
दुर्गासप्तशती सार” असल में उन लोगों के लिए ज्यादा उपयोगी लगती है जो पूरे ग्रंथ में जाने से पहले उसका सार समझना चाहते हैं। किताब का फोकस सीधे-सीधे कथा बताने पर नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे प्रतीकों और अर्थ को समझाने पर है। यह अच्छी बात है, क्योंकि इससे यह सिर्फ धार्मिक पाठ न रहकर एक समझने वाली चीज़ बन जाती है। हालांकि, क्योंकि यह “सार” है, तो कुछ जगहों पर गहराई थोड़ी सीमित महसूस होती है। अगर कोई बहुत...

एक बेहतरीन सार पुस्तिका जो आचार्य जी के द्वारा दुर्गासप्तशती पर दिए गए व्याख्यान को संक्षिप्त परन्तु सार गर्भित तरीके से प्रस्तुत करती है। हम प्रकृति को समझते नहीं, हम माँ दुर्गा और उनके सभी रूपों का अपनी स्वार्थपूर्ण मान्यताओं के अनुसार कुछ भी अर्थ निकालकर उनको पूजने लगते हैं। परन्तु उसमें हम अपनी सच्ची श्रद्धा को कहीं पीछे छोड़कर झूठी आस्था को अपना केंद्र बना बैठते हैं। आचार्य जी ने मेरी समझ को ब...

After reading this book you will understand the real meaning of devi puja. Why devi killed the demons.. the nature is only for use not for indulgence and luxury. Demos are present today in different forms .. big industrialist(involve in nature destruction), corrupt people, rapist, …

I understand the relation between Ego and nature. Prayer means don't blame nature for your failure.Instea introspect yourself . This is called self knowledge in Vedanta and it is Prayer to Devi .

पुस्तक में देवी के विभिन्न स्वरूपों की चर्चा है जो प्रकृति के विभिन्न रूप हैं। जिस प्रकार दानव प्रकृति को केवल भोग की नजर देखते हैं उसी प्रकार आम इंसान हैं । प्रकृति को हमें भोगना नहीं है बस दूर से निहारना है। हमारे पहाड़ ' नदियाँ जंगल आदि सब नष्ट होने के कगार पर है जिसका एक प्रमुख कारण दानवों जैसी भोगवादी संस्कृति ।

मेरे लिए ये पुस्तक बहुत ही लाभदायक रही है,पहले प्रकृति को भोग कर खुश होता था कि आज तो पार्टी करनी है लेकिन जब से इसके समीप आया तब से सोचने का पूरा नजरिया ही बदल गया|आप लोगों से भी अनुरोध है कि संपूर्ण दुर्गा सप्तशती नहीं पढ़ सकते हैं तो फिर ये वाली जरूर पढ़ें🙏🙏

इस किताब में दुर्गासप्तशती का सार दिया गया है | जो मैने पढ़ा बहुत कुछ सीखने को मिला | दुर्गासप्तशती का मूल संदेश यह हैं की प्रकृति को इस्तमाल अपनी कामना पुरी करने के लिए करोगे तो प्रकृति तुम्हें छोड़ेंगी नहीं| प्रकृति ही बंधन हैं प्रकृति ही मुक्ति हैं इसको जान जाओगे तो मुक्त हों जाओगे नहीं जानोगे तो बंधन से मुक्त नहीं हों पाओगे| ✔️

आचार्य जी ने बहुत ही खूबसूरत तरीके से इस ग्रंथ के प्रतीकों को बताया है, देवता कौन है, असुर कौन है, देवी कौन है सबसे अच्छी बात है कि आचार्य जी ने व्यवहारिक तल पर बात किए हैं कि कैसे देवता और असुर कोई पौराणिक पात्र भर नहीं है बल्कि हमारी मानसिक स्थिति से सरोकार है और कैसे हमारा प्रकृति के साथ गलत रिश्ता बहुत सी बीमारियों को जन्म दे देता है

इस किताब को पढ़कर पता लगा कि नवरात्रा कितनी ऊंची और गहरी बात है। हम न जाने किन ऊपरी और मनोरंजक बातों को लेकर बैठ गए हैं। दुर्गा सप्तशती के तीनों चरित्रों में ये ही पता लगता है कि जैसे ये आज की ही बात है और वो सारे राक्षस अभी हमारे सामने ही मौजूद हैं। प्रकृति ही देवी है उसको भोग की नजर से देखने पर प्रकृति ही माया बन जाती है।

इस पुस्तक को पढ़ने से पहले मैं प्रकृति और अपने देह को बिल्कुल ही अलग समझता था और एक अलगाव की भावना रहती थी लेकिन अभी इस पुस्तक को पढ़ने के बाद कहीं ना कहीं एक भोग वृत्ति कम हुई अब जितनी बार पढ़ता हू उतनी बार स्वम के भीतर जा कर अपना अवलोकन कर पाता हू।