ अधिकारी की भूमिका है? नहीं। 🗳️ प्रतिनिधि चुने जाते हैं। 📑 प्रशासन फैसलों और कानून के अनुसार काम करता है। 👥 और इन प्रतिनिधियों को चुनने वाला कौन है? 👉 नागरिक। यहीं से असली सवाल शुरू होता है। हम खराब सड़क देखकर पूछते हैं, “काम क्यों नहीं हुआ?” लेकिन उससे पहले यह देखना जरूरी है, ❓ जिसे मैंने चुना, उसे मैंने क्यों चुना? ❓ काम देखकर, या पहचान देखकर? ❓ तथ्य देखकर, या डर और लालच से? ❓ अपनी समझ से, या भीड़ के साथ? 🪞 क्योंकि व्यवस्था केवल ऊपर बैठे लोगों से नहीं बनती। चुनने वाला जैसा है, उसके चुनाव भी वैसे ही होंगे। और जब चुनाव बार-बार उसी दिशा में जाएंगे, तो व्यवस्था बदलने पर भी उसकी बुनियादी समस्या बनी रह सकती है। 💭 अहंकार की एक खासियत है कि वह अपनी परेशानी का कारण बाहर ढूंढता है। “नेता खराब है।” “अधिकारी खराब है।” “व्यवस्था खराब है।” लेकिन जिस “मैं” ने नेता को चुना, उसकी पसंद को सही माना और फिर उसी व्यवस्था से शिकायत की, वह खुद सवाल से बाहर क्यों रहे? 🪞 यहीं चुनाव का असली प्रश्न सामने आता है। चुनने वाला कौन है? वह अपनी पहचान से चुन रहा है? अपने डर से? अपने लाभ से? अपनी भीड़ से? या वास्तव में देख रहा है कि वह क्या चुन रहा है? क्योंकि अगर चुनने वाला ही अपनी पसंद को नहीं देखता, तो केवल चुने हुए को बदल देने से क्या बदलेगा? Q 1) जिस व्यवस्था की शिकायत मैं आज कर रहा हूं, उसमें मेरे अपने चुनाव की कितनी भूमिका है? Q 2) क्या मैंने सिर्फ उम्मीदवार चुना है, या अपनी पहचान, डर और लालच को भी वोट दिया है? 🪞 व्यवस्था को बदलने की बात करने से पहले, उस “मैं” को देखना पड़ेगा जो व्यवस्था को चुनता है। 🔗 स्रोत: भारत का संविधान, 12वीं अनुसूची https://www.legislative.gov.in/static/uploads/2025/08/7af1daa22d65f9d04c00ae9b9aa5a799.pdf वोटर और चुनाव में https://acharyaprashant.org/on-youtube/275001df8














































