
इस पुस्तक को पढ़ने से पहले मैं प्रकृति और अपने देह को बिल्कुल ही अलग समझता था और एक अलगाव की भावना रहती थी लेकिन अभी इस पुस्तक को पढ़ने के बाद कहीं ना कहीं एक भोग वृत्ति कम हुई अब जितनी बार पढ़ता हू उतनी बार स्वम के भीतर जा कर अपना अवलोकन कर पाता हू।