✍🏻 पोस्ट 10 | 26 सितम्बर '26
💭 विषय — मनोविज्ञान────────────
🧠 कॉग्निटिव डिसोनेंस को महाभारत के दुर्योधन से समझिए
महाभारत में दुर्योधन सिर्फ एक राजकुमार नहीं था। वह हस्तिनापुर के सिंहासन का दावेदार था। उसने भी वही राजकीय शिक्षा, शस्त्रविद्या और नीति की बातें सीखी थीं, जो एक राजकुमार से अपेक्षित थीं।
लेकिन उसकी समस्या यह नहीं थी कि उसे कुछ पता ही नहीं था।
👑 उसके सामने राज्य, सत्ता, पांडवों के साथ संघर्ष और अपने अधिकार की भावना लगातार…
Learning:
- Story: I am very poor when it comes to studying. My to-do remains unchecked always. I overplan, and do nothing. And then feel guilty. I take more time to complete studying something. As my environment is not good in terms of peace. Hence I have to put extra energy to understand something.
- What I am hiding in this story? The habit and identity of being comfortable to the current level.
PUJA KUMARI
🪔
Minakshi singh
This is so true. Whenever something happens which I didn’t like it it’s not the way I wanted the outcome, it’s so easily put it on others without even knowing what I was doing. But i shall learn from it and always keep now mirror in front of me. Thank you 🙏
Preeti
hnji asa hmesha hi hota hai mere sath to .... jo mere liye sahi hai vo muje pta hai phir bhi apne liye sahi nhi kr pati or hmesa sochti hu aage se dhyan rkhungi ...but nhi ho pata phir
Shivam
अब तो थोड़ी सी काम हो गई है पर पूरी तरीके से नहीं पहले मेरे अंदर एक आदत थी मुझे लगता था कि अगर मैं कोई भी दहलीज पर करूंगा तो उसे टाइम पर मेरे दिमाग में जो भी इमेज होगी उसकी हैबिट्स मेरे अंदर आ जाएंगे और उसी के जैसा मेरे दिमाग का स्ट्रक्चर बन जाएगा यह बड़ी अजीब सी आदत थी
पर मुझे नहीं बताइए कहां से आई शायद साइकोलॉजी में इसको ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर बोलते हैं मैं बहुत ही करता था और मंदिर के सामने से जैसे गुजारा तो कोई विचार आ गया तो फिर मुझे डर लगता था मुझे पता था कि ऐसा कुछ नहीं होगा मैं एक बार बोल दिया मन में तो उल्टे-फटे थॉट्स आते हैं लाइक फैलियर किया फिर कुछ भी लेकिन मुझे लगता था कि भगवान सुन के कहीं मेरा बुरा ना हो जाए तो मैं फिर दूसरे थॉट्स लाइक करता था कि
एक थॉट बड़ा आया तो 10 बार में अच्छा थॉट लॉन्ग जबरदस्ती इस चक्कर में मेरे दिमाग का दही हो जाता था पूरे दिन में यही करता रहता था अभी भी कभी एक बार करता हूं लेकिन अब पहले से काफी कम है शायद यह अहंकार का डर ही था मैं जानता सब था कि ऐसा कुछ नहीं होता है यह तो बिल्कुल तर्कहीन बात है लेकिन मैं तब भी इसको मन करता था यह कॉग्निटिव डिसोनेंस ही है
अब मुझे लगता है कि हमारा मन तो जैसे हम होते हैं अहंकार जैसा होता है डरा हुआ मन में वैसे ही ख्याल आते हैं डर के फैलियर की आवश्यकता है फैलियर का है ना और हम जिससे अपनी इमेज को एसोसिएट करते हैं फिर हम उसको बचा कर रखना चाहते हैं तो यह दर वहीं से आया है अब मुझे देखा है तो थोड़ी सी पकड़ ढीली पड़ी है लेकिन अभी संघर्ष जा रही है यह सच नहीं है मुझे पता है लेकिन मैं तब भी फस जाता हूं इसमें यह कॉग्निटिव डिसोनेंस ही है
1
Neha kumari
sahi baat h main khud jab exam me ache no laati toh aisa maane lagti ki mujhe sab ata h jab marks nhi ate toh koi na koi bahana bana kar khud ki justify kar leti ki aisa hua isliye yeh ho gya
1
Kalpna ahirwar
बिल्कुल सही बात है हम सब के अंदर भी एक ऐसा ही दुर्योधन बैठा है जो गलती करके भी उसे सही साबित करने के लिए अनेक तर्क ढूढ़ लेता है
Amriita Bokil
👌👌
Sakshata Yadav
💯
मदन प्रजापत
बिल्कुल सही हम अनेकों बार अपने आप को सही ठहराने के अलग-अलग तर्को की खोज करते हैं ताकि हम अपने आप को सही साबित कर पाए।
Simmi singh
जब हम कुछ गलत करते हैं या बोलते हैं तो हम देखते नहीं।
कि हमने क्या बोला जब कोई दूसरा हमें उसका एहसास कराता है तो। अंकल सफाई देने लगता है कि मैं सही हूं।
अपनी गलती स्वीकारता नहीं उसकी आम को चोट लगती है गलती स्वीकारने में
1
Anju Bajaj
हम दूसरों को बहुत जल्दी गलत बोल देते है पर वह गलत हमारे अंदर विद्यमान है उसे नहीं देखते
1
Dharmesh
जो जान रहे हो,उसे जियो!
Umesh
मुझे भी कभी कभी ऐसा महसूस होता है की मैं जो values follow करने की कोशिश कर रहा हूँ उनसे ही विरोध में चल रहा हूँ। जैसे की मैं अपने साथी को आज़ाद देखना चाहता हूँ और उसकी बाते भी करता हूँ, पर कभी कोशिश नहीं करता, ये बात मुझे चुभती है ।
1
Priya Sanjay Jha
बिल्कुल !
मैं यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु जोड़ना चाहूँगी। हम अक्सर स्वयं को ईमानदार कहते हैं, परंतु क्या विपरीत परिस्थितियों में बोला गया झूठ भी गलत की श्रेणी में आएगा? जैसा कि चाणक्य नीति में भी उल्लेखित है—वह असत्य, असत्य नहीं कहलाता जिसका आश्रय किसी सही बात या किसी की भलाई के लिए लिया गया हो।
उदाहरण के लिए, यदि कोई सज्जन व्यक्ति अपराधियों से अपनी जान बचाने के लिए कहीं छिपा हो, और वे अपराधी हमसे आकर उसका पता पूछें, तो निश्चित ही वहाँ 'सत्य' बोलकर किसी की जान संकट में डालना धर्म नहीं होगा।
इसी प्रकार, यदि कोई बाहरी या अपरिचित व्यक्ति हमसे हमारे घर-परिवार की गोपनीय जानकारी (Details) मांगता है, तो वहाँ अपनी निजता (Privacy) की रक्षा के लिए सच न बताना या बात को टाल देना पूरी तरह न्यायसंगत है। इसे हम नैतिक रूप से गलत नहीं कह सकते।
या फिर मान लीजिए किसी व्यक्ति का एक्सीडेंट हुआ है या उसे कोई गंभीर बीमारी (जैसे कैंसर) है और उसकी हालत बहुत नाज़ुक है। डॉक्टर मरीज़ का हौसला बनाए रखने के लिए उससे झूठ बोलता है कि "आप बिल्कुल ठीक हैं, आपको कुछ नहीं हुआ। अगर डॉक्टर वहाँ मरीज़ को कड़वा सच बता दे, तो मरीज़ गहरे सदमे या डर से अपनी जान भी गंवा सकता है। यहाँ डॉक्टर की 'बेईमानी' वास्तव में एक जीवन रक्षक दवा का काम करती है।
इसी प्रकार, यदि घर में दो भाइयों या सास-बहू के बीच अनबन है। एक व्यक्ति दोनों तरफ की कड़वी बातों को छुपाकर दोनों से कहता है कि "वह तो पीठ पीछे भी तुम्हारी तारीफ कर रहे थे।" इस छोटे से झूठ से दोनों के रिश्ते सुधर जाते हैं और घर टूटने से बच जाता है। जहाँ सच किसी का दिल तोड़ दे या घर बर्बाद कर दे, वहाँ रिश्तों को जोड़ने वाला मीठा झूठ किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
एक अन्य परिस्थिति पर विचार करें—यदि कोई व्यक्ति संसाधनों या धन के अभाव के कारण पूरा दिन भूखा रहा हो, तो वह किसी ऐसे दुर्जन व्यक्ति को यह बात कभी नहीं बताना चाहेगा जो उसकी मजबूरी का पूरे समाज में उपहास उड़ाए। अपनी परिस्थिति को छुपाना आत्मसम्मान की रक्षा है, कोई अपराध नहीं।
क्या स्वाभिमानी होना अहंकार है ?
Reeta Gautam
सही बात है ।
Sandhya Verma
जानकारी लाभप्रद है
Narendra Bisht
इस प्रकार का अनुभव मैं वर्तमान में स्वयं कर पा रहा हूँ।
इस कारण भीतर जो द्वंद्व उठता है, उसे अब देख पा रहा हूँ और समझ पा रहा हूँ कि मेरा अहंकार कहाँ अपनी पुरानी मान्यताओं को बचाने की कोशिश करता है।
Neerja Gupta
लाभ दायक जानकारी । अपने निजी संबंधों में महसूस किया है कि अपने ही तर्कों से अपनी ही छवि को बचाने की कोशिश कैसे की जाती है । cognitive Dissonance
किसे कहते है आज अच्छे से समझ आया ।कि हमारी मान्यताएं, मूल्यों,और व्यवहार में
असंगति होती है तो मन में एक तरह का मानसिक तनाव पैदा होता है ।
1
Neha
यदि नीयत नहीं है, तो वहीं हम दुर्योधन बन जाते हैं।
Kanika Aggarwal
That is why when it comes to the real issues of life, morality fails.
Morality is when the right thing is merely an imposed principle from the outside , not understood, not seen with correct intent.
Hence, what you know is right is simply a surface-level concept and what is going deep within is a lot of struggle and suffering.
The reaction brought out by suffering will always trump morality.
Chhotu Kumar jha
बात स्पष्ट है, ईमानदार नियत की बहुत जरूरत है। 🙏🙏🙏🙏🙏
Rajat Sharma
ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे अनकहे अनुभवों को शब्द दे दिए हों — इस पोस्ट को पढ़ कर में खुद को पूरी तरह देखपा रहा हूं।
Pankaj Kumar
किसके बीच सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक अंतर है।
“अहंकार कहता है—मैं गलत कैसे हो सकता हूँ?
आत्म-जागरूकता पूछती है—अगर मैं गलत हूँ, तो मैं खुद को कैसे सुधार सकता हूँ?”
यह किसी एक वैज्ञानिक का एकमात्र सिद्धांत नहीं है।
उनसे मिलने वाली मुख्य सीख:
जब हमारे विचार और हमारे काम में विरोध होता है, तो हमें केवल बहाने खोजने के बजाय अपने व्यवहार को ईमानदारी से जाँचना चाहिए।
6. जीवन में इसे कैसे अपनाएँ?
जब भी गलती हो, तुरंत खुद से तीन प्रश्न पूछें:
“क्या इसमें मेरी भी गलती है?”
“मैं अपनी गलती को सही साबित करने के लिए कौन-सा बहाना बना रहा हूँ?”
“अगली बार मैं क्या अलग कर सकता हूँ?”
यही आदत धीरे-धीरे आत्म-जागरूकता और आत्म-सुधार विकसित करती है।
Saraswati Saraswati
जब भी हम कुछ गलत कर रहे होते हैं, या सोच रहे होते हैं तो उस समय हम स्वयं को देखते नहीं है । फिर बाद में उसी को सोच कर पछतावा करते है ।
अब यही पर देखना है कि जब हम गलत कर रहे होते हैं तो रुक कर उसी समय देखे । ना कि बाद में ।
1
Sonam
🙏🙏
Ira kumari
हम भी ese krte hai 🥹🥹🥹.
Ab se Esa nhi krenge.
hum khud se promise krte hai.
1
Soni Kumari
sach me hum agayan ke yajha se hum ankhar ko bachane ke leya har parasite me khane bana he late ha😔
Sangeeta Sharma
समाज सारी गलतियां हम समाज की वजह से करते हैं वहां हमें सही दिखाना अपने स्टेटस को बचाना और सारी गलतियों को छुपाते हुए हम जैसा समाज चाहता है वैसा करते हैं
Vikas
मेरे साथ भी ऐसा ही होता है। आचार्य जी जैसे मिरर से मैं जुड़ा हुआ हूं। जो बहुत सारी बातें मैं मानता हूं और करता हूं, वह आचार्य जी की शिक्षाओं से विरुद्ध है। तो मन में भयंकर घर्षण और युद्ध चलता है और कभी कबार में इतना तनाव में आ जाता हूं कि खुद को कह बैठता हूं कि इससे अच्छा आचार्य जी को छोड़ देते हैं😂, लेकिन फिर समझ में आता है कि मैं अपनी कहानी, छवि के माध्यम से खुद को बचा रहा हूं। उदाहरण के लिए - दूध में हिंसा है, दिख भी रही है, फिर भी सुख -सुविधा और जीभ के स्वाद के लिए दूध या दूध से बनी चीजों का सेवन कर रहा हूं। 😡