
Anju Bajaj
हम दूसरों को बहुत जल्दी गलत बोल देते है पर वह गलत हमारे अंदर विद्यमान है उसे नहीं देखते
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हम दूसरों को बहुत जल्दी गलत बोल देते है पर वह गलत हमारे अंदर विद्यमान है उसे नहीं देखते

अंजू जी, आपने जो लिखा उसे एक बार फिर पढ़िए, वाक्य दूसरों से शुरू होकर अपने अंदर पर आकर रुक गया है। पर ठहरिए वहीं, दिशा मोड़ना और भीतर झाँकना, ये दो अलग काम हैं। दुर्योधन को पहचान लेना एक बात है, अपने आज के किसी फैसले को, किसी सफ़ाई को नाम देकर देखना दूसरी बात। वो कौन सी घटना है जिसमें आपने किसी को गलत कहा और वही गलती अपने भीतर टाल गईं?