कल वेदांत संहिता सत्र में आचार्य जी ने कहा: ये मत पूछिए कि शास्त्रों में क्या लिखा है, ये पूछिए कि शास्त्र मुझसे मेरे बारे में क्या कह रहे हैं। शास्त्र आईना हैं। उनका काम है आपको आपकी ओर लौटाना, क्योंकि हमारी आदत बाहर भागने की है, इस उम्मीद में कि तृप्ति कहीं और मिल जाएगी।
इसीलिए शास्त्र एक ही बात बार-बार कहते हैं। उनके पास कहने को कम नहीं है, हम भूलते बहुत हैं। ऋषियों ने सत्य की ओर इशारा करने के लिए अनेक शब्द कहे, पर ये शब्द बड़ी सावधानी से चु…
1. Find 50 words used in Vedanta to point towards Truth. Then see how many of them are positive (Via Positiva). 🔍
The following terms are used in Vedanta as pointers towards Truth or the Highest:
Via Positiva (+): 🌿
1. ब्रह्म (Brahman) — Absolute Reality
2. आत्मन् (Atman) — Self
3. सत् (Sat) — Being / Reality
4. सत्यम् (Satyam) — Truth / Reality
5. ज्ञानम् (Jnanam) — Knowledge / Consciousness
6. प्रज्ञानम् (Prajnanam) — Pure Consciousness
7. चैतन्यम् (Chaitanyam) — Consciousness / Awareness
8. आनन्द (Ananda) — Bliss
9. पूर्णम् (Purnam) — Fullness / Completeness
10. शान्तम् (Shantam) — Peace
11. शिवम् (Shivam) — Auspicious / Benevolent
12. ज्योतिः (Jyotih) — Light
13. स्वयंज्योतिः (Svayamjyotih) — Self-luminous
14. साक्षी (Sakshi) — Witness
15. कूटस्थ (Kutastha) — Immutable substratum
16. भूमन् (Bhuman) — Infinite fullness / Vastness
17. तुरीय (Turiya) — The Fourth; beyond the three states
18. पुरुष (Purusha) — Supreme / Inner Person
19. ईश (Isha) — Lord / Supreme Principle
20. अन्तर्यामिन् (Antaryamin) — Inner Controller
21. ॐ (Om) — Sacred designation of Brahman
22. एकम् (Ekam) — One
23. ध्रुवम् (Dhruvam) — Constant / Stable
24. सर्वगतम् (Sarvagatam) — All-pervading
Via Negativa (−): 🕊️
25. अद्वैतम् (Advaitam) — Not-two / Non-dual
26. अनन्तम् (Anantam) — Without end / Infinite
27. अक्षरम् (Aksharam) — Imperishable
28. अज (Aja) — Unborn
29. अमृतम् (Amritam) — Deathless / Immortal
30. अव्ययम् (Avyayam) — Undecaying / Inexhaustible
31. अव्यक्तम् (Avyaktam) — Unmanifest
32. अचिन्त्यम् (Achintyam) — Unthinkable / Inconceivable
33. अनिर्देश्यम् (Anirdeshyam) — Indefinable
34. अदृष्टम् (Adrishtam) — Unseen
35. अव्यवहार्यम् (Avyavaharyam) — Beyond empirical dealings
36. अग्राह्यम् (Agrahyam) — Ungraspable
37. अलक्षणम् (Alakshanam) — Without defining characteristics
38. अव्यपदेश्यम् (Avyapadeshyam) — Indescribable
39. अशब्दम् (Ashabdam) — Soundless / Beyond sound
40. अस्पर्शम् (Asparsham) — Touchless / Beyond contact
41. अरूपम् (Arupam) — Formless
42. अरसम् (Arasam) — Tasteless / Beyond taste
43. अगन्धम् (Agandham) — Odourless / Beyond smell
44. अनादि (Anadi) — Beginningless
45. अनन्तरम् (Anantaram) — Without an interior
46. अबाह्यम् (Abahyam) — Without an exterior
47. अचलम् (Achalam) — Unmoving
48. अमात्र (Amatra) — Measureless / Without measure
49. प्रपञ्चोपशमम् (Prapanchopashamam) — Cessation of phenomenal multiplicity
50. नेति नेति (Neti-Neti) — Not this, not this
📊 Result:Via Positiva: 24/50 = 48%Via Negativa: 26/50 = 52%
So, even in this selection, Vedanta points towards Truth slightly more through negation—what Truth is not—than through positive description. 🙏
2. When you speak of Truth or of the Highest in your life, is your language one of negation, or of positivity? Why do you think it is so? 🌱
As far as I am concerned, when I speak of the Highest in life, I think in terms of चेतना (consciousness)—taking consciousness to its highest possible level. Therefore, my language is predominantly Via Positiva. For me, it appears to be about reaching greater awareness, understanding and clarity. 🧠✨
I think this way because even negation requires awareness. To say, “I am not this,” I must first know both the ‘I’ and the ‘this’. The clearer my awareness and understanding are, the more readily I can see and negate my false identifications.
Therefore, I feel that when consciousness is at its highest possible level, “नेति नेति (Neti-Neti)—not this, not this” becomes clearer and easier. Thus, although my language for the Highest is primarily positive, I see heightened consciousness as what enables deeper and more effective negation. 🙏
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Chanchal Thakur
🪔बोध कार्य🪔
1. वेदांत में सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द
🍁सकारात्मक
✳️ब्रह्म, आत्मा, सत्, चित्, आनंद, सच्चिदानंद, चैतन्य, प्रज्ञान, साक्षी, आत्मस्वरूप, परमात्मा, परब्रह्म, पुरुष, पुरुषोत्तम, अक्षर, अव्यय, अमृत, अभय, शान्ति, पूर्ण, अनंत, अद्वैत, कैवल्य, मोक्ष, मुक्ति, तुरीय, कूटस्थ, स्वप्रकाश, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, असंग, निर्गुण, निराकार।
🍁नकारात्मक
🔴नेति
🔴नेति-नेति
🔴 न इति
🔴अशब्द
🔴अस्पर्श
🔴अरूप
🔴अव्यवहार्य
🔴अचिन्त्य
🔴अलक्षण
🔴अदृश्य
🔴 अग्राह्य
🔴अकर्ता
🔴 अभोक्ता
🔴असंग।
2. मेरी भाषा नकार की है या सकारात्मकता की?
🙋♀️जब मैं जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ, तो मेरी भाषा अक्सर सकारात्मक होती है। मैं सत्य को शांति, आनंद, पूर्णता या मुक्ति जैसी किसी प्राप्त करने योग्य अवस्था के रूप में सोचने लगती हूँ। शायद इसका कारण यह है कि अहंकार किसी चीज़ को पाने की आदत में है।
लेकिन इस लेख से मुझे समझ आया कि सत्य को कोई वस्तु मानकर पाने की कोशिश करना भी अहंकार की एक चाल हो सकता है।
इसलिए 'मैं क्या बनूँ?' से अधिक महत्वपूर्ण है—'मुझमें क्या झूठ है जिसे मैं छोड़ सकती हूँ?'
🎯यही नेति-नेति की दिशा है।
सत्य को पकड़ना नहीं, बल्कि उन झूठी पहचानों, धारणाओं और सहारों को देखना और छोड़ना, जिनसे मैं अपनी पहचान बनाए बैठी हूँ।
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Kalpana
1. वेदान्त में सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द और उनमें कितने सकारात्मक हैं?
वेदान्त में सत्य की ओर संकेत करने के लिए अलग-अलग शब्दों का प्रयोग हुआ है। लेकिन इन शब्दों को किसी वस्तु, अवस्था या उपलब्धि की तरह पकड़ना ही मूल भूल हो सकती है।
कल के सत्र में
“One is not an object. One is an absence of the subject.”
पर ज़ोर दिया गया है।
कुछ प्रमुख शब्द:
1. ब्रह्म — सकारात्मक
2. आत्मन् — सकारात्मक
3. सत्य — सकारात्मक
4. चैतन्य — सकारात्मक
5. सत् — सकारात्मक
6. ज्ञान — सकारात्मक
7. आनन्द — सकारात्मक
8. पूर्ण — सकारात्मक
9. एकम् — सकारात्मक
10. अद्वैत — नकारात्मक
11. अखण्ड — नकारात्मक
12. निर्गुण — नकारात्मक
13. निराकार — नकारात्मक
14. निरुपाधिक — नकारात्मक
15. निरंजन — नकारात्मक
16. निर्विकार — नकारात्मक
17. निरपेक्ष — नकारात्मक
18. निर्लेप — नकारात्मक
19. निःसंग — नकारात्मक
20. निःस्पृह — नकारात्मक
21. अकर्ता — नकारात्मक
22. अभोक्ता — नकारात्मक
23. अजात — नकारात्मक
24. अचल — नकारात्मक
25. अव्यय — नकारात्मक
26. अविनाशी — नकारात्मक
27. अनन्त — नकारात्मक
28. अज — नकारात्मक
29. अव्यक्त — नकारात्मक
30. असीम — नकारात्मक
31. असंग — नकारात्मक
32. असंहत — नकारात्मक
33. अमृत — सकारात्मक
34. तुरीय — सकारात्मक
35. कैवल्य — सकारात्मक
36. स्वप्रकाश — सकारात्मक
37. कूटस्थ — सकारात्मक
38. साक्षी — सकारात्मक
39. शुद्ध — सकारात्मक
40. बुद्ध — सकारात्मक
41. मुक्त — सकारात्मक
42. शांत — सकारात्मक
43. परम — सकारात्मक
44. निरंतर — नकारात्मक
45. नेति-नेति — नकारात्मक
46. व्योमातीत — नकारात्मक
47. विषयातीत — नकारात्मक
48. अहंता-रहित — नकारात्मक
49. द्वैत-रहित — नकारात्मक
50. उपाधि-रहित — नकारात्मक
इनमें से लगभग 20–22 शब्द सकारात्मक भाषा में हैं, जबकि लगभग 28–30 शब्द नकारात्मक या निषेध की भाषा में हैं। यह संख्या इस बात पर भी निर्भर करेगी कि हम किसी शब्द को किस संदर्भ में वर्गीकृत करते हैं।
लेकिन असली बात गिनती से आगे है। “एकम्”, “ब्रह्म”, “आनन्द” जैसे सकारात्मक शब्द भी अहंकार के लिए नई वस्तु बन सकते हैं। इसके विपरीत “अद्वैत”, “निर्गुण”, “निराकार”, “नेति-नेति”, “विषयातीत” जैसी भाषा पकड़ को काटती है।
इसलिए वेदान्त की भाषा को केवल यह देखकर नहीं समझना चाहिए कि वह क्या बताती है, बल्कि यह देखकर भी समझना चाहिए कि वह अहंकार से क्या छुड़ाती है।
2. जब मैं जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करता हूँ, तो मेरी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? क्यों?
मेरे अनुसार नकार की भाषा अधिक उपयोगी है।
क्योंकि सकारात्मक भाषा बहुत आसानी से अहंकार के लिए एक नया लक्ष्य बना देती है।
अगर मैं कहूँ, “सत्य आनन्द है”, तो मैं तुरंत कल्पना करने लग सकती हूँ कि सत्य कोई विशेष अवस्था होगी, जिसे मुझे प्राप्त करना है। “एक” कहने पर भी मैं उसे किसी वस्तु की तरह अपने सामने रख सकती हूँ। तब “मैं” और “वह एक” दो हो जाते हैं।
कल के सत्र में,
“One is not an object. One is an absence of the subject.”
इसलिए “नेति-नेति” मेरे लिए अधिक उपयोगी है। यह मुझे कोई नई वस्तु या उपलब्धि नहीं देता, बल्कि पूछता है कि जिसे मैं अभी तक पकड़े बैठी हूँ, क्या वह वास्तव में वही है?
🪞 शास्त्र का उद्देश्य मेरे लिए सत्य की कोई तस्वीर बनाना नहीं, बल्कि मुझे अपनी ही पहचान, धारणाओं, डर, इच्छाओं और पकड़ को देखने के लिए लौटाना है।
इसलिए नकार की भाषा अहंकार को नई चीज़ देने के बजाय उसकी पुरानी पकड़ को हटाती है।सकारात्मक भाषा कह सकती है, “कुछ है जिसे पाना है।”नकार पूछता है, “जिसे तुम पकड़े हुए हो, क्या वह वास्तव में वही है?”इसी अर्थ में “नेति-नेति” केवल दो शब्द नहीं, बल्कि स्वयं को देखने की एक विधि बन जाता है।
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Prasenjeet
1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने वाले 50 शब्द
आत्मा, ब्रह्म, सत्य, चैतन्य, चेतना, साक्षी, अद्वैत, आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, आत्मबोध, ब्रह्मबोध, आनंद, शांति, पूर्णता, अनंत, अखंड, नित्य, शुद्ध, मुक्त, अमर, अविनाशी, अजन्मा, असंग, निर्गुण, निराकार, निरपेक्ष, निर्विकार, अद्वितीय, तुरीय, मोक्ष, मुक्ति, निर्वाण, एकत्व, परमात्मा, परम सत्य, नेति-नेति, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि, सत्, स्वप्रकाश, अहंकार-रहित, इच्छारहित, बंधनमुक्त, भयमुक्त, स्वतंत्रता, विवेक, वैराग्य, करुणा, प्रेम, शून्यता।
इनमें कुछ शब्द positive हैं—जैसे आनंद, शांति, पूर्णता, प्रेम। वहीं कुछ शब्द नकार के माध्यम से सत्य की ओर इशारा करते हैं—जैसे असंग, निर्गुण, निराकार और नेति-नेति।
मुझे इससे समझ आया कि सत्य को किसी वस्तु की तरह पाने से ज्यादा जरूरी है अपने अंदर की गलत धारणाओं को पहचानना और छोड़ना।
2. मेरी व्यक्तिगत स्थिति
अभी मैं एक ऐसे relationship में हूँ जहाँ उससे बात करने पर मुझे खुशी मिलती है और उसकी फ़िक्र भी होने लगी है। लेकिन साथ ही मेरे अंदर उम्मीद रहती है कि वह मुझे समझे, मेरी feelings को समझे और मेरे करीब रहे।
मैं उसे बाँधना नहीं चाहता और न ही उस पर कोई अधिकार चाहता हूँ। फिर भी जब उससे दूरी होती है, तो मन बेचैन होने लगता है और मैं फिर उसके करीब चला जाता हूँ।
अब मुझे प्रेम और attachment का फर्क थोड़ा दिखाई दे रहा है।
प्रेम: वह अपनी तरह से स्वतंत्र और खुश रहे, चाहे वह मेरे करीब हो या नहीं।
Attachment: मैं उसे बाँधना नहीं चाहता, लेकिन अंदर से चाहता हूँ कि वह मुझे समझे, मेरे करीब रहे और मेरी feelings का जवाब दे।
शायद मेरे अंदर दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। इसलिए आज मैं खुद से पूछ रहा हूँ—क्या मैं सच में प्रेम कर रहा हूँ, या अपनी उम्मीद और attachment को प्रेम समझ रहा हूँ?
मुझे अब लग रहा है कि मुझे कोई नई चीज़ पाने से पहले अपने अंदर की इस पकड़ को देखना है। शायद मेरे लिए अभी नेति-नेति का अर्थ यही है—जो मुझे बाँध रहा है, उसे पहचानना और धीरे-धीरे छोड़ना।
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Jaya
🪔 बोधकार्य
1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल होता है, ऐसे 50 शब्द खोजिए। फिर देखिए कि उनमें से कितने सकारात्मक (via-positiva) हैं।
🌱 सकारात्मक
ब्रह्म, आत्मा, आत्मन्, परमात्मा, सत्, चित्, आनंद, सच्चिदानंद, चैतन्य, स्वरूप, स्व, साक्षी, द्रष्टा, तत्त्व, तत्, परम, पूर्ण, अद्वैत, एकत्व, कैवल्य, मुक्ति, मोक्ष, शुद्ध, नित्य, शाश्वत, अविनाशी, अमृत, अज, कूटस्थ, स्वप्रकाश, ज्ञान, बोध, आत्मबोध, ब्रह्मज्ञान, शांति, स्वतंत्रता, तुरीय, अक्षर, अव्यय, अनंत, अद्वितीय।
🌱 नकारात्मक
नेति, नेति-नेति, अनात्मा, निर्गुण, निराकार, निरुपाधिक, निरंजन, निरपेक्ष, असंग, अचल, अशरीर, अरूप, अगोचर, अवर्ण, अव्यक्त, अनिर्वचनीय, अचिन्त्य, अविषय, निर्विशेष, निष्क्रिय, निष्कल, निरवयव, निराधार, निर्मल, निःसंग, निःस्पृह, निरहंकार, देहातीत, मनातीत, इन्द्रियातीत, विचारातीत, नाम-रूपातीत, देशातीत, कालातीत, विकाररहित, बंधनरहित, द्वैत-रहित, भेदरहित, द्वंद्वरहित, मायातीत, गुणातीत, प्रपंचातीत, संसारातीत, मृत्युरहित, सीमातीत, असीम, अदृश्य, अगम्य, अलक्ष्य, अवर्णनीय, अपरिमेय, अविभाज्य, अद्वितीय।
2. जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है?
जब भी उच्चतम की बात करती हूं तो नकार में ज्यादा करती हूं। अहंकार को घटाने की दिशा के बारे में ज्यादा focus होकर बात करती हूं, और ऐसा इसलिए करती हूं क्योंकि जब से आचार्य जी से जुड़ी हूं तब से सोचने का, समझने का और चीजों को देखने का पूरा तरीका बदल गया है।
पहले जो सोचने का pattern था वह लोकधर्मी था, क्योंकि वही सब बताया गया था। वही सब देखा था बचपन से और लगता था कि यही अध्यात्म है।
पहले जब उच्चतम की बात होती थी तो सकारात्मक रूप में होती थी ( शांति, मुक्ति, आनंद, oneness, परमात्मा ) पर इसका असली मतलब नहीं पता था। जो भी बात होती थी, जो भी कर्मकांड होते थे, सब बेहोशी में होते थे।
पहले बहुत कुछ मानती थी, अब जानना शुरू किया है, भीतर अंतर्द्वंद चलता रहता है, मन में डर भी रहता है, पर अब धीरे-धीरे चीजों को समझने लगी हूं, जानने लगी हूं और जो मान्यताएं हैं उनको छोड़ने लगी हूं।
आपका सहृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद आचार्य जी 🙏🏻
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Pratibha
1. वेदान्त में सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द और उनमें कितने सकारात्मक हैं?
वेदान्त में सत्य की ओर संकेत करने के लिए अलग-अलग प्रकार के शब्द मिलते हैं। कुछ शब्द सत्य के बारे में कुछ कहते हुए दिखाई देते हैं, जबकि कुछ शब्द केवल यह बताते हैं कि सत्य क्या नहीं है।
सकारात्मक भाषा के कुछ शब्द:
ब्रह्म, आत्मा, सत्य, सत्, चित्, आनन्द, चैतन्य, ज्ञान, पूर्ण, शान्ति, अमृत, अनन्त, अद्वैत, मोक्ष, मुक्ति, कैवल्य, साक्षी, स्वप्रकाश, शुद्ध, मुक्त, तुरीय, परम, कूटस्थ, अक्षर।
नकार की भाषा के कुछ शब्द:
नेति-नेति, निर्गुण, निराकार, निर्विकार, निरुपाधिक, असंग, अकर्ता, अभोक्ता, अजन्मा, अव्यय, अविनाशी, अव्यक्त, अचिन्त्य, अरूप, अशब्द, अस्पर्श, अदृश्य, अग्राह्य, विषयातीत, उपाधि-रहित, अहंता-रहित, द्वैत-रहित, निःसंग, निःस्पृह, निर्लेप।
इन 50 शब्दों में लगभग 25 शब्द सकारात्मक और 25 शब्द नकार की भाषा वाले रखे जा सकते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि केवल गिनती करना इस बोधकार्य का मुख्य उद्देश्य नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि सकारात्मक शब्द भी हमारे लिए किसी उपलब्धि या वस्तु की तरह बन सकते हैं, जबकि नकार की भाषा हमारी पकड़ को देखने में मदद करती है।
2. जब मैं सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ, तो मेरी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की?
जब मैं सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ, तो मेरी भाषा अक्सर सकारात्मक हो जाती है। मैं सत्य को शांति, आनंद, पूर्णता या किसी ऊँची अवस्था के रूप में सोचने लगती हूँ, जिसे मुझे प्राप्त करना है।
लेकिन इस सत्र से मुझे यह देखने को मिला कि शायद यही मेरी भूल है। मैं सत्य को समझने के बजाय उसकी एक तस्वीर बनाकर उसे पाने की कोशिश करने लगती हूँ।
“नेति-नेति” मुझे कुछ नया पकड़ने के बजाय अपनी पुरानी पकड़ को देखने की ओर ले जाता है।
इसलिए मेरे लिए सवाल यह नहीं है कि सत्य क्या है और मुझे उसे कैसे पाना है, बल्कि यह देखना ज़्यादा जरूरी है कि मैं अभी किन चीज़ों को सत्य मानकर पकड़े बैठी हूँ और उनमें से क्या वास्तव में नहीं है।
🪞 शायद शास्त्र का आईना मुझे कोई नई पहचान देने के लिए नहीं, बल्कि मेरी बनाई हुई पहचानों को देखने के लिए है।
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Deepak
Ego is always ready to hunt the Truth and tell itself, “Yes, I got it.”
1. Find 50 words used in Vedanta to point towards Truth. Then see how many of them are positive (via-positiva).???
50 words/expressions used in Vedanta to point towards Truth. Almost all are via positiva—they seem to tell me what Truth is:
1.* Sat — Being, Reality
2. *Chit — Consciousnes
3.* Ānanda — Bliss
4. *Brahman — Absolute Reality
5. *Ātman — Self
6. *Satya — Truth
7. *Jñāna — Knowledge
8. *Ananta — Infinite
9. *Jyoti — Light
10. *Śubhra — Pure, luminous
11. Amṛta — Immortal
12. Śānti — Peace
13. Pūrṇa — Full, complete
14. Advaita — Non-dual
15. Ekam — One
16. Akṣara — Imperishable
17. Avināśī — Undecaying
18. Nitya — Eternal
19. Svayam — Self-existing
20. Svarāṭ — Self-governing
21. Prakāśa — Illumination
22. Chaitanya — Consciousness
23. Sākṣī — Witness
24. Kūṭastha — Unchanging
25. Asaṅga — Unattached
26. Nirmala — Stainless, pure
27. Nirañjana — Unstained
28. Nirvikāra — Changeless
29. Nirāmaya — Free from affliction
30. Nirbhaya — Fearless
31. Abhaya — Fearlessness
32. Svarūpa — Essential nature
33. Param — Supreme
34. Parabrahman — Supreme Reality
35. Puruṣa — Cosmic Self
36. Īśvara — Lord, governing Reality
37. Nārāyaṇa — Supreme Reality
38. Tattva — That-ness, Reality
39. Antarātman — Inner Self
40. Antaryāmin — Inner controller
41. Prajñāna — Conscious awareness
42. Vijñāna — Higher knowledge
43. Bhūmā — The Infinite
44. Mahaḥ — The Great
45. Ākāśa — Space, expanse
46. Amātra — Without measure
47. Turīya — The Fourth
48. Svaprakāśa — Self-luminous
49. Sat-Cit-Ānanda — Being-Consciousness-Bliss
50. Aham Brahmāsmi — I am Brahman
What strikes me is that even these positive descriptions can become objects for the ego to grasp. I can turn Brahman, Ātman, Sākṣī, or Ānanda into concepts and imagine that I have understood or attained something.
So the words are pointers, not possessions.
Perhaps this is why Neti-Neti is so important: it keeps me from mistaking the pointer for That towards which it points.
2. When you speak of Truth or of the Highest in your life, is your language one of negation, or of positivity? Why do you think it is so????
When I speak of Truth or the Highest, my language feels insufficient. I try to speak through Neti-Neti, yet even negation ends up creating a positive assertion.
I say, “Truth is not what you think; it is beyond thought, beyond the senses, beyond language; it cannot be imagined, coded or grasped.” But the mind immediately searches for a word, an idea, an image—even “meaningless” or “unknowable” becomes something to grasp.
The ego is always ready with its gear and gadgets, wanting to go hunting for Truth so that it can finally say, “I know the Truth.”
But perhaps Truth cannot be known as an object. What can be known and clearly seen is falseness and bondage—what I am falsely identifying with, what I am clinging to, and what keeps me restless.
That is where Neti-Neti becomes meaningful: not as another description of Truth, but as the seeing and dropping of what is false.
Shivani
## 1. 50 Vedantic Terms Pointing to Truth
In Vedanta, pointers to the Ultimate Reality are classified into two approaches:
Via-Positiva (affirmation of ultimate qualities) and Via-Negativa (negation of the false).
Out of the 50 key terms below, 28 are positive, and 22 are negative.
## 🟢 Positive Pointers (Via-Positiva) — 28 Words
These terms attribute supreme presence, light, and reality to the Truth:
सत् (Sat) - Absolute Existence / त्रिकालबाधित सत्यचित्
(Chit) - Pure Consciousness / शुद्ध चेतनाआनन्द
(Ananda) - Supreme Bliss / परमानन्दब्रह्मन्
(Brahman)- The Infinite Expanse / असीम वास्तविकताआत्मन्
(Atman) - The True Self / शुद्ध आत्मापूर्ण (Purna) -
Infinite Fullness / अखंड पूर्णताज्योति
(Jyoti) - SupremeSpiritual Light / दिव्य प्रकाशज्ञान
(Jnana) - Divine Wisdom /
आत्म-ज्ञानअमृत (Amrita) - Immortality /
अमरत्वशान्तम् (Shantam) - Absolute Peace /
परम शान्तिशिवम् (Shivam) - Ultimate Goodness
परम कल्याणसुन्दरम् (Sundaram) - Supreme Beauty / अलौकिक सौंदर्यप्राण (Prana) - The Cosmic Life Force / मुख्य प्राण शक्तिविभूति (Vibhuti) - Divine Glory /
ईश्वरीय ऐश्वर्यप्रकाश (Prakash) - Pure Radiance / आत्म-प्रकाशईश्वर (Ishvara) - Cosmic Intelligence / समष्टि बुद्धिधर्म (Dharma) - Universal Order /
शाश्वत नियमसच्चिदानन्द (Satchidananda) - Existence-Consciousness-Bliss / सत्-चित्-आनन्द का विग्रहऐश्वर्य (Aishwarya) - Divine Sovereignty /
ईश्वरीय सामर्थ्यप्रेमन् (Preman) - Unconditional Love / विशुद्ध प्रेमकल्याण (Kalyana) - Ultimate Well-being / मंगलभूमन (Bhuman) - The Boundless Greatness / विराट सत्यतुरीय (Turiya) - The Fourth State of Consciousness / तीन अवस्थाओं से परे चेतनासाक्षी (Sakshi) - The Untouched Witness /
दृष्टा भावबोध (Bodha) - Pure Awakening / आत्म-जागृतिविज्ञान (Vijnana) - Realised Wisdom /
अनुभूतिमय ज्ञानचेतना (Chetana) - Cosmic Awareness / परम चेतनास्वातन्त्र्य (Svatantrya) - Absolute Freedom / पूर्ण स्वतंत्रताNegative Pointers (Via-Negativa) — 22 Wordsअसङ्ग (Asanga) - Unattached /
सर्वथा संग-रहितनिर्गुण (Nirguna) - Without attributes / गुणों से परेनिराकार (Nirakara) - Formless / आकार-रहितनिर्वाण (Nirvana) - Extinction of the ego / अहंकार का लयअद्वैत (Advaita) - Non-dual / दो से रहित या एक हीनेति (Neti) - Not this, not that / यह भी नहीं, वह भी नहींअनन्त (Ananta) - Endless /
सीमा-रहितअरूप (Arupa) - Without physical form / रूप-रहितनिर्विकल्प (Nirvikalpa) - Free from mental modifications / संशय और विकल्प से परेअव्यक्त (Avyakta) - Unmanifest / जो दिखाई न देअचल (Achala) - Immovable / जो कभी न डिगेअजन्मा (Ajanma) - Unborn /
जिसका जन्म न हुआ होआकाशवत् (Akashavat) - Space-like / आकाश की तरह निर्लेपनिरुपाधिक (Nirupadhika) - Free from limitations / उपाधि-रहितअपरोक्ष (Aparoksha) - Immediate / सीधा या साक्षात् अनुभवअमल (Amala) - Spotless / मैल या दोष से रहितनिर्विकार (Nirvikara) - Changeless / बदलाव-रहितअविनाशी (Avinashi) - Indestructible / जिसका नाश न हो सकेअखण्ड (Akhanda) - Undivided / जिसके टुकड़े न हो सकेंनिरञ्जन (Niranjana) - Stainless / अज्ञान के काजल से अछूताअलक्षण (Alakshana) - Defineless / लक्षणों से परे
अदृश्य (Adrishya) - Unseen / बुद्धि और इन्द्रियों से परे
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"Just as we can only conceptualise light because we understand darkness, I wonder: if there were no darkness, would we ever perceive light the way we do? Darkness itself is entirely dependent on light.
Through my sessions with Acharya Ji, I have come to understand that when delusion dissolves, the path to Truth reveals itself. He teaches us not to waste time merely throwing around positive concepts like Truth, Brahman, Atman, or the Self. Instead, we must actively look at our delusions. By avoiding a head-on look at our lies, we try to protect the ego. When we say a person is untruthful or dishonest, it isn't just about a moral concept of 'lying'; it is about deep-seated illusion and delusion.
Delusion is a trap so powerful that people would rather die than admit they are caught in it. However, the more you catch your own delusions, the more your eyes open. The moment I catch a delusion and see it clearly, a time comes when I can no longer live with it. This realization is a major step toward Truth. Truth is not a final destination you arrive at; rather, the fewer the lies you hold onto, the closer to Truth you naturally are.
Shridarshan
१) वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल होता है, ऐसे 50 शब्द खोजिए। फिर देखिए कि उनमें से कितने सकारात्मक (via-positiva) हैं।
1) निराकार — आकाररहित
2) निर्गुण — गुणरहित
3) निर्विशेष — विशेषतारहित
4) निर्विकार — विकाररहित
5) निरंजन — मलरहित/कालिमारहित (श्वेताश्वतर उपनिषद ६.१९)
6) निर्मल — मलरहित
7) निर्लेप — लेपरहित, असंग
8) निःसंग — संगरहित
9) अभेद — भेदरहित
10) अद्वैत — द्वैतरहित
11) अद्वय — दो नहीं
12) अद्वितीय — जिसका दूसरा न हो (छांदोग्य ६.२.१ — "एकमेवाद्वितीयम्")
13) अनंत — अंतरहित
14) अनादि — आदिरहित
15) अपार — पाररहित
16) अगम्य — पहुँच से परे
17) अगोचर — इंद्रियों की पहुँच से परे
18) अवाङ्मनसगोचर — वाणी और मन दोनों की पहुँच से परे (तैत्तिरीय २.४ — "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह")
19) अचिन्त्य — चिंतन से परे (कठोपनिषद १.२.८)
20) अवर्णनीय — वर्णन से परे
21) अनिर्वचनीय — कहने से परे
22) अव्यक्त — प्रकट न हुआ (कठोपनिषद १.३.११ — "अव्यक्तात् परं पुरुषः")
23) अगुण — गुणरहित
24) अक्षर — क्षयरहित (मुण्डक १.१.६, बृहदारण्यक ३.८.८)
25) अच्युत — च्युत न होने वाला
26) अजर — जरारहित
27) अमर — मृत्युरहित
28) अजन्मा/अज — जन्मरहित (श्वेताश्वतर ४.२१ — "अजामेकाम्")
29) अयोनिज — योनि/उत्पत्तिरहित
30) असंग — किसी से जुड़ा हुआ नहीं (बृहदारण्यक ४.३.१५ — "असंगो हि अयं पुरुषः")
31) अरूप — रूपरहित
32) अगन्ध — गंधरहित
33) अरस — रसरहित (इंद्रिय-रस के अर्थ में)
34) अशब्द — शब्दरहित (कठोपनिषद १.३.१५ — "अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं...")
35) अस्पर्श — स्पर्शरहित
36) अलिंग — चिह्नरहित
37) अलक्षण — लक्षणरहित
38) अप्रमेय — प्रमाण से न जाना जा सके
39) अगाध — थाह न मिले
40) दुर्दर्श — देखने में कठिन (कठोपनिषद १.३.१२ — "एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते... दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या")
41) दुर्विज्ञेय — जानने में कठिन
42) अकाय — शरीररहित (कठोपनिषद १.२.२२ — "अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्")
43) अशरीरी — शरीररहित
44) अनामय — रोगरहित/विकाररहित
45) सूक्ष्मात्सूक्ष्म — सूक्ष्म से भी सूक्ष्म (कठोपनिषद १.२.२० — "अणोरणीयान् महतो महीयान्")
46) अणोरणीयान् — अणु से भी छोटा
47) महतो महीयान् — महान से भी महान
48) दूरात्सुदूरे — दूर से भी दूर (मुण्डक ३.१.७)
49) अन्तिके — फिर भी पास (मुण्डक ३.१.७ — "तददूरे तदु अन्तिके")
50) कूटस्थ — शिखरवत् अचल (गीता-प्रभावित पर उपनिषदों में भी प्रयुक्त भाव)
51) ध्रुव — स्थिर
52) अचल — हिलता नहीं (ईशावास्य ४ — "अनेजदेकं मनसो जवीयः")
53) अनेजत् — कंपनरहित (ईशावास्य ४)
54) तूष्णीम् — मौन-स्वरूप (सांकेतिक भाव में शांति-सूचक)
55) शांत — शांत-स्वरूप
56) एक/अखंड-सूचक इंगित-शब्द
57) एकम् — एक ही (छांदोग्य ६.२.१; ऋग्वेद १.१६४.४६ — "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति")
58) अखंड — विभाजनरहित
59) अविभक्त — विभाजित न हुआ (गीता १३.१६ में भी, पर उपनिषद-भावधारा से संगत)
60) सर्वगत — सर्वत्र व्याप्त
61) व्याप्त/सर्वव्यापी — हर जगह फैला हुआ
62) अन्तर्यामी-भाव से अंतःप्रविष्ट — भीतर प्रविष्ट (तैत्तिरीय २.६ — "तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्")
इनमें बहुतांश शब्द नकार की ही भाषा में है। कुछ सकारात्मक शब्द है पर उनकी संख्या बहुत ही कम है मानो ऋषि जानते थे की जिनको ये शब्द सौंपे जा रहे है, वे कितने बड़े धुरंधर है, इसलिए उन्होंने अहंकार को समझते हुए, शब्द ही ठीक इसी प्रकार दे डाले जो बड़ी आसानी से अहंकार के/ मेरे मुँह का निवाला न बन जाए। फिर भी हमने इस असंभव कार्य को संभव कर ही डाला जिसका रूप हमें आज लोकधर्म में दिखता है। कैसे हमने अनंत को, असीम को, अरूप को भी ससीम और सरूप करके उसके पीछे की ऋषियों की मंशा पर पानी फेर दिया। खैर इससे नुकसान ऋषियों का नही, हमारा ही हुआ है।
२) जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है?
मेरे जीवन में बहुत बार नकार की ही भाषा का इस्तेमाल करता हूँ और यदि भाषा का इस्तेमाल न भी करूँ तो भीतर एक शैली रहती है की " ये तो नही ही है ! "। ऐसा नही है की मैं अब बहुत कुछ समझने लगा हूँ पर हाँ, ये तो है की अभी जो है, उसके प्रति ऊब आ रही है, एक अजीब सी घुटन पैदा हो रही है। उदाहरण दूँ तो जैसे आजकल गणेश उत्सव चल रहा है और मैं पुणे में हूँ जहाँ से इस उत्सव की शुरुआत हुई थी लोकमान्य तिलक जी द्वारा। यहाँ पर इस उत्सव को बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है, लोग बड़ी बड़ी कतारे बाँध कर दर्शन करने आते है। पर मैं जब ये सब देखता हूँ तो मुझसे इसमें कही भी शुभता नही दिखती। कई बार लगता है की क्या मैं भी जब शुभता खोजता हूँ तो क्या मैं भी नही किसी विशिष्ट छवि की खोज कर रहा ? एक छवि का नकार और दूसरी का स्वीकार भी तो वही पुराना खेल हुआ। मेरे जीवन में मैं उच्चतम का नाम शायद ही कभी लेता हूँ। इससे मुझे लगता भी है की क्या मेरे जीवन में उच्चतम है भी की नही ? पर धीरे धीरे एक चीज़ दिख रही है की जीसे हम सबने मिलकर धर्म का नाम दे दिया है वह अहंकार को आयना तो नही दिखाता पर उसे और ज्यादा बढ़ावा देता है। जैसे अहंकार, यानि वह जो कहता है की " मैं ये हूँ " इत्यादि, बहुत तकलीफ में रहता है और थोड़ी सी शांति भी उस तकलीफ को उजागर करती है तो हम इससे बचने के लिए गणेश उत्सव में भी लाउड स्पीकर्स पर जोर जोर से गाने बजवाते है, शोर शराबा हल्ला मचाते है जिससे भीतर की ओर नजर न ही मुड़े। गणेश उत्सव जो एक अवसर है भीतर देखने का, उसे भी हम एक और साधन बना लेते है भटकने का, अपने ही पाँव पर कुलाड़ी मारने का।
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Susmita Kumari
1️⃣ वेदांत में सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द
👉ब्रह्म, आत्मा, सत्य, चैतन्य, आनंद, अस्तित्व, शुद्धता, पूर्णता, स्वतंत्रता, मुक्ति, अमरत्व, अद्वैत, एकत्व, शांति, मौन, बोध, ज्ञान, जागृति, साक्षी, समत्व, प्रेम, करुणा, निर्भयता, निरपेक्षता, निस्संगता, निर्विकार, निराकार, अनंत, असीम, अखंड, अविनाशी, अकर्ता, अभोक्ता, निर्लेप, निष्काम, निरहंकार, स्वातंत्र्य, सहजता, तृप्ति, संतोष, समाधि, आत्मबोध, आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, कैवल्य, निर्वाण, तत्त्व, परम, नित्य, शुद्ध-बुद्ध-मुक्त।
👉इनमें सकारात्मक (via positiva) शब्द: अधिकांश शब्द, जैसे—आनंद, पूर्णता, स्वतंत्रता, शांति, प्रेम, ज्ञान, जागृति, एकत्व आदि।
👉नकारात्मक (via negativa) शब्द: अद्वैत के संदर्भ में वे शब्द जो किसी सीमित पहचान को हटाते हैं—जैसे निर्गुण, निराकार, अनंत, असीम, अकर्ता, अभोक्ता, निर्लेप, निष्काम, निरहंकार, निर्विकार, नेति-नेति आदि।
2️⃣ जब मैं जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ…
मेरे अनुसार सत्य को व्यक्त करने के लिए नकारात्मक भाषा अधिक प्रभावी लगती है, क्योंकि सत्य को किसी निश्चित रूप, गुण या उपलब्धि में बाँधना उसे फिर एक विचार बना देता है। “मुझे यह बनना है” कहने पर अहंकार एक नई पहचान पकड़ सकता है।
इसके विपरीत, “यह नहीं”, “यह भी नहीं”, “यह मेरे लिए नहीं है” कहने से मैं अपनी गलत धारणाओं, आसक्तियों और झूठी पहचान को देख पाती हूँ। इसलिए मेरे लिए सत्य की ओर बढ़ना किसी नई चीज़ को पाने से अधिक जो असत्य है उसे पहचानकर छोड़ना है।
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Rudra
🏵️आज का बोधकार्य:—🌿25 सितंबर, 2026 | शुक्रवारआत्म ज्ञान के प्रकाश मेंअंधे कर्म सब त्याग दोनिराश हो, निर्मम बनोताप रहित बस युद्ध हो (अध्याय 3,श्लोक 30)
2. जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है?
🌈अवलोकन:—
पहली बात तो गीता समागम से जुड़ने से पहले, मेरी धारणा यहीं सत्य के, ब्रह्म के प्रति और आत्मा को लेकर कुछ इस प्रकार से था —
बड़े बड़े तपस्वी के पास शक्तियां होती है, उन्हें ब्रह्म की विद्या होती है,
आत्मा पुण्य कर्मों से आती है, जब मैं अपनी दिल की बात को सुनूंगा तो आत्मा अंदर से फुटकर बाहर निकलेगी,😃
सत्य के साथ जिओ मतलब किसी को धोखा न देना, चोरी न करना, लड़ाई झगड़ा मत करना और झूठ मत बोलना तो सत्य तुम्हारे लिए होगा।
गीता समागम और आचार्य जी के शिक्षाओं का प्रभाव:
लेकिन अब अपने हर एक पल का, मतलब सिर्फ़ "नकार" से होता है, अब पसंद जैसा लगता है,नकार।
मुझे नहीं पता कि मैने नकार शब्द को भी अपनी पहचान लिया है या नहीं।
लेकिन "नकार" शब्द अपने आप पर्याप्त है मेरी सब धारणाओं, मान्यता को और एक पहचान जो मैं छवि के रूप गढ़ते रहता हूँ,
"नकार" — किसी भी विश्वास या रूप, नाम, पहचान को न आकार देने में है, यानी जो पहले से हमारे पास उधार का, उसमें और कुछ अधिकता न जुड़ने का नाम है, नकार।
जो है, पहले से मौजूद उसी को छोड़ने, गिरा देने और निराश हो जाने का नाम है, "नेती नेती"।
क्योंकि अहंकार असहज हो जाता है, निर्विकार होने में,
छिपने के लिए कोई आश्रयता नहीं मिल पाती।
Vivek kumar
1. 50 words used in Vedanta to point towards Truth. How many of them are positive (via-positiva).
Neti Neti, Brahman, Atman, Sat, Chit, Ananda, Satchidananda, Turiya, Akshara, Kutastha, Kutastha, Purusha, Advaita, Satya, Nitya, Nirguna, Nirakara, Purna, Ajata, Asanga, Avangmanogocara, Svaprakasha, Sakshi, Drg, Pratyagat,man, Kshetrajna, Antaryamin, Jiva, Jnana, Vichara, Viveka, Vairagya, Mumukshutva, Mahavakya, Aparoksha Anubhuti, Vidya, Bodha, Samadhi, Samadhana, Uparati, Shanti, Videhamukti, Jivanmukti, Moksha, Maya, Avidya, Mithya, Adhyasa, Nama-Rupa, Upadhi, Anatman.
Very few words are used with positiva sense. Almost each word is in negativa sense.
2. When you speak of Truth or of the Highest in your life, is your language one of negation, or of positivity? Why do you think it is so?
After joining the Gita sessions and after knowing actual meaning of these words, I do not speak much of these words which denote the 'truth'. Even while looking something, if these words come in my mind, I try to see the falseness of my beliefs. I try to find what I am trying to hide behind these words.
This is not the result of my thinking. After joining the Gita sessions and knowing right meaning of these words I can see How I try to hide my trivia or showing my false desires as truth. So I really get cautious ⚠️ while using these words in my life.
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Vinod Tiwari
1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने के लिए इस्तेमाल होने वाले 50 शब्द और उनमें सकारात्मक (via positiva) शब्द कितने हैं:
वेदांत में सत्य को बताने के लिए बहुत से शब्दों का प्रयोग किया गया है, लेकिन उनमें से अधिकतर शब्द किसी वस्तु या उपलब्धि की तरह सत्य को परिभाषित नहीं करते, बल्कि हमारी गलत धारणाओं को हटाने का काम करते हैं।
कुछ प्रमुख शब्द:
1. ब्रह्म
2. आत्मा
3. सत्य
4. चैतन्य
5. आनंद
6. शांति
7. पूर्णता
8. अनंत
9. अमृत
10. प्रकाश
11. स्व
12. परम
13. अद्वैत
14. एकत्व
15. अस्तित्व
16. साक्षी
17. निराकार
18. निर्गुण
19. निर्विकार
20. निष्कलंक
21. निर्भय
22. निरपेक्ष
23. अकर्ता
24. अभोक्ता
25. अजन्मा
26. अविनाशी
27. असीम
28. असंग
29. अखंड
30. अव्यय
31. नेति-नेति
32. माया से परे
33. अहंकार रहित
34. इच्छा रहित
35. विचार रहित
36. द्वैत रहित
37. दुख रहित
38. भय रहित
39. जन्म-मरण से मुक्त
40. बंधन मुक्त
41. कैवल्य
42. मोक्ष
43. मुक्ति
44. निर्वाण
45. सहज
46. समत्व
47. करुणा
48. मौन
49. जागृति
50. बोध
इनमें अगर ध्यान से देखें तो बहुत कम शब्द वास्तव में via positiva हैं। जैसे — आनंद, शांति, पूर्णता, प्रकाश, चैतन्य, प्रेम, करुणा जैसे शब्द सकारात्मक संकेत देते हैं। लेकिन वे भी किसी वस्तु की तरह पाने योग्य चीज़ नहीं हैं।
लगभग 10–12 शब्द सकारात्मक प्रतीत होते हैं, जबकि बाकी अधिकतर शब्द नकार के माध्यम से सत्य की ओर संकेत करते हैं — जैसे निर्गुण, निराकार, असंग, अजन्मा, अविनाशी, नेति-नेति आदि।
इससे समझ आता है कि ऋषियों का उद्देश्य सत्य की कोई तस्वीर बनाना नहीं था, बल्कि हमारी बनाई हुई गलत तस्वीरों को हटाना था।
2. जब मैं जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करता हूँ, तो मेरी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? ऐसा क्यों?
जब मैं सत्य या जीवन के उच्चतम लक्ष्य की बात करता हूँ, तो मेरी भाषा अधिकतर सकारात्मकता की ओर चली जाती है। मैं सत्य को शांति, आनंद, सफलता या किसी ऊँची अवस्था के रूप में देखने लगता हूँ। शायद इसका कारण यह है कि मन हमेशा कुछ पाने की भाषा समझता है। उसे लगता है कि जीवन में जो कमी है, उसे कोई नई चीज़ प्राप्त करके पूरा किया जा सकता है।
लेकिन वेदांत की दृष्टि से देखने पर समझ आता है कि सत्य कोई नई उपलब्धि नहीं है। वह पहले से मौजूद है, बस हमारे भ्रम, इच्छाएँ, डर और अहंकार उसके बीच में खड़े हैं। इसलिए सत्य की ओर जाने का मार्ग जोड़ने का नहीं, हटाने का है।
मेरी समझ में नकार की भाषा ज्यादा वास्तविक है, क्योंकि मैं अपने अंदर देख सकता हूँ कि मुझे क्या छोड़ना है — मेरी अपेक्षाएँ, मेरी गलत पहचान, मेरा अहंकार, मेरी पकड़। लेकिन मैं यह निश्चित रूप से नहीं बता सकता कि सत्य मिलने के बाद कैसा अनुभव होगा।
इसलिए अब मुझे लगता है कि “मुझे क्या मिलेगा?” से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न है — “मुझमें क्या गलत है जिसे छोड़ना है?”। शायद इसी कारण ऋषियों ने नेति-नेति का मार्ग दिया। वह हमें कोई नया सहारा नहीं देता, बल्कि उन पुराने सहारों को दिखाता है जिनसे हम बंधे हुए हैं। सत्य शायद किसी नई चीज़ को पाने में नहीं, बल्कि असत्य को पहचानकर छोड़ देने में है।
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Swati Suman
1- ब्रह्म, आत्मा, आत्मन्, सत्य, चित्, आनंद, सच्चिदानंद, सत्, चैतन्य, प्रज्ञान, ऋत, अनंत, पूर्ण, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, अमृत, अविनाशी, अज, अकर्ता, अभोक्ता, निर्गुण, निराकार, निरंजन, निर्विकार, निरपेक्ष, निर्लेप, नित्य, शाश्वत, अव्यय, अचल, असंग, अद्वैत, अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यक्त, अनिर्वचनीय, अप्रमेय, अजात, अभय, स्वयंज्योति, साक्षी, द्रष्टा, पुरुष, तुरीय, कैवल्य, निरुपाधिक, असीम, स्वयंप्रकाश।
सकारात्मक शब्द-
ब्रह्म, आत्मा, आत्मन्, सत्य, चित्, आनंद, सच्चिदानंद, सत्, चैतन्य, प्रज्ञान, ऋत, पूर्ण, शुद्ध, बुद्ध, अमृत, नित्य, शाश्वत, अभय, स्वयंज्योति, साक्षी, द्रष्टा, पुरुष, तुरीय, कैवल्य, स्वयंप्रकाश।
2-जब मैं अपने जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ, तो मेरी भाषा अधिकतर सकारात्मक होती है। मैं सत्य को शांति, प्रेम, आनंद, स्वतंत्रता, पूर्णता, ज्ञान जैसी किसी प्राप्त करने योग्य अवस्था के रूप में सोचने लगती हूँ। मुझे लगता है कि सत्य मिल जाएगा तो मैं शांत हो जाऊँगी, मेरा जीवन बेहतर हो जाएगा और मेरी सारी समस्याएँ समाप्त हो
आचार्य जी की बात से देखने पर समझ आता है कि शायद इसलिए ऋषियों ने नकार की भाषा को इतना महत्व दिया। "मैं सत्य को क्या मानती हूँ?" से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—"मैं अभी किन चीज़ों को सत्य मानकर पकड़े बैठी हूँ?"
मेरे भीतर की बेचैनी, भय, तुलना, अपेक्षा, आसक्ति और अपनी बनाई हुई पहचान—इन सबको देखना और कहना कि "यह मैं नहीं हूँ", "यह सत्य नहीं है", "इसे भी छोड़ना है"—यही नेति-नेति की दिशा है।
इसलिए अब मुझे लगता है कि सत्य को सकारात्मक शब्दों से पकड़ने की कोशिश करने की अपेक्षा, असत्य को पहचानकर छोड़ना अधिक वास्तविक है। क्योंकि सत्य मेरे लिए वास्तव में क्या है, यह शायद मेरी वर्तमान बुद्धि नहीं जानती; लेकिन इतना तो मैं देख सकती हूँ कि जो चीज़ मुझे बार-बार अशांत करती है, उससे मेरा मोह कितना गहरा है।
इस अर्थ में नकार निराशावाद नहीं, बल्कि मुक्ति की शुरुआत है। सत्य को पाने से पहले उन धारणाओं को खोना पड़ता है जिन्हें मैं सत्य समझकर बैठी हूँ। नेति-नेति मुझे कोई नई पहचान नहीं देती; वह धीरे-धीरे मेरी झूठी पहचानों को हटाती है। और शायद इसी में शास्त्र का आईना होना सार्थक होता है—वह मुझे सत्य की कोई तस्वीर नहीं देता, बल्कि मेरी अपनी बनाई हुई तस्वीरें तोड़ता है।
1
Abhisek Mondal
वेदांत में सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द
🔹सकारात्मक शब्द🔹
⚠️ ब्रह्म ⚠️ सत्
⚠️आत्मा ⚠️ चित
⚠️ आनंद ⚠️ सच्चिदानंद
⚠️शुद्ध चैतन्य ⚠️ प्रज्ञान ⚠️ साक्षी
⚠️आत्मस्वरूप ⚠️ परमात्मा
⚠️परम ⚠️परम ब्रह्म ⚠️ पुरुष
⚠️ शान्ति ⚠️ पूर्णता ⚠️अनंत ⚠️कैवल्य, ⚠️मोक्ष,⚠️मुक्ति,⚠️ तुरीय, ⚠️कूटस्थ,⚠️ नित्य, ⚠️ शुद्ध बुद्ध,
🍂 नकारात्मक शब्द 🍂
🌿 नेति - न
🌿 अदृश्य
🌿 अग्राह्य
🌿 अकर्ता
🌿 अभोक्ता
🌿 असंग
🌿 अरूप
🌿 अकथ्य
🌿 अगोचर
🌿 अस्पर्श
🌿 अकल्पनीय
🌿 निर्गुण
🌿 अचल
🌿 निर्बयक्तिक
🌿 असंग
🌿 निर्मम
🌿 अबाक
🌿 अचिंत
🌿 अपार
🌿 अकाल
🌿 निर्मोही
🌿 अबिनाशी
🌿 अजात
🌿 अमर
🌿 निर्बीकार
नकार में ही ज्यादा शब्द हैं और खोजने में और मिलेगा। ये नकार सीधा सीधा अहंकार कों हो रही हैं। अहंकार जो कुछ सोच सकता हैं, बोल सकता हैं, अनुभव कर सकता हैं, कल्पना कर सकता हैं बो सत्य नहीं हैं।
सत्य को पाने का प्रयास या कल्पना ब्यर्थ हैं। अगर शब्द के पकड़ में सत्य आया तो बो अहंकार की बिषय बन जायेगा।
सारी नकार अहंकार के झूठ कों पकड़ ने लिए हैं ; अत: अहंकार ही झूठ हैं ये दिखता हैं एक आईना कि तरहा।
2️⃣ उच्चतम या सत्य कि ज्यादा बात नहीं करते हैं क्योंकि इसकी बात करना मेरे लिए एक बौद्धिक प्राप्ति हैं जो मेरे मेमोरी में फिट हो गया। सत्य जब आएगा जीवन में अपने आप उतर जायेगा। तो सत्य कि बात सकारात्मक हो या नकारात्मक दोनों ही अल्पबुद्धि द्वारा संचालित हैं।
अपनी ईमानदार नीयत से खुद देख पाना स्वीकार कर पाना काफ़ी हैं, उसके बाद में जो होना हैं होगा।
🌿 शब्द बदलते हैं लेकिन सत्य एक ही है.....🌿🌿
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Deepak Yadav
मैने यहां थोड़ी चैट gpt का भी इस्तेमाल किया है थोड़ी जानकारी इकठ्ठा करने के लिए
ब्रह्म
आत्मा
अद्वैत
चैतन्य
सत्
चित्
आनंद
अस्तित्व
साक्षी
निराकार
निर्गुण
अनंत
शाश्वत
अविनाशी
अखंड
पूर्ण
एकत्व
तत्त्व
आत्मबोध
ज्ञान
विवेक
वैराग्य
मुक्ति
मोक्ष
समाधि
प्रज्ञा
तुरीय
शांति
मौन
स्वस्वरूप
अहं-ब्रह्मास्मि
तत्
सत्यम्
ऋतम्
परम
निर्विकल्प
निरपेक्ष
असंग
कूटस्थ
साक्षित्व
आत्मन्
पुरुष
परब्रह्म
परमात्मा
स्वप्रकाश
चिदाकाश
ब्रह्मैकत्व
नेति-नेति
महावाक्य
अहम् ब्रह्मास्मि
यह है वह 20 शब्द जो वास्तव में हमें सत्य दिख रहे हैं सत्य • ब्रह्म • आत्मा • अद्वैत • चैतन्य • सत् • चित् • आनंद • अनंत • अविनाशी • अखंड • पूर्ण • तत्त्व • ज्ञान • विवेक • वैराग्य • मोक्ष • मुक्ति • नेति-नेति • अहम् ब्रह्मास्मि
“अहम् ब्रह्मास्मि” को भी सामान्य अहंकार का दावा नहीं समझना चाहिए—वे इसे शुद्ध/परिष्कृत अहंकार के संदर्भ में समझाते हैं।
2️⃣ हमारी भाषा सकारात्मकता की थी मैं किसी भी चीज को सत्य मान लेता था क्योंकि नकार शब्द को मैं पहले जानता ही नहीं था की सत्य तो एक ही है कि जो तुम्हारे भीतर झूठ है अहंकार है गलत है उन सब को ना करना है सत्य की ओर बढ़ना होता है मुझे नहीं पता था इन सब बारे में, हमने जो देखा था और हमारे आंखों को जो सही लगता था मैं उसे सही मानता था, और हमारी भाषा सकारात्मकता की होती थी
लेकिन इस लेख से मुझे समझ आया कि सत्य को कोई वस्तु मानकर पाने की कोशिश करना भी अहंकार की एक चाल हो सकता है।
नेति नेती की दिशा है सत्य को पकड़ना नहीं झूठ को नकारना और हटाना वही नीति नीति है
Mr Bajaj
1️⃣ 1
ब्रह्म
परम वास्तविकता
—
2
सत्
अस्तित्व/सत्ता
✅ सकारात्मक
3
चित्
चेतना
✅
4
आनंद
पूर्णता/आनंद
✅
5
सत्य
सत्य/यथार्थ
✅
6
ज्ञान
ज्ञान/बोध
✅
7
अनंत
असीम
✅
8
विज्ञान
विशिष्ट/प्रत्यक्ष बोध
✅
9
प्रज्ञान
प्रज्ञा/चैतन्य-बोध
✅
10
आत्मा
स्वयं/स्वरूप
—
11
आत्मन्
Self/स्व
—
12
परमात्मा
परम आत्मा
—
13
पुरुष
पुरुष/चैतन्य सत्ता
—
14
एकम्
एक
✅
15
अद्वितीय
जिसका दूसरा नहीं
❌ नकारात्मक
16
पूर्ण
पूर्ण
✅
17
परिपूर्ण
सर्वथा पूर्ण
✅
18
नित्य
शाश्वत
✅
19
अक्षर
अविनाशी
❌/सीमाभंग
20
अविनाशी
जिसका विनाश नहीं
❌
21
अमृत
अमर/अविनाशी
✅/नकारात्मक संकेत
22
अभय
भय से रहित
❌
23
शांत
शांति-स्वरूप
✅
24
शान्तम्
शांत
✅
25
शिवम्
मंगल/कल्याणस्वरूप
✅
26
केवल
अकेला/एकमात्र
—
27
कैवल्य
पूर्ण एकत्व/स्वतंत्रता
—
28
स्वयंज्योति
स्वयं प्रकाशित
✅
29
ज्योतिः
प्रकाश
✅
30
प्रकाश
प्रकाश/प्रकाशक चेतना
✅
31
चैतन्य
चेतना
✅
32
साक्षी
साक्षी-चेतना
—
33
द्रष्टा
देखने वाला
—
34
ज्ञाता
जानने वाला
—
35
कूटस्थ
अचल/अपरिवर्तनशील
❌/सीमाभंग
36
निरपेक्ष
किसी पर निर्भर नहीं
❌
37
स्वतंत्र
परतंत्रता से रहित
✅
38
स्वयम्भू
स्वयं से स्थित
✅
39
स्वयंसिद्ध
स्वयं-सिद्ध
✅
40
सर्वव्यापी
सबमें व्याप्त
✅
41
सर्वज्ञ
सबका ज्ञाता
✅
42
सर्वशक्तिमान
सभी शक्तियों का आधार
✅
43
अंतर्यामी
भीतर से नियामक
—
44
सर्वात्मा
सबका आत्मस्वरूप
✅
45
सर्वम्
सब कुछ
✅
46
तुरीय
चौथी/अतीन्द्रिय अवस्था
—
47
निर्गुण
गुणों से रहित
❌
48
निराकार
आकार से रहित
❌
49
निष्क्रिय
क्रिया से रहित
❌
50
नेति-नेति
यह नहीं, यह नहीं
❌
32 सकारात्मक (via positiva)
11 नकारात्मक (via negativa)
7 संदर्भ-निर्भर/मिश्रित
Via positiva भी अंततः किसी वस्तु का वर्णन करने के लिए नहीं, बल्कि मन को सत्य की ओर मोड़ने के लिए है।
2️⃣ ज्यादातर सकारात्मक की होती है क्योंकि सत्य की बात करना भी एक तरह से अहंकार है नकारात्मक इसलिए नहीं करता कि निर्ममता से खुद को देखना पड़ता है।
भाषा ही ऐसी होती है, सत्य के ओर।
Vikash kumar
🪔 आज का बोध कार्य 🪔
1️⃣ वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल होता है, ऐसे 50 शब्द खोजिए। फिर देखिए कि उनमें से कितने सकारात्मक है।
वेदांत में सत्य को सीधे परिभाषित करना कठिन माना गया है। इसलिए उसे बताने के लिए कई बार नकारात्मक शब्दों का सहारा लिया जाता है, जो बताते हैं कि सत्य क्या नहीं है।
🔴 नकारात्मक शब्द
जो बताते हैं कि सत्य क्या नहीं है:
🛑 नेति-नेति
🛑 निर्गुण
🛑 निराकार
🛑 अव्यक्त
🛑 अगोचर
🛑 अचिंत्य
🛑 अवाङ्मनसगोचर
🛑 अनादि
🛑 अनंत
🛑 असंग
🛑 निर्विकल्प
🛑 अद्वैत
🛑 अक्षय
🛑 अजन्मा
🛑 अमृत
🛑 अविनाशी
🛑 अलख
🛑 अनाम
🛑 अग्राह्य
🛑 अप्रमेय
🛑 अनिर्वचनीय
🛑 निर्लिप्त
🛑 निर्विकार
🛑 निरंजन
🛑 निरवयव
🛑 निर्गुणातीत
🛑 अदृश्य
🛑 निःशब्द
🛑 अरूप
🛑 निर्भय
🟢 सकारात्मक शब्द
जो सत्य को किसी "है" के रूप में इंगित करते हैं:
🟩 सत्
🟩 चित्
🟩 आनंद
🟩 सच्चिदानंद
🟩 ब्रह्म
🟩 आत्मा
🟩 पूर्ण
🟩 परम ज्योति
🟩 शिवम्
🟩 सुंदरम्
🟩 सत्यम्
🟩 परमात्मा
🟩 ईश्वर
🟩 चैतन्य
🟩 स्वयंप्रकाश
🟩 नित्य
🟩 सर्वज्ञ
🟩 सर्वव्यापक
🟩 कैवल्य
🟩 मोक्ष
🔎 जब गिनती करता हूँ, तो लगभग 30 शब्द नकारात्मक और केवल 20 शब्द सकारात्मक दिखाई देते हैं।
लेकिन यहाँ एक और गहरी बात है। जो शब्द पहली नज़र में सकारात्मक दिखाई देते हैं, उनमें से कई वास्तव में किसी सीमा का ही निषेध कर रहे हैं।
जैसे:
🔶 अनंत = अंत नहीं
🔶 अक्षय = क्षय नहीं
🔶 अजन्मा = जन्म नहीं
🔶 अविनाशी = विनाश नहीं
इसलिए गहराई से देखने पर वास्तविक सकारात्मक शब्द और भी कम रह जाते हैं। सत्, चित्, आनंद, ब्रह्म, आत्मा जैसे कुछ शब्द ही ऐसे दिखाई देते हैं जो सीधे किसी "होने" की ओर संकेत करते हैं। 🌱
2️⃣ जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है?
जब ईमानदारी से देखता हूँ कि मैं सत्य या "उच्चतम" की बात कैसे करता हूँ, तो पहले यह स्वीकार करना पड़ता है कि मेरी भाषा अक्सर सकारात्मकता की ओर झुकी रहती है।
मैं कहता हूँ:
"मुझे शांति चाहिए।"
"मुझे स्पष्टता चाहिए।"
"मुझे आनंद चाहिए।"
🧠 मानो शांति या सत्य कोई ऐसी चीज़ हो जिसे पाया जा सकता है, जिसकी कोई तस्वीर बनाई जा सकती है और जिसे मैं अपने सामने रखकर प्राप्त कर सकता हूँ।
लेकिन जब इस पर थोड़ा और गहराई से विचार करता हूँ, तो समझ आता है कि सत्य की ओर संकेत करने में नकार की भाषा अधिक उपयोगी हो सकती है।
अगर मैं कहूँ, "सत्य आनंद है", तो मन तुरंत उसकी एक कल्पना बनाने लगता है। मानो सत्य कोई विशेष अवस्था हो, जिसे मुझे प्राप्त करना है।
यहाँ तक कि "एक" कहने पर भी मैं उसे किसी वस्तु की तरह अपने सामने रख सकता हूँ। और जैसे ही ऐसा होता है, "मैं" और "वह एक" दो हो जाते हैं। द्वैत खड़ा हो जाता है।
इसीलिए यह बात बहुत गहरी लगती है:
"एक कोई वस्तु नहीं है। एक, विषय (Subject) की अनुपस्थिति है।"
🪞 यानी जिस क्षण मैं सत्य को किसी सकारात्मक शब्द में बाँधता हूँ, उसी क्षण उसे एक वस्तु बनाने का खतरा पैदा हो जाता है और स्वयं को उसका खोजी मानने लगता हूँ।
इसीलिए "नेति-नेति" अधिक उपयोगी लगता है।
यह मुझे कोई नई वस्तु या उपलब्धि नहीं देता। यह केवल मेरी पुरानी धारणाओं पर प्रश्न उठाता है:
"जिसे मैं अभी तक पकड़कर बैठा हूँ, क्या वह वास्तव में वही है जिसे मैं सत्य समझ रहा हूँ?" 🤔
शास्त्र का उद्देश्य मेरे लिए सत्य की कोई तस्वीर बनाना नहीं है, बल्कि मुझे बार-बार अपनी पहचान, धारणाओं, डर और इच्छाओं की ओर लौटाना है।
सकारात्मक भाषा कहती है:
👉 "कुछ है जिसे पाना है।"
नकार पूछता है:
👉 "जिसे तुमने पकड़ रखा है, क्या वह वास्तव में सत्य है?"
यही वजह है कि अब मुझे समझ आता है कि पहले जो मुझे सत्य को किसी सुंदर और सकारात्मक शब्द में बाँध देना सुविधाजनक लगता था, वह कहीं न कहीं अहंकार का एक नया खेल भी हो सकता था। अहंकार को बस एक नया लक्ष्य चाहिए था, एक नई उपलब्धि, एक नई ट्रॉफी। 🏆
जबकि "नेति-नेति" कोई नई चीज़ नहीं देता।
वह केवल पुरानी पकड़ को हटाने का काम करता है।
और शायद यही सबसे कठिन काम है, क्योंकि मन हमेशा कुछ पकड़कर रखना चाहता है। 🪢
इसलिए सत्य की खोज शायद किसी नई चीज़ को पाने की यात्रा कम और जो सत्य नहीं है, उसे लगातार पहचानकर छोड़ने की प्रक्रिया अधिक है। 🕊️
Shelly Gupta
1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल होता है, ऐसे 50 शब्द खोजिए। फिर देखिए कि उनमें से कितने सकारात्मक (via-positiva) हैं।
सभी नेति-नेति के ही है
ब्रह्म
आत्मा
सत्
चित्
आनंद
सच्चिदानंद
अद्वैत
अक्षर
अविनाशी
शाश्वत
नित्य
कूटस्थ
अगोचर
निर्गुण
निराकार
अजात
प्रज्ञान
विज्ञप्ति
विराट
पूर्ण
अनंत
सर्वव्यापी
सर्वज्ञ
अभेद्य
असंग
शांत
अद्वय
बोध
प्रज्ञानं
सत्यम्
चिदाकाश
अकल
निरंजन
निर्मल
निर्विकल्प
अव्यय
अव्यक्त
चिन्मय
अतींद्रिय
अवाच्य
अधिष्ठान
वैताष्टिक
स्वभाव
अनाम
शांत
असीम
अक्रिया
विराट
2. जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है?
पहले हमेशा कुछ पाने की ही चाह रहती थी,सत्य भी ऐसा लगता था या मुक्ति भी ऐसी लगती थी जिसे पा लिया जाए। लेकिन अब आचार्य जी के साथ समझ में आने लगा है की सत्य कोई पाने की चीज नहीं है। बल्कि अपने पास जो हमने बहुत कुछ कचरा जमा कर रखा है उसको हटाने का नाम है। सत्य तो हमारे पास है लेकिन वह कहीं दबा हुआ है अगर हम अपने अज्ञान अपने अंधकार की सफाई करेंगे तभी सत्य का प्रकाश हम तक पहुंचेगा।अब जो भाषा रहती है वह नकार की हो ऐसी कोशिश रहती है।
1
MaNorama Vyas
1. में सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द और उनमें सकारात्मक (via-positiva) शब्द कितने हैं?
वेदांत में सत्य की ओर संकेत करने के लिए निम्न 50 शब्द मिलते हैं:
1. ब्रह्म
2. आत्मा
3. आत्मन्
4. सत्य
5. चित्
6. आनंद
7. सत्
8. सच्चिदानंद
9. अद्वैत
10. अक्षर
11. अव्यय
12. अविनाशी
13. अजर
14. अमर
15. नित्य
16. शाश्वत
17. पूर्ण
18. अनंत
19. निर्विकार
20. निराकार
21. निर्गुण
22. निरपेक्ष
23. अकर्ता
24. अभोक्ता
25. असंग
26. अजन्मा
27. अचल
28. कूटस्थ
29. साक्षी
30. तुरीय
31. कैवल्य
32. मोक्ष
33. मुक्ति
34. निर्वाण
35. शांति
36. परम
37. पुरुष
38. पुरुषोत्तम
39. परमात्मा
40. ऋत
41. तत्त्व
42. स्वप्रकाश
43. स्वयंभू
44. एकमेव
45. अखंड
46. अभेद
47. असीम
48. अनिर्वचनीय
49. नेति-नेति
50. शून्य
कुल संख्या वास्तव में 50 है।
‘सकारात्मक’ या via-positiva शब्दों की गिनती इस बात पर निर्भर करती है कि सकारात्मकता से क्या आशय लिया जाए। यदि इसका अर्थ उन शब्दों से है जो सत्य को किसी प्रत्यक्ष सत्ता, गुण, उपलब्धि या आध्यात्मिक स्थिति के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो स्पष्ट रूप से ये 20 शब्द इस श्रेणी में आते हैं: ब्रह्म, आत्मा, आत्मन्, सत्य, चित्, आनंद, सत्, सच्चिदानंद, अद्वैत, अक्षर, नित्य, शाश्वत, पूर्ण, अनंत, साक्षी, तुरीय, कैवल्य, मोक्ष, मुक्ति और निर्वाण।
यदि ‘परम’, ‘पुरुष’, ‘पुरुषोत्तम’, ‘परमात्मा’, ‘ऋत’, ‘तत्त्व’, ‘स्वप्रकाश’, ‘स्वयंभू’, ‘एकमेव’, ‘अखंड’, ‘अभेद’ और ‘असीम’ को भी सकारात्मक अभिधान माना जाए, तो संख्या 32 हो जाती है। इसलिए सबसे संयमित और तर्कसंगत गिनती 20 है, जबकि व्यापक अर्थ में यह 32 तक जा सकती है।
इसके विपरीत, ‘निर्विकार’, ‘निराकार’, ‘निर्गुण’, ‘निरपेक्ष’, ‘अकर्ता’, ‘अभोक्ता’, ‘असंग’, ‘अजन्मा’, ‘अचल’, ‘अनिर्वचनीय’ और ‘नेति-नेति’ जैसे शब्द मुख्यतः नकारात्मक या अपवादात्मक संकेत देते हैं। ‘अव्यय’, ‘अविनाशी’, ‘अजर’, ‘अमर’, ‘असीम’ और ‘शून्य’ जैसे शब्द सीमा-निषेध या अभाव-सूचक हैं; इसलिए उन्हें शुद्ध via-positiva में रखना विवादास्पद है।
इसलिए मेरे लिए वेदांत की भाषा का महत्व किसी सकारात्मक कल्पना को खड़ा करने में नहीं, बल्कि मेरी बनाई हुई कल्पनाओं को लगातार गिराने में है। ऋषियों ने सत्य को कोई वस्तु बनाकर देने की कोशिश नहीं की, बल्कि उन सभी धारणाओं को हटाया जिनके सहारे मैं सत्य को भी अपनी इच्छा की वस्तु बना सकती हूँ।
2. जब मैं जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ, तो मेरी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? ऐसा क्यों?
मैं देखती हूँ कि सामान्यतः मेरी भाषा सकारात्मक होती है। मैं सत्य को शांति, आनंद, पूर्णता, स्वतंत्रता या किसी ऊँची अवस्था के रूप में सोचने लगती हूँ। शायद इसका कारण यही है कि अहंकार हमेशा पाने की भाषा समझता है—‘मुझे क्या मिलेगा?’, ‘मैं कैसी बनूँगी?’, ‘मुझे कौन-सी अवस्था प्राप्त होगी?’ इसलिए आध्यात्मिकता में भी वह अपने लिए कोई बेहतर अनुभव और बेहतर पहचान खोजने लगता है।
लेकिन वेदांत मुझे दूसरी दिशा दिखाता है। यहाँ सवाल यह नहीं कि मुझे क्या प्राप्त करना है, बल्कि यह कि जो असत्य मैंने पकड़ रखा है, उसमें से क्या-क्या छोड़ना है। मेरे भीतर जो भय, अपेक्षा, मान्यता, पहचान, सुख की कल्पना और अपने बारे में बनी धारणाएँ हैं, उन्हें देखना और नकारना अधिक वास्तविक अभ्यास है।
मैं समझ रही हूँ कि ‘सत्य चाहिए’ कहना बहुत आसान है, लेकिन अपने झूठे सहारों को छोड़ना कठिन है, क्योंकि उनमें मेरा स्वार्थ और मेरी सुरक्षा जुड़ी होती है। इसलिए नेति-नेति मेरे लिए केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं, बल्कि रोज़मर्रा का अभ्यास बनता है—जो अशांति दे रहा है, उसे पहचानना; जो अहंकार को मजबूत कर रहा है, उसे देखना; और फिर बिना किसी नए सहारे की माँग किए उससे पीछे हटना।
अभ्यास: जब भी मैं ‘सत्य’, ‘शांति’ या ‘उच्चतम’ की कोई सकारात्मक तस्वीर बनाऊँगी, मैं रुककर पूछूँगी—मैं अभी वास्तव में क्या छोड़ने से बच रही हूँ? आज के जीवन में एक ऐसी मान्यता, अपेक्षा या आसक्ति पहचानूँगी जिसे मैं सत्य के नाम पर पकड़े हुए हूँ, और उसे बिना सजाए-सँवारे देखने का प्रयास करूँगी।
1
Madhumati prasad
1️⃣ वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल होता है, ऐसे 50 शब्द खोजिए। फिर देखिए कि उनमें से कितने सकारात्मक (via-positiva) हैं।
📝 वेदांत में सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द:
🌱ब्रह्म, आत्मा, सत्य, चैतन्य, साक्षी, आनंद, शांति, पूर्णता, अद्वैत, एकत्व, आत्मज्ञान, मुक्ति, मोक्ष, कैवल्य, निर्वाण, अमृत, असीम, अनंत, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, निरपेक्ष, अखंड, अविनाशी, अपरिवर्तनशील, स्वप्रकाश, स्वयंभू, निर्गुण, निराकार, अकर्ता, अभोक्ता, असंग, निर्लेप, तुरीय, परब्रह्म, परमात्मा, सत्, चित्, आनंद, ऋत, प्रज्ञा, केवल, एकम्, अद्वय, निर्विकल्प, निष्कलंक, निरंजन, परम, स्व।
🌱इनमें से सकारात्मक (via-positiva) शब्द:
ब्रह्म, आत्मा, सत्य, चैतन्य, आनंद, शांति, पूर्णता, एकत्व, अमृत, असीम, अनंत, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, अखंड, स्वप्रकाश, सत्, चित्, प्रज्ञा, परम आदि।
🌱सत्य की ओर संकेत करने के लिए सकारात्मक शब्द जो भी हैं वे सत्य को कोई वस्तु या उपलब्धि बनाने के लिए नहीं हैं। वे केवल संकेत हैं। इसी कारण वेदांत में नेति-नेति यानी नकार का महत्व अधिक है।
2️⃣ जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है?
📝 जब मैं जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ, तो मेरी भाषा अधिकतर सकारात्मक होती है।
🌱मैं सत्य को शांति, पूर्णता, आनंद, प्रेम, स्वतंत्रता और चैतन्य जैसे शब्दों से व्यक्त करने की कोशिश करती हूँ।
🌱यहीं पर अहंकार अपनी चालाकी खेल जाता है। वह इन शब्दों को पकड़कर एक नया विषय बना लेता है—कुछ ऐसा, जो सोचने लायक और पाने लायक हो। क्योंकि—
• अहंकार अशांत है, उसे शांति चाहिए।
• अहंकार अपने को अपूर्ण मानता है, इसलिए उसे पूर्णता चाहिए।
• अहंकार दुखी है, इसलिए उसे आनंद चाहिए।
• अहंकार जीवन भर प्रेम के लिए भटकता रहता है, इसलिए उसे प्रेम चाहिए।
• अहंकार अपने को बंधन में मानता है, इसलिए उसे स्वतंत्रता चाहिए।
मनुष्य एक चैतन्य जीव है और उसे चुनाव करने का अधिकार प्राप्त है। उसे चेतना की उच्चतम संभावना की प्यास है।
🌱लेकिन अहंकार अज्ञानता का दुसरा नाम है। उसे यह पता नहीं कि सत्य कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे बाहर से पाया जा सके। इसलिए वह सत्य की खोज में भी भटकता रहता है और सत्य को एक उपलब्धि या पाने योग्य वस्तु बना लेता है।
🌱अहंकार को दर्पण चाहिए, जिसमें वह अपने यथार्थ को देख सके—कि उसकी मौजूदा स्थिति उसे कैसी अशांति और बेचैनी दे रही है। उसे उस स्थिति को छोड़ना होगा, लेकिन वह आसानी से छूटती नहीं, क्योंकि उसमें उसके अपने दाँव लगे हुए हैं।
🌱 हम जिस भी चीज़ को अपना सत्य मानकर पकड़े हुए हैं, उसे छोड़े बिना, गिराए बिना और नकारे बिना सत्य की ओर बढ़ना संभव नहीं है।
🌱इसके लिए एक साफ़ निराशा, एक गहरा मोहभंग और झूठी उम्मीदों का पूरी तरह टूट जाना आवश्यक है। श्रीकृष्ण इसे निर्ममता के रूप में बताते हैं—"जो कुछ मैं पकड़े बैठा हूँ, वह मेरा नहीं है और उससे मेरा मोह पूरी तरह टूट चुका है।"
🌱अत: निष्कर्ष यह निकलता है कि सत्य को सकारात्मक शब्दों में व्यक्त करना केवल एक संकेत है, लेकिन ‘नेति-नेति’ का चुनाव ही हमें सत्य की दिशा की ओर ले जा सकता है। आचार्य जी कहते हैं -
"नेति-नेति सत्य से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है।"
1
Anisha
1. वेदांत में सत्य की ओर इशारा करने के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल होता है, ऐसे 50 शब्द खोजिए। फिर देखिए कि उनमें से कितने सकारात्मक (via-positiva) हैं।
अनिकेत, ब्रह्म, आत्मा, निराकार, निर्गुण, अविनाशी, अगोचर, निर्मम, निराधार, नित्य, अनिर्वचनीय, निर्लज्ज, निर्विकल्प, निरालंब, अनंत, पूर्ण, शून्य, प्रज्ञा, निर्विकार, अलख, अलक्ष्य, शिवोहम, शिवत्व, मुक्ति, अनुपम, प्रकाश, ज्ञान, अमृत, अद्वैत, रसो वै सः, अनाम, अरूप, सच्चिदानंद, कूटस्थ, एकम्, ॐ, अव्यय, अजन्मा, सनातन, परम, तुरीय, निश्चल, प्रज्ञान, मोक्ष, कैवल्य, अभय, विजय, असंग, परब्रह्म, विषयातीत।
इनमें—
🔹 नकारात्मक / via-negativa — 28
🔹 सकारात्मक / via-positiva — 22
यानी सत्य की ओर संकेत करने वाले शब्दों में नकार की भाषा अधिक दिखाई देती है।
सत्य को किसी नई चीज़ के रूप में पाना नहीं है, बल्कि जो असत्य, अतिरिक्त और आरोपित है, उसे हटाते जाना है।
नेति-नेति — यह भी नहीं, वह भी नहीं। 🌌2. जब आप जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करते हैं, तो उसे व्यक्त करने के लिए आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? आपके अनुसार ऐसा क्यों है?
ईमानदारी से कहूँ तो मुझे कोई भी सकारात्मक शब्द, सकारात्मक दिखाई ही नहीं देता। मुझे तो वहाँ भी ‘नेति-नेति’ ही दिखाई देता है।
अगर मैं सत्य को अभिव्यक्त करती हूँ, तो वह भी अधिकतर नकारात्मक शब्दों में ही होता है—
अनिकेत — जिसका कोई घर नहीं। 🏚️निरालंब — जिसका कोई आधार नहीं।निर्लज्ज — जिसे सामाजिक शर्तों से कोई लेना-देना नहीं।असंग — जिसका कोई संग नहीं।अनाम — जिसका कोई नाम या पहचान नहीं।
ये नकारात्मक शब्द हमें कुछ देते नहीं, बस यह दिखाते हैं कि हमने क्या-क्या अतिरिक्त पकड़ रखा है।
हमारा उद्देश्य बना रहता है—
“एक घर बना लूँ, सैटल हो जाऊँ।” 🏠
लेकिन अनिकेत दिखाता है—
देखो, घर के साथ तुमने अपनी सुरक्षा, अपनी स्थिरता और अपनी पहचान भी बाँध ली है।
🍁निरालंब दिखाता है—
देखो, तुमने कितने सहारों को अपना आधार बना लिया है।
🌿असंग दिखाता है—
देखो, तुमने किस-किस की संगति कर ली है और उसके लिए क्या कीमत चुका रहे हो।
🥀 अनाम दिखाता है—
देखो, तुमने अपने नाम, अपनी पहचान, अपनी उपलब्धियों और अपनी छवि को कितना पकड़ रखा है।
“मैं ये हूँ।” “ये मेरा है।” “मैं ऐसा हूँ।”
रिश्ते, प्रतिष्ठा, उपलब्धियाँ, विचार— हमने सबको ‘मैं’ और ‘मेरा’ बना लिया है।
सत्य हमें यह नहीं बताता कि हमें क्या नया बनना है, बल्कि यह दिखाता है कि जो कुछ पकड़ा है, उसमें वास्तव में हमारा है क्या।
इसलिए सत्य की भाषा शायद नकार की भाषा है— क्योंकि तुम्हें कुछ पाना नहीं है, छोड़ना है।
सत्य कोई वस्तु नहीं जिसे पाया जाए।
वह तो शायद उस सबके हट जाने पर जो शेष रह जाता है—वही है।
नेति। नेति। नेति। 🌌«सत्य की ओर यात्रा कुछ जोड़ने की नहीं,बल्कि लगातार घटते जाने की यात्रा है। 🕊️»
Amrita Kumari
### आज का बोधकार्य
1\. वेदांत में सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द और उनमें सकारात्मक शब्दों की संख्या।
* ब्रह्म
* आत्मा
* सत्य
* चैतन्य
* आनंद
* शांति
* मुक्ति
* मोक्ष
* निर्वाण
* कैवल्य
* अद्वैत
* पूर्णता
* अनंत
* अमरत्व
* अभय
* प्रेम
* करुणा
* समत्व
* साक्षी
* बोध
* ज्ञान
* विवेक
* प्रज्ञा
* ऋत
* सत्
* चित्
* आनन्द
* निर्भयता
* निष्कामता
* निरहंकार
* नेति-नेति
* असंग
* निराकार
* निर्गुण
* निर्विकार
* अकर्ता
* अभोक्ता
* अशरीरी
* अनासक्ति
* अनाम
* अवर्णनीय
* अचिंत्य
* अव्यक्त
* अचल
* अजन्मा
* अविनाशी
* असत्य का निषेध
* अहंकार का अभाव
* द्वैत का निषेध
* बंधनों से मुक्ति
इनमें लगभग 27 शब्द सकारात्मक (Via Positiva) हैं, जो सत्य की ओर किसी गुण, अवस्था या उपलब्धि के माध्यम से संकेत करते हैं। बाकी शब्द नकारात्मक पद्धति (Via Negativa) से जुड़े हैं, जो बताते हैं कि सत्य क्या नहीं है या उसमें किसका अभाव है। यह वर्गीकरण संदर्भ के अनुसार बदल सकता है, क्योंकि वेदांत में आनंद, पूर्णता और मुक्ति जैसे सकारात्मक लगने वाले शब्द भी सत्य को किसी वस्तु या उपलब्धि की तरह समझने का कारण बन सकते हैं।
2\. सत्य या उच्चतम की बात करते समय आपकी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की? क्यों?
जब मैं सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ, तो अक्सर सकारात्मक शब्दों का प्रयोग करती हूँ, जैसे शांति, आनंद, प्रेम और मुक्ति। मन स्वाभाविक रूप से सत्य की कोई सुंदर तस्वीर बना लेता है और सोचता है कि उसे प्राप्त करके जीवन की सारी परेशानियाँ समाप्त हो जाएँगी। लेकिन आचार्य जी की बात से समझ आता है कि सत्य कोई नई उपलब्धि या कल्पना नहीं है। उसके लिए यह देखना ज़रूरी है कि मेरे भीतर क्या गलत है, कौन-सी मान्यताएँ मुझे बाँधे हुए हैं और किन इच्छाओं के कारण अशांति बनी हुई है। इसलिए अब मुझे केवल यह नहीं पूछना कि सत्य क्या है, बल्कि यह भी देखना है कि जो असत्य मैं पकड़े बैठी हूँ, उसे कैसे पहचानूँ और छोड़ूँ। नेति-नेति का वास्तविक अर्थ मेरे लिए इसी आत्मनिरीक्षण में है।
anshulsingh
1. 50 words in Vedanta that point towards Truth
Atma, Brahman, truth, chaitanya, consciousness, witness, non-duality, self-knowledge, Brahman-knowledge, self-realization, Brahman-realization, bliss, peace, completeness, infinite, unbroken, eternal, pure, free, immortal, indestructible, unborn, unattached, without attributes, formless, unconditional, changeless, incomparable, turiya, liberation, freedom, nirvana, oneness, Paramatma, supreme truth, नेति-नेति, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि, sat, self-luminous, without ego, without desire, free of bondage, free of fear, freedom, discernment, dispassion, compassion, love, emptiness.
Some of these words are positive—like bliss, peace, completeness, love. While some point towards truth through negation—like unattached, without attributes, formless, and नेति-नेति.
From this I understood that, more than attaining truth as if it were some object, what really matters is to recognize and drop the false notions within.
2. My personal situation
Right now I am in a relationship where talking to her makes me happy and I’ve started to care about her. But at the same time, there is an expectation in me that she should understand me, understand my feelings, and stay close to me.
I don’t want to bind her, nor do I want to have any claim over her. Yet when there is distance from her, my mind becomes restless and I go back towards her again.
Now I’m beginning to see a bit of the difference between love and attachment.
Love: She remains free and happy in her own way, whether she is close to me or not.
Attachment: I don’t want to bind her, but deep within I still want her to understand me, stay close to me, and respond to my feelings.
Maybe both are running together inside me. So today I’m asking myself—am I really loving, or am I mistaking my expectations and attachment for love?
I’m now feeling that before I go after anything new, I need to look at this inner grip. Perhaps for me, this is what नेति-नेति means right now—to recognize whatever is binding me, and slowly let it go.
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Astha Kumawat
ज्यादा कुछ समझ नहीं आया 😟
लेकिन सत्य या उच्चतम की बात सकारात्मक होती हैं मेरे लिए तो
लेकिन इसमें आचार्य जी त्याग की नकार की बात कर रहे है
अपने बारे में जानकर.... 🤔
सत्य त्याग मांगता है
1
DHARAMVEER SINGH
1️⃣ वेदांत में सत्य की ओर संकेत करने वाले शब्द जैसे ब्रह्म, आत्मा, सत्य, चैतन्य, आनंद, शांति, पूर्णता, साक्षी, अद्वैत, निर्वाण, कैवल्य, मोक्ष, तुरीय, अकर्ता, अभोक्ता, निर्गुण, निराकार, अजन्मा, अमर, अविनाशी, अनंत, असीम, निरपेक्ष, निर्विकार, निष्काम, निरहंकार, असंग, अचल, कूटस्थ, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्, चित्, स्वप्रकाश आदि हैं। इनमें कई शब्द सकारात्मक प्रतीत होते हैं, लेकिन वे वास्तव में किसी वस्तु का वर्णन नहीं करते; वे संकेत मात्र हैं। “नेति-नेति” की नकारात्मक भाषा अधिक मूलभूत है।
2️⃣ मेरी भाषा पहले सकारात्मक होती थी—सत्य को किसी ऊँची अवस्था या उपलब्धि की तरह देखता था। अब समझ आता है कि नकार अधिक उपयोगी है, क्योंकि सत्य को पकड़ने के बजाय अपनी झूठी धारणाओं, अहंकार और आसक्तियों को छोड़ना है।
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Bharti Suryavanshi
वेदान्त में सत्य की ओर इशारा करने वाले ५० शब्द
सत्, ब्रह्म , पुरुष , शून्यता , पूर्णता , विगलन की दिशा , शुद्ध , बुद्ध, आत्मा , आत्मन , मोक्ष , मुक्ति , सत्य ,पुरुषोत्तम , अभय , अद्धेत , निरंकार , सत्यम , मुक्त , आत्मज्ञान , आत्मअवलोकन , आत्म विगलन, आत्मबोध , प्रेम
परम् , नेति
नेति नेति , अदैश्य , असंग , निराकार , निर्गुण ,न इति ,निर्वैयक्तिक , साकार , नकारा , असंगत , अपूर्ण ,
Kushal
1. सकारात्मक संकेत (विधि)
ब्रह्म: विशाल
आत्मन्: स्वयं
सत्: अस्तित्व
चित्: चेतना
आनन्द: परमसुख
सत्यम्: सत्य
ज्ञानम्: ज्ञान
पूर्णम्: पूर्णता
साक्षी: द्रष्टा
तुरीय: चतुर्थ
पुरुष: भीतर बसने वाला
परमात्मन्: परम आत्मा
ईश्वर: प्रभु
तत्: वह
एकम्: एक
अहम्: मैं
शिवम्: मंगलमय
नित्यम्: शाश्वत
शुद्धम्: शुद्ध
बुद्ध: जागृत चैतन्य
मुक्तम्: नित्य-मुक्त
कूटस्थ: अपरिवर्तनशील
स्वयंप्रकाश: स्वयं-प्रकाशित
प्रज्ञानम्: शुद्ध प्रज्ञा
अन्तर्यामी: अन्तःप्रेरक
नकारात्मक संकेत (निषेध, "नेति नेति")
26. नेति-नेति: यह नहीं, यह नहीं
27. अद्वैत: दो नहीं
28. अद्वितीय: जिसका कोई दूसरा नहीं
29. निर्गुण: गुणरहित
30. निराकार: आकाररहित
31. निर्विकार: विकाररहित
32. निष्क्रिय: क्रियारहित
33. निरञ्जन: निष्कलंक
34. निर्मल: मलरहित
35. निर्विकल्प: संकल्प-विकल्प से रहित
36. निरुपाधिक: उपाधिरहित
37. अजम्: अजन्मा
38. अजात: कभी उत्पन्न नहीं हुआ
39. अनादि: आदिरहित
40. अनन्त: अन्तरहित
41. अचिन्त्य: चिन्तन से परे
42. अव्यक्त: अप्रकट
43. अव्यय: अविनाशी
44. अक्षर: अक्षय
45. अमृत: मृत्युरहित
46. अभय: भयरहित
47. असङ्ग: संगरहित
48. अप्रमेय: अपरिमेय
49. अनिर्वचनीय: अवर्णनीय
50. अशरीर: देहरहित
2 - सकारात्मक ही होती है क्योंकि पहले समझा जाना नहीं था और अब इनकी बात नहीं करता हूँ क्योंकि में जो भी कहूंगा वो विकृत ही होगा इसलिए न बात करना बेहतर है । कारण - ऐतिहासिक हैं , सांस्कृतिक है स्वयं अहंकार की बनावट है।
Geeta Yadav
1. वेदांत में सत्य की ओर संकेत करने वाले 50 शब्द
वेदांत में सत्य को समझाने के लिए दो तरह की भाषा दिखाई देती है—सकारात्मक/विधेयात्मक (via positiva) और नकारात्मक/निषेधात्मक (via negativa)। विशेषतः उपनिषदों में सत्य को कई बार यह बताकर इंगित किया जाता है कि वह क्या नहीं है—जैसे नेति-नेति।
50 संकेतक शब्द/पद:
1. ब्रह्म
2. आत्मा
3. आत्मन्
4. सत्
5. चित्
6. आनंद
7. सच्चिदानंद
8. सत्य
9. ज्ञान
10. अनंत
11. शुद्ध
12. बुद्ध
13. मुक्त
14. नित्य
15. शाश्वत
16. अविनाशी
17. अकर्ता
18. अभोक्ता
19. निर्गुण
20. निराकार
21. निरंजन
22. निर्विकार
23. निष्कलंक
24. निष्प्रपंच
25. अद्वैत
26. एक
27. पूर्ण
28. अखंड
29. अद्वितीय
30. स्वप्रकाश
31. साक्षी
32. कूटस्थ
33. तुरीय
34. शांत
35. अभय
36. अजर
37. अमर
38. अजन्मा
39. अचल
40. सर्वव्यापी
41. सर्वज्ञ
42. नेति-नेति
43. असंग
44. निरपेक्ष
45. निरुपाधिक
46. अव्यक्त
47. अचिंत्य
48. अगोचर
49. अतीन्द्रिय
50. परम
अब इनमें सकारात्मक (via-positiva) कितने हैं?
यदि सकारात्मक से आशय ऐसे शब्दों से लें जो सत्य के बारे में कोई गुण या स्वरूप बताते हैं—जैसे सत्, चित्, आनंद, पूर्ण, अनंत, शुद्ध, प्रकाश—तो सूची में लगभग 20–25 शब्द इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं।
लेकिन वेदांत की गहरी दृष्टि से देखें तो सकारात्मक शब्द भी अंतिम सत्य का पूरा वर्णन नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, “अनंत” कहने पर भी हम सत्य को किसी सीमित वस्तु की तरह परिभाषित कर रहे होते हैं। इसलिए उपनिषद “नेति, नेति” अर्थात “यह नहीं, यह भी नहीं” के माध्यम से सभी सीमित धारणाओं का निषेध करते हैं।
2. मेरी भाषा नकार की होती है या सकारात्मकता की?
मेरे अनुसार जब मैं जीवन में सत्य या उच्चतम की बात करती हूँ, तो मेरी भाषा अधिकतर नकार की ओर जाती है।
क्योंकि जिसे मैं “सत्य” कह रहा/रही हूँ, उसे किसी वस्तु, उपलब्धि, व्यक्ति या विचार के रूप में पकड़ लेना फिर एक नई धारणा बना देता है। इसलिए मैं पहले यह देख सकती हूँ कि सत्य क्या नहीं है—
सत्य केवल धन नहीं है।
सत्य केवल प्रतिष्ठा नहीं है।
सत्य केवल सामाजिक पहचान नहीं है।
सत्य मेरी इच्छाओं की पूर्ति नहीं है।
सत्य किसी विचार या मान्यता को पकड़कर बैठ जाना नहीं है।
सत्य अहंकार की बनाई हुई छवि नहीं है।
Akshay chaudhary
1. वेदांत में सत्य / ब्रह्म की ओर इशारा करने वाले 50 मुख्य शब्द।
Via Positiva वाले - 29 शब्द
1. सत्यम्
2. ज्ञानम्
3. अनन्तम्
4. पूर्णम्
5. सच्चिदानंद
6. सत्
7. चित्
8. आनन्द
9. ब्रह्मन्
10. आत्मन्
11. परमात्मन्
12. तुरीय
13. साक्षी
14. चैतन्य
15. चिद्घन
16. शान्तम्
17. शिवम्
18. सुन्दरम्
19. एकम्
20. अद्वितीयम् - एक ही है
21. अखंडम्
22. नित्यम्
23. शुद्धम्
24. बुद्धम्
25. मुक्तम्
26. ज्योति:
27. प्रकाश:
28. ॐ
29. तत्
Via Negativa वाले - 21 शब्द* - जहाँ 'निर्', 'अ', 'न' से निषेध है
30. निर्गुण
31. निराकार
32. निर्विकार
33. निर्विशेष
34. निरुपाधि
35. निरंजन
36. निरालंब
37. निष्कल
38. निष्क्रिय
39. असंग - जो किसी से लिप्त नहीं
40. अज - अजन्मा
41. अमूर्त
42. अरूप
43. अव्यक्त
44. अचिन्त्य
45. अनिर्वचनीय
46. अनादि
47. अनंत - जिसका अंत नहीं (निषेधात्मक रूप)
48. अमृत - मरण-रहित
49. अभय
50. नेति-नेति - यह नहीं, यह नहीं
निष्कर्ष
50 में से सकारात्मक 29 और नकारात्मक 21 हैं।
2. सत्य/उच्चतम के बारे में मेरी बात नकार की ही होगी क्योंकि वेदांत का जोर हमेशा नकारात्मक पर ज्यादा है। कारण - सकारात्मक शब्द मन को एक आकृति दे देते हैं, शब्द को अहंकार खिलौना बना लेता हे, जबकि सत्य आकृति से परे है। वास्तव में सत्य कोई सकारात्मक विषय/तत्त्व नहीं हे, क्योंकि झूठ को समझा/देखा जा सकता हे। और सत्य के सकारात्मक शब्द नकार के शब्दों के लक्षण के रूप में समझे जा सकते हैं। जैसे अगर आप भीतर से प्रकाशित हो या भ्रमित नहीं हो तो बाहर से आप निर्भय हो जाओगे।