
(1)में सुनीता दुसरो क़ो देखती हूँ, फिर अगर वो दिखाने में अच्छा है, तो मेरी बनाई छवि और पहचाने उसे मुझसे जोड़ देती है। सच्चाई जानने की हिमत नही होती, ज़ब वो में (अहंकार )की बनाई कहानियो,कल्पनाओ का हिस्सा बन जाय।फिर अगर कभी सच्चाई का पता लगे, तो दिल सा टूट जाता है, की मुझे क्यू पता चला? फिर अगर में क़ो चुनाव करना हो, तो वो उस सच्चाई क़ो तोड़ मरोड़ कर उसे पहले जैसा बना देगा।ताकी वो बचा रहे, उसे दुख ना हो, ऐसे ही हम करते है। सच्चाई क़ो अपनी सच्चाई से तुलना कराकर अपने आप क़ो बचाना, जों पहले से करते आ रहे है। इनी के कारण अहम(अपूर्णता ) ज़ब दुखी होता है, तो और ज्यादा विषयो क़ो अपना बना लेता है। 👉इसमें ज़ब अहम अपने आत्मज्ञान की दिशा जाय तो, फिर उसका चुनाव और नियत सही हो सकती है, ये तब होगा ज़ब अहम स्वयं अपने घटने की दिशा (मुक्ति )का चुनाव करे, यहां यह उसकी अपनी मर्जी पर है,यानि मेरी।



















