कुर्बानी है छोड़ने पाने का व्यापार,छोड़ा कम पाया ज़्यादा और पाया अहंकार || आचार्य प्रशांत (2015)
आचार्य प्रशांत
समस्या न व्यक्ति न वस्तु न घटना, समस्या है मन की मूल संरचना || आचार्य प्रशांत (2016)
दुःख सोचो तो दुःख, सुख सोचो तो भी दुःख, और आनंद सोचा नहीं जा सकता || आचार्य प्रशांत (2016)
न ज्ञान माँगो न विद्या, गुरु से लो गुरु की गुरुता || आचार्य प्रशांत (2015)
जो वचन आपसे न आए, वही मीठा है || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2016)
जो बढ़े-घटे, आकर्षित करे, वो प्रेम नहीं || आचार्य प्रशांत (2016)
न दृष्टा न सृष्टा न स्वास्थ्य न व्याधि, समाधि की इच्छा का लोप ही है समाधि || आचार्य प्रशांत (2016)
जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय ||आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2015)
कैसे जानूँ कि मेरा धर्म क्या है? || आचार्य प्रशांत (2015)
ज्ञानी और अज्ञानी के बीच अंतर || आचार्य प्रशांत (2015)
निकटवर्ती को ही हाथ बढ़ा कर सहारा दिया जा सकता है || आचार्य प्रशांत (2015)
दो ध्रुवों के मध्य भटकता रहता है मन || आचार्य प्रशांत (2015)
कर्मयोग क्या है? || आचार्य प्रशांत (2015)
दुख वस्तु के होने में नहीं,वस्तु के अज्ञान में है || आचार्य प्रशांत (2015)
डराने वाले को छोड़े बिना डर कैसे छोड़ोगे? || आचार्य प्रशांत (2015)
क्या हैं विचार? झूठी रिक्तता का झूठा उपचार || आचार्य प्रशांत (2015)
अपूर्ण पूर्ण के रूप में भी अपनी अपूर्णताओं को ही चाहेगा || आचार्य प्रशांत (2015)
बदलाव से ही डरता है ये निरंतर बदलता मन || आचार्य प्रशांत (2015)
क्यों ज़रुरी है कि संसार का काम चलता रहे? || आचार्य प्रशांत (2015)
कभी रंग कभी धूप कभी धूमिल मैदान है,बदलते मौसमों में भी आसमान तो आसमान है || आचार्य प्रशांत (2015)
मन जब आत्मा में दृढ नहीं होता तब वो अपनी ही बनाई दुनिया में भटकता है || आचार्य प्रशांत (2015)
यदि उसे नहीं चाहता तुम्हारा प्रेमी, तो तुम्हें कैसे चाहेगा? || आचार्य प्रशांत (2015)
न कैद की कसक, न मुक्ति की ठसक || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
अप्प दीपो भव, अहम् ब्रह्मास्मि इत्यादि क्या तुम्हारे लिये हैं? || आचार्य प्रशांत (2013)
विद्रोह के लिए सामर्थ्य की प्रतीक्षा मत करो, विद्रोह से ही सामर्थ्य आता है || आचार्य प्रशांत (2013)
ख्याल को तथ्य मत समझ लेना || आचार्य प्रशांत (2013)
मन के बहकाव का क्या करें? || आचार्य प्रशांत (2013)
ग्रन्थों के साथ सत्संग हो सकता है, तर्क या बहस नहीं || आचार्य प्रशांत (2015)
माँ-बाप तुम्हारी ही तरह आम हैं, उनसे विशिष्टता की उम्मीद अन्याय है || आचार्य प्रशांत (2013)
अनकहे को सुना तो अज्ञेय को जाना || आचार्य प्रशांत, गुरु नानक पर (2015)