
Q 1) जिस व्यवस्था की शिकायत मैं आज कर रहा हूं, उसमें मेरे अपने चुनाव की कितनी भूमिका है? मैंने ये काम नहीं किया शिकायत की ना नगर निगम में ना नगर पालिका में मैने तो vote भी नोटा को दिया था प्रधान मंत्री के चुनाव में, हाँ गांव का हुआ था तो एक पहचान वाले को दिया था पर मैंने उससे बोला नहीं कभी हं मदद ही की समुद्दाय के महिला की उसको शिकायत रहती थी की वो पैसा टाइम पर और मूल्य नहीं देते... Q 2) क्या मैंने सिर्फ उम्मीदवार चुना है, या अपनी पहचान, डर और लालच को भी वोट दिया है? 🪞 व्यवस्था को बदलने की बात करने से पहले, उस “मैं” को देखना पड़ेगा जो व्यवस्था को चुनता है। ये तो सही बात हैं छेत्र या कसबो की बात करें तो लोगो ने लालच में ही वोट दिया था फिर गांव के प्रधान से काम नहीं हो रहा शिकायत करते थे वो भी वो लोग जो गरीब तबके के होते थे... फर्क ये था जो जानकार था युवा वो अपनी समझदारी से काम करा भी लेता था प्राधान उससे लगते नहीं थे पर 80% ऐसे ही लोग थे जिनको सिर्फ ओट देने से मतलब था... कोई अपने गांव के प्रति जागरूक नहीं था जो इस विभाग में था वो सिर्फ अपना पहले देखता था... और ये वृति अब तो घर घर में दिखती हैं लोग सामने वाले को अपने से या तो कम देखते हैं या ज़्यदा सुखी...


















