
Simmi singh
जब हम कुछ गलत करते हैं या बोलते हैं तो हम देखते नहीं। कि हमने क्या बोला जब कोई दूसरा हमें उसका एहसास कराता है तो। अंकल सफाई देने लगता है कि मैं सही हूं। अपनी गलती स्वीकारता नहीं उसकी आम को चोट लगती है गलती स्वीकारने में
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जब हम कुछ गलत करते हैं या बोलते हैं तो हम देखते नहीं। कि हमने क्या बोला जब कोई दूसरा हमें उसका एहसास कराता है तो। अंकल सफाई देने लगता है कि मैं सही हूं। अपनी गलती स्वीकारता नहीं उसकी आम को चोट लगती है गलती स्वीकारने में

सिम्मी जी, आपने खुद ही लिख दिया, सफाई देने लगता है, गलती स्वीकारता नहीं। मज़े की बात ये है कि ये पूरा किस्सा आपने किसी और के बारे में कहा, अंकल के बारे में। ज़रा देखिए, क्या यही सफाई अपनी किसी गलती पर आती है तो पहचान में आती है, या वहाँ भी पहले तर्क आता है और स्वीकार बाद में, अगर आता भी है तो?