
✍🏻 पोस्ट 20 | 8 सितम्बर '26 💭 विषय — विश्व दर्शन ───────── 👉 सभा में ऋषि अष्टावक्र को देखकर सब हँसे, फिर जो हुआ... 😶 राजा जनक की सभा लगी हुई थी। सभा में बड़े-बड़े विद्वान बैठे थे। तभी एक बहुत कम उम्र के व्यक्ति वहाँ पहुँचे। उनका शरीर कई जगह से टेढ़ा-मेढ़ा था और उनकी चाल भी सामान्य नहीं थी। 👉 उन्हें देखते ही सभा में बैठे लोग हँसने लगे। लेकिन ऋषि अष्टावक्र भी हँस पड़े। बल्कि वे उनसे भी ज़ोर से हँसे। अचानक पूरी सभा शांत हो गई। 👑 राजा जनक ने पूछा, “आप हँसे क्यों?” ऋषि अष्टावक्र बोले, उन्हें लगा था कि यह सूक्ष्म ज्ञानियों की सभा है। लेकिन यहाँ तो लोग किसी के शरीर को देखकर ही उसका मूल्य तय कर रहे हैं। उन्हें लगा था कि वे ज्ञान के पारखी हैं, पर वे तो स्थूल खाल के सौदागर निकले। ⚡ इतना कहकर ऋषि अष्टावक्र वहाँ से लौटने लगे। सभा में बैठे लोगों के लिए यह जवाब केवल अपमान का जवाब नहीं था। यह उनके देखने के तरीके पर सीधा सवाल था। 👀 और यही बात आज भी चुभती है। हम किसी को देखते हैं और कुछ ही पलों में उसका बहीखाता खोल देते हैं। चेहरा कैसा है, शरीर कैसा है, कपड़े कैसे हैं, कितना पैसा है, किस जाति का है, किस पद पर है। फिर उसी के आधार पर तय कर लेते हैं कि वह इंसान कैसा होगा। 🤔 लेकिन सवाल यह है, “क्या हम सामने वाले को देख रहे हैं, या अपनी धारणाओं के हिसाब से उसे देख रहे हैं?” 🎭 अहंकार को लोगों को समझने से ज्यादा उन्हें पहचान देना आसान लगता है। यह सुंदर है, यह बदसूरत है। यह ऊँचा है, यह नीचा है। यह अपना है, यह पराया है। एक बार फैसला हो गया, फिर देखने की जरूरत ही नहीं रहती। 🔍 यहीं ऋषि अष्टावक्र की बात आज के जीवन से जुड़ती है। किसी दूसरे का शरीर, जन्म या सामाजिक पहचान उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। लेकिन उससे भी बड़ी समस्या तब है, जब कोई व्यक्ति दूसरों की बनाई हुई पहचान को खुद भी पकड़ लेता है और उसी के आधार पर अपने आपको छोटा या बड़ा मानने लगता है। 📌 किसी दूसरे का आपको छोटा समझना एक बात है। उससे भी गहरी बात यह है कि आप खुद को छोटा मानने लगें। यहीं से मैं हूँ पन अपनी पहचान बचाने के लिए तरह-तरह के बहीखाते बनाता है। 👉 तो ऋषि अष्टावक्र की कहानी केवल उन लोगों पर हँसने की कहानी नहीं है जो उन पर हँसे थे। ❓ यह पूछती है कि आप किसी इंसान को देखकर सबसे पहले क्या देखते हैं, उसका होना या अपनी बनाई हुई पहचान? और अगली बार जब आप किसी को देखकर तुरंत फैसला कर लें, तो एक सवाल उठे: ❓ “यह फैसला सामने वाले के बारे में है, या मेरे अपने अहंकार के बारे में?” 🔗 स्रोत: https://acharyaprashant.org/en/articles/kya-prem-jaati-dekhkar-karna-chahiye-1_bed10eb
















































