
जब मै ,18 कि हुई थी तब मैने भी सरपंच और जनपद के लिए मतदान किया था उस समय मेरी मानसिकता ये थी कि अब मैं भी वोट दे सकती हूं और ये मेरा अधिकार है , किंतु मुझे उतना ज्ञान नहीं इन सब चीजों का और न ये मालूम था कि वोट किसे दूं मैने बस बेहोशी में मतदान किया था , चुनाव के कुछ समय पहले सभी प्रत्याशी अपने अपने मुद्दे लेकर खड़े होते है कि ये बदलाव करा देंगे वो बदलाव करा देंगे आप हमें वोट दे , बस उस समय के लिए तत्पश्चात जितने के बाद कुछ समय अच्छा बनने के लिए कुछ परिवर्तन ला भी देंगे पर उसके बाद जैसा का तैसा , हमारे यहां तो चुनाव से पहले पैसे दे देते है या महिलाओं को साड़ी ओर पुरुषों को शराब और फिर उनके वोट बिक गए , ऐसे में कोई सवाल नहीं करता न खुद से न दूसरों से , और फिर बाद में व्यवस्था या प्रशासन को जिम्मेदार ठहराते है , वो ये नहीं स्वीकारता कि इसका कारण भी वे ही है क्योंकि चुनाव करने वाला वह खुद है ,जो जैसा होगा वो वैसे व्यक्ति को ही चुनेगा ,जब व्यक्ति के केंद्र में सही ज्ञान नहीं कि उसे चुनना किसे है तो ये उम्मीद करना कि सामने वाला सब सही करेगा ये कैसी बात हुई। आचार्य जी का आभार व्यक्त करती हूं कि मैं इस विषय पर अच्छे से सोच पाई 🙏


















