
एक बेहतरीन सार पुस्तिका जो आचार्य जी के द्वारा दुर्गासप्तशती पर दिए गए व्याख्यान को संक्षिप्त परन्तु सार गर्भित तरीके से प्रस्तुत करती है। हम प्रकृति को समझते नहीं, हम माँ दुर्गा और उनके सभी रूपों का अपनी स्वार्थपूर्ण मान्यताओं के अनुसार कुछ भी अर्थ निकालकर उनको पूजने लगते हैं। परन्तु उसमें हम अपनी सच्ची श्रद्धा को कहीं पीछे छोड़कर झूठी आस्था को अपना केंद्र बना बैठते हैं। आचार्य जी ने मेरी समझ को ब...