
मैं पहले भी अपनी गलतियों को देखती थी पर दुसरों को भी देखती थी, और चाहती थी कि सामने वाला सुधर जाए, और यह मेरी मान्यता थी कि दुसरो को ठीक करने कि जिम्मेदारी मेरी है। और मैंने अपनी जिंदगी की १५ साल इस मैं लगाया है,पर जब से गीता सत्रौं से जुड़ी हुं मेरी सारा ध्यान अपनी तरफ आ रहा है, दुसरे से हटकर। अपनी गलती तो पकड़ने में गलती हो जाती है,दुसरौ की कैसे पकड़े।बो भी अहंकार ही है जो दुसरों की ओर भागता था। आज भी कभि कभि भागता है , पर में थोड़ी देर में जानजाती हुं।



















