
✍🏻 पोस्ट 1 | 24 सितंबर '26 💭 विषय — इंडियन करंट अफेयर्स ────────── 🚻 स्कूल में पढ़ने वाले 5 करोड़ बच्चों के पास आज भी स्वच्छता की सुविधा नहीं! 📋 WHO और UNICEF की नई रिपोर्ट ‘प्रोग्रेस ऑन ड्रिंकिंग वॉटर, सैनिटेशन एंड हाइजीन इन स्कूल्स 2015-2025’ भारत की एक बड़ी चुनौती सामने रखती है। 📊 भारत की स्थिति, 2025 🔹 करीब 5 करोड़ भारतीय बच्चों के स्कूल में स्वच्छता सेवा उपलब्ध नहीं थी। 🔹 दुनिया में ऐसे बच्चों की कुल संख्या 24.4 करोड़ थी, यानी हर 5 में से लगभग 1 बच्चा भारत से था। 🔹 2 करोड़ भारतीय बच्चों के स्कूल में बुनियादी स्वच्छता सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी। 🔹 करीब 1.2 करोड़ भारतीय बच्चों के स्कूल में बुनियादी पेयजल सुविधा नहीं थी। 💧 भारत की जल-गुणवत्ता को लेकर नीति आयोग के कंपोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स में भारत को 122 देशों में 120वें स्थान पर रखा गया था। 📊 रिपोर्ट में लगभग 70% जल स्रोतों के प्रदूषित होने का अनुमान और करीब 60 करोड़ लोगों के उच्च या अत्यधिक जल-संकट से प्रभावित होने की बात कही गई थी। 🌍 येल एनवायरमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स 2024 में भारत 180 देशों में 176वें स्थान पर था। सैनिटेशन एंड ड्रिंकिंग वॉटर में भारत 143वें, अनसेफ ड्रिंकिंग वॉटर में 144वें और वॉटर रिसोर्सेज में 104वें स्थान पर था। 🏫 स्कूल की इमारत बनती है, कक्षा बनती है, पाठ्यक्रम लिखा जाता है, और शौचालय की जगह एक खाली आँकड़ा रह जाता है। यह चूक नहीं, उस व्यवस्था की बनावट है जो तय करती है कि क्या दिखाने लायक है। शिक्षा हमने उसे मान लिया है जो रिपोर्ट कार्ड में दर्ज हो: 📑 अंक, उपस्थिति, नामांकन। जो प्रमाणपत्र पर नहीं छपता, बच्चे का शरीर, उसकी गरिमा, उसकी बुनियादी ज़रूरत, वह सूची में नीचे खिसकता जाता है। पाँच करोड़ बच्चे इसी खिसकने की क़ीमत चुका रहे हैं। 🪞 व्यवस्था ने एक पहचान ओढ़ रखी है: "हम शिक्षा देने वाला देश हैं।" यह "मैं X हूँ" का ही ढाँचा है, राष्ट्र के स्तर पर। पहचान को तस्वीर चाहिए, शौचालय नहीं। इसलिए नई इमारत, उद्घाटन और लक्ष्य दिखते हैं, और 176वें या 120वें स्थान जैसे सूचकांक पहचान पर चोट करते हैं, 🧠 अब इसे अपने भीतर रखकर देखिए, क्योंकि यही ढाँचा आपके भीतर भी चलता है। आप भी वही मापते हैं जो दिखाया जा सके: पद, आय, घर, बच्चों के अंक। थकान, बेचैनी, रिश्तों की सड़न, ये "बाद में देखेंगे" में चले जाते हैं। बच्चे के लिए आपने सबसे अच्छा स्कूल ढूँढा होगा, 👀 पर क्या उसका शौचालय देखा? और अगर पहली प्रतिक्रिया "सरकार क्या कर रही है" थी, तो देखिए कि यह सवाल आपको कितनी सुविधा से बाहर खड़ा कर देता है। आप गवाह बन जाते हैं, और यह गवाह होना भी एक पहचान है: "मैं संवेदनशील हूँ, मैंने ख़बर पढ़ी।" 📌 स्रोत: 🔗 The hindu https://www.thehindu.com/news/national/five-crore-indian-children-still-lack-access-to-sanitation-service-in-their-schools-says-un-report/article71498219.ece
















































