
✍🏻 पोस्ट 12 | 14 अक्टूबर '26 💭 विषय — मनोविज्ञान ─────────── 🌸 नार्सिसस: जब अपनी ही छवि में उलझ जाए इंसान! 🏛️ ग्रीक मिथक में नार्सिसस एक ऐसा युवक था, जिसकी आकर्षकता पर अनेक लोग मोहित थे। लेकिन वह किसी के प्यार को स्वीकार नहीं करता था। एक दिन नार्सिसस एक जलस्रोत के पास पहुँचा। उसने पानी में झाँका तो उसे एक आकर्षक चेहरा दिखाई दिया। वह नहीं जानता था कि यह उसी का प्रतिबिंब है। वह उस छवि में इतना उलझ गया कि उसे पाने की कोशिश करने लगा। लेकिन हर बार पानी में हलचल होते ही वह चेहरा बिखर जाता। वह बार-बार उस छवि को देखता रहा। वह अपनी नज़रें उस प्रतिबिंब से हटा नहीं सका और अंततः उसकी मृत्यु हो गई। मान्यता है कि जहाँ वह मरा, वहाँ नार्सिसस का फूल खिला। 🧠 मिथक से मनोविज्ञान तक उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में 'नार्सिसिज़्म' शब्द का इस्तेमाल मनोविज्ञान में होने लगा। 1914 में सिग्मंड फ्रायड (Sigmund Freud) ने इस पर विस्तार से लिखा। 1980 में नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (NPD) को अमेरिकी मनोरोग निदान पुस्तिका (DSM-III) में शामिल किया गया। 🔍 नार्सिसिज़्म के दो रूप 🔸 ग्रैंडियोस नार्सिसिज़्म (Grandiose Narcissism): स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझना, प्रशंसा की अपेक्षा करना और दूसरों पर हावी होने की प्रवृत्ति। 🔸 वल्नरेबल नार्सिसिज़्म (Vulnerable Narcissism): आलोचना के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होना, अपनी छवि को लेकर असुरक्षित रहना और अपनी महत्ता को लेकर भीतर ही भीतर चिंतित रहना। 🌱 नार्सिसस की कहानी प्रासंगिक है क्योंकि यह हमारे बारे में कुछ बताती है। हम भी नार्सिसस की तरह अपनी ही छवि में उलझे हुए हैं। हम दुनिया को भी अक्सर इस नज़र से देखते हैं कि उससे हमें क्या मिलता है, वह हमारे बारे में क्या कहती है और हमारी पहचान को कितना बड़ा बनाती है। 🔍 हम अपनी पहचान नाम, रूप, उपलब्धियों, रिश्तों और दूसरों की प्रशंसा से बनाते हैं। फिर उसी पहचान को बचाने में लगे रहते हैं। सवाल यह नहीं है कि हम अपनी छवि को कितना बेहतर बना सकते हैं, बल्कि यह है कि हम उस छवि को इतना महत्त्व क्यों देते हैं? क्या हम कभी अपनी पहचान और उसके पीछे छिपी असुरक्षा को ईमानदारी से देख पाते हैं? स्रोत: https://www.britannica.com/topic/Narcissus-Greek-mythology














































