✍🏻 पोस्ट 01 | 22 सितंबर '26💭 विषय — इंडियन करंट अफेयर्स─────────छात्र आत्महत्याएँ: क्या हमने सफलता को जीवन की कीमत बना दिया?
18 सितंबर को IIT बॉम्बे के 20 वर्षीय छात्र की आत्महत्या के बाद संस्थान में विरोध-प्रदर्शन हुए। घटना से जुड़े तथ्य अभी जाँच के अधीन हैं। छात्रों ने स्वतंत्र जाँच, बेहतर छात्र-कल्याण और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसी माँगें भी उठाईं।
लेकिन यह सिर्फ़ IIT की कहानी नहीं है।
*📊 NCRB के 2024 के आँकड़ों के अनुसार, भा…
Logo ko shaflta pahalibar mehi chahiye or jab nahimilti to dbav bnate he bolege esanhikiya
uko samjo thoda time do
Soni Kumari
hm ankhar ke jal me itna fas jate ha ke kise ke jendege ankhar ke age choti lagne lajte ha😔
S
Shabnam Khatoon
mai khud depression me thi but ab samjh aaya ki safalta hi jivan nahi hai tension lene se kuchh hasil nahi hota hai jivan ik baar milta hai isko achhe se jina hai or santi se rhana hai khusi se apne jivan ko baytit karna hai
himanshi prajapati
hum bhi to saflata ko hi mahatw dete h ......jeewan me ye sabhi ek padaw hote h lekin ye apne bachho ko nahi samjhate h ....ya shayad hum bhi nahi samjhte
1
Saroj
यह हमारी कमी है। हमने उन्हें बताया ही कब कि जीवन कितना अनमोल है?
1
Govind
समाज ने सफलता को बहुत महत्व दिया है जिसके कारण जीवन से ज्यादा सफलता की कीमत ज्यादा हो जाती है और फिर लोग डिप्रेशन में रहते है आत्महत्या करते है।
Yasoda
—बच्चों को जीना पहले सिखाना है।
—मातापिता भी बच्चों से प्यार करें, न उनके उपलब्धियों(achievements) से। सफलता-असफलता, मान-अपमान दोनों ज़िंदगी का हिस्सा है।
—परीक्षा में मोबाइल लेकर जाना ग़लत बात है। यह बाक़ी ईमानदार बच्चों के प्रति नाइन्साफ़ी है। प्रोफेसर की ज़िम्मेदारी है copying को रोकना। उनको suspend करना सही बात नहीं है। यह ग़लत श्रृंखला शुरू करती है।
—सत्य के साथ रहें।
—अगर मैं ने ग़लत समझ लिया तो माफ कीजिए।
🙏
Mukesh
यह मान लेना कि
१- स्थिति का परिणाम जो उत्कृष्टता, सफलता रूप में परिभाषित होकर अन्य लोगों द्वारा स्वीकृत भी हो
२-प्राप्त समाज शिक्षाओं में उक्त स्थिति न होने/ छिन जाने का भय उत्पन्न होने पर ही पर पलायन या जीवन समाप्ति ही एकमात्र अंतिम और सही रास्ता /तरीका होना सीखा जा चुका हो
तथा
३-ना तो परिवार और ना शिक्षा की वर्तमान व्यवस्था में इन परिस्थितियों को जानना/ समझने को सही प्रकार से सिखलाना।
४-जीवन की महत्वता वर्तमान व्यवस्था में सफलता रूपी भोग के आगे शून्य मान / कर दिया जाना।
इसलिए लेख में वर्णित लक्षण /परिणाम ही सर्वत्र उपस्थित हो रहे हैं।
Kaveri
We build our identity around success—marks, college, jobs, and achievements. Society considers these as parameters to define our worth.
So, when this very identity is lost, it feels like an existential threat, and escaping can feel better than continuing to live within such a society.
Nitin Sharma
आत्महत्या नहीं आत्मज्ञान
Swapnil pendhari
we need take a philosophy in the first place
Suman Mishra
इस पोस्ट को पढ़ते हुए मुझे अपने व्यवहार का एक हिस्सा भी दिखाई दिया।
करीब दो साल पहले, जब मेरी बेटी पाँचवीं कक्षा में थी, वह पास तो हो गई थी, लेकिन उसके 78% अंक आए थे। मैं उससे नाराज़ हो गई थी। वह रोई भी थी। उसकी मैडम को जब इस बारे में पता चला तो उन्हें भी काफी धक्का लगा, क्योंकि शायद उन्हें उम्मीद थी कि वह इससे अधिक अंक लाएगी।
लेकिन सच यह है कि मेरी बेटी ने कभी मुझसे यह वादा नहीं किया था कि वह बहुत अच्छे अंक लाएगी। वह अपनी तरफ से पढ़ रही थी, मेहनत कर रही थी और अपनी पढ़ाई समझने की कोशिश कर रही थी। फिर मेरे लिए उसके अंक इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए थे?
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि कहीं न कहीं मैं अपने परिवार और समाज के सामने यह दिखाना चाहती थी कि मेरी बेटी के अच्छे प्रतिशत आए हैं। शायद मैं यह देखने से ज्यादा कि उसने कितना समझा और कितना सीखा, इस बात को महत्व दे रही थी कि उसके कितने अंक आए।
यानी वहाँ मेरी बेटी की पढ़ाई से ज्यादा मेरा अपना अहं और सामाजिक छवि महत्वपूर्ण हो गई थी।
आज मैं इस बात को समझने की कोशिश कर रही हूँ और अपने व्यवहार में बदलाव ला रही हूँ। अब मैं यह देखने की कोशिश करती हूँ कि मेरी बेटी अपनी कक्षा का पाठ समझ पा रही है या नहीं। जब वह समझेगी, तो वह अपने उत्तर भी बेहतर तरीके से लिख पाएगी और परीक्षा में अच्छे अंक भी ला सकती है।
अच्छे अंक आएँ तो अच्छी बात है, लेकिन उन्हें जीवन का सबसे बड़ा पैमाना नहीं बना देना चाहिए। कोई बच्चा पूरे साल मेहनत करे और परीक्षा के समय उसकी तबीयत खराब हो जाए, किसी कारण से उसका प्रदर्शन अच्छा न हो पाए—तो क्या उसके ऊपर दबाव बनाना सही होगा? नहीं।
अंक मेहनत का एक परिणाम हो सकते हैं, लेकिन वे बच्चे के जीवन की कीमत तय नहीं कर सकते।
और शायद यही बात इस पोस्ट के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से से जुड़ती है—हम कई बार किसी एक समस्या को ही पूरा जीवन बना लेते हैं। यह केवल विद्यार्थियों के साथ नहीं होता, हमारे अपने जीवन में भी होता है। कोई असफलता, कोई संबंध, कोई आर्थिक समस्या, कोई डर या कोई परिस्थिति हमारे सामने आती है और हम उसे इतना बड़ा बना लेते हैं कि बाकी पूरा जीवन दिखाई देना ही बंद हो जाता है।
अगर हमारे पास सही समझ और विवेक नहीं है, तो समस्या और जीवन के बीच का अंतर मिटने लगता है।
इसीलिए मेरे लिए आत्मज्ञान और अध्यात्म का महत्व यहाँ समझ में आता है। जीवन से बड़ा कोई अंक, परीक्षा, नौकरी, असफलता या परिस्थिति नहीं हो सकती। समस्या को समस्या की तरह देखना और उसे पूरा जीवन न बना लेना—यह समझ विकसित करना जरूरी है।
मेरे अपने जीवन में भी यह समझ धीरे-धीरे बनी है। गीता और आचार्य जी के साथ जुड़ने के बाद मैंने पहली बार अपने ही व्यवहार को इस तरह देखना शुरू किया कि मैं अपने बच्चों से क्या चाहती हूँ और क्यों चाहती हूँ।
अब कोशिश यही है कि बच्चों को केवल सफल बनाना नहीं, बल्कि उन्हें जीवन को समझने वाला और विवेक के साथ जीने वाला इंसान बनने में सहयोग देना है।
क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि बच्चे कितने अंक ला रहे हैं।
सवाल यह भी है कि क्या हम उन्हें यह समझ दे रहे हैं कि किसी एक परिणाम से बड़ा उनका पूरा जीवन है।
Suryansh Priyadarshi
सफलता असफलता जीवन का एक अंग है l जीवन में बहुत से मार्ग है जिनसे आगे सफल हुआ जा सकता है अगर हमें सफलता नहीं मिलती है तो उसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें
Shivani patidar
🔸Mene bhi ek saal entrace exam ki preparation ki thi ,qualify nhi hua phir mene try nhi Kiya phir se aur mujhe bhi vahi sb return m mila jo ye samaj k pass h -compare krna, aur direct rishte ke kr aa jaate h ye to aage koyi professional course to kr nhi rahi ye normal padayi hi kr rahi h
lekin ye sab past ka h ab mujhe samjh aagya h ki "khud ko dusro ki najr se nhi dekhna h hme pahle apna mulyaankan svayam Krna h"
RICHA CHATURVEDI
Ye Jane ki m kon hu or muje ye jeevan kese jeena h?
self Knowledge hi jaruri h.
Vikash kumar
सभी समस्या के समाधान है आत्मज्ञान,
TUSHAR UPADHYAY
i agree, mai bhi job, package, rank,bodycount, turnover aur profit ko hi apni life samjahta hun.
respect kitnj miki, kitne log jante hai, ye sab mai apne worth se attached kiya hai.. tabhi dukha hai,
likes kitne, views kitne, subscribers kitne, ye sab
1
Tara Shukla
छात्र आत्महत्याएँ
सफलता: असफलता: जीवन की क़ीमत
मेरी समझ से छात्रों में बढ़ती हुई आत्म-
हत्या की प्रवृत्ति के लिए बहुत से कारण हैं।
इसके लिए हमारी पारिवारिक, सामाजिक,
आर्थिक परिस्थितियाँ और शिक्षा- प्रणाली
तथा शासन तंत्र भी जिम्मेदार है।
बचपन से ही बालक पर अधिक अंक
लाने का दबाव, अन्य छात्रों से तुलना, मित्रों
और माहौल का प्रभाव, शिक्षकों और शिक्षिकाओं का व्यवहार, नौकरी पाने के लिए ही शिक्षा, असफल होने पर निराशा, ताने एवं
उपेक्षा का भाव इन सब कारणों से छात्र कुंठित
होकर अवसाद में चले जाते हैं। उन्हें जीवन
निरर्थक लगता है और तब वे आत्महत्या जैसा
कठोर निर्णय लेते हैं।
जीवन प्रकृति प्रदत्त अनुपम उपहार है।
सफलता अथवा असफलता जीवन से सर्वोपरि
नहीं है। अत :असफल होने पर हमें अपने
जीवन को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए। सफलता के लिए पुनः प्रयत्न करना चाहिए।
धन्यवाद🙏
Kiran yadav
सफलता का अर्थ बस नौकरी पा लेना, अच्छे पद और ढेर सारे पैसा कमाना बन कर रह गया हैं। यदि ऐसा नहीं कर पाते है तो बोला जाता है— इतना पढ़ाई किए , इसका क्या फायदा हुआ। इससे छात्र तनाव में पढ़ाई करते है, और असफल होने से उसे जिंदगी ही नीरस लगने लगती हैं।
"गलती अहंकार की हैं, और सजा शरीर को मिलती हैं।"
Nikita Chaturvedi
आज ऐसी परिस्थिति आ चुकी है कि सफलता ही सब कुछ है।
1
Alok Kumar
Thankyou Vidya-Avidya for sharing this post 🪔
Saurabh
परिवार, समाज परिणाम और भोग करना सिखाया है। इसके आगे भी कुछ हो सकता है, वो नहीं सिखाया है।
न आत्मज्ञान, न आन्नद।
क्योंकि वेदांत (उपनिषद) के पास नहीं ले गये,
अपने झूठे स्वार्थ के चलते।
Dhananjay
जब भी हम अपने जीवन में असफल हो रहे हो तो उस समय विचार करे कि जो हम कर रहे थे क्या यह हमारे लिए सही भी था, और यदि ये सही है तो इसमें जी जन लगा देना बेहतर होता है इसका यह मतलब नहीं कि मर मिटने को तैयार हो जाओ, यदि हम कोई भी कार्य सत्य निष्ठा तरीके से करते हैं तो वह कार्य अवश्य ही सफल होता है
Dhanjeet Kumar
सच कहा जाए तो आज हमारा समाज जिस दिशा में जा चुका है, उस पर कुछ कहते नहीं बनता। सदियों से ऐसी व्यवस्था बन चुकी है कि हमारे आसपास जहाँ भी देखो, बस 'सफलता और असफलता' की ही दौड़ दिखाई देती है। बचपन से ही माता-पिता और समाज के माध्यम से हमें यही पारंपरिक ज्ञान मिलता रहा है।"
"लेकिन आचार्य जी, आज आपके द्वारा दिए गए ज्ञान ने मेरी आँखें खोल दी हैं। आपके मार्गदर्शन से अब समझ आया है कि हमें अंधी सफलता के पीछे भागने के बजाय उस 'सफलता' को चुनना चाहिए जो वास्तव में हमें एक बेहतर इंसान और जीवन में सफल बनाए। इस वैचारिक बदलाव और अमूल्य ज्ञान के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, आचार्य जी!
Raj kumar
समाज ने हमें सिखा दिया है कि जो सफल है, वही जीने लायक है; और जो असफल है, उसका जीवन जैसे कोई मूल्य नहीं रखता।
इसीलिए हम सफल होने की दौड़ में इतना उलझ जाते हैं कि सफलता बढ़ती जाती है, लेकिन जीवन छोटा होता जाता है।
Ritisha Namdev
जीवन में असफलता को कठिनाई और दुख मान लेते है । सफलता को ही सुख से जोड़ देते है ।
Saylee Ghatole
since childhood we are taught ache marks Lao nahi toh tumhare friends tumpar hasege.80 percentage nikalo .these all things create a environment of competition and jealousy and when we fail to achieve we are guilty.continous pressure is not good .we choose career which gives us good salary and fame but no one is bothered what the students what to select as there career. If one dislikes the career which is imposed on him by parents it will sure bring depression and pressure on student and hence they have last option suicide as they are hurt and not given sufficient space .
Jay Prakash Mehta
There is only one solution to all the problems of life is seeing one self that is self knowledge.
Birendra Kumar Singh
कहीं न कहीं हमारा सामाजिक तानाबना, इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है .अर्थ प्रधान ही जब जीवन का मूल लक्ष्य हो जाता है तो फ़िर इसप्रकार की घटनाओ की संभावना जयादा बनाती है। इसीलिये अभिभावको को अपने बच्चों में शुरू से अच्छा परवरिश अच्छी किताबें, को पढ़ने की ओर लगना चाहिए .
✍🏻 पोस्ट 01 | 22 सितंबर '26 💭 विषय — इंडियन करंट अफेयर्स ───────── छात्र आत्महत्याएँ:…